श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1197, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय 9/62–68 ] अनुवाद—जब बौद्धाचार्यने कृष्ण बोलते हुए महाप्रभुको आत्म-समर्पण किया, तब यह देखकर उपस्थित सभी लोग बहुत आश्चर्यचकित हुए। तब श्रीशचीनन्दन एक और कौतुक करते हुए वहाँसे अन्तर्धान हो गये और उनको कोई देख नहीं पाया॥ 62–63॥ तिरुपति एवं तिरुमलयमें आगमन और बालाजी-दर्शन :- महाप्रभु चलि' आइला त्रिपत्ति-त्रिमल्ले। चतुर्भुज-मूर्त्ति देखि' व्येङ्कटाद्रये चले॥ 64॥ अनुवाद—तब महाप्रभु त्रिपत्ति-त्रिमल्लमें आये। वहाँ चतुर्भुज श्रीविष्णुमूर्तिके दर्शन करके वे व्येङ्कट-पर्वतकी ओर गये॥ 64॥ अनुभाष्य—महाप्रभुके द्वारा भ्रमण किये गये स्थानोंका प्रायः ठीक प्रकारसे वर्णन किया जा रहा है— 'तिरुपति' अथवा 'तिरुपट्टूर'—उत्तर आर्कटमें चन्द्रगिरि-तालुकके अन्तर्गत प्रसिद्ध तीर्थ है। व्येङ्कटेश्वरके नामसे व्येङ्कट-गिरि अथवा व्येङ्कट-पर्वतके ऊपर आठ मील दूरीपर 'श्री' और 'भू'—दो शक्तियोंके साथ चतुर्भुज 'बालाजी' अथवा व्येङ्कटेश्वर विष्णु-विग्रह है। इसको व्येङ्कटक्षेत्र भी कहते हैं। सम्पूर्ण दक्षिण भारतमें यही एक श्रेष्ठ ऐश्वर्य-सम्पद्-शाली मन्दिर है। आश्विन मासमें यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है। 'निम्न-तिरुपति'—व्येङ्कट पर्वतकी तलहटीमें स्थित है। वहाँ कुछ मन्दिर हैं। यहाँ श्रीगोविन्दराज और श्रीरामचन्द्रजीकी मूर्तियाँ हैं। 'तिरुमल्लय'—सम्भवतः पर्वतके ऊपर विराजमान तिरुपतिके प्राचीन कालका नामान्तर है॥ 64॥ व्येङ्कटाचलमें श्रीराम-दर्शन :- त्रिपत्ति आसिया कैल श्रीराम-दरशन। रघुनाथ-आगे कैल प्रणाम-स्तवन॥ 65॥ पाना-नृसिंहका दर्शन :- स्वप्रभावे लोक सबार कराञा विस्मय। पाना-नृसिंहे आइला प्रभु दयामय॥ 66॥ नृसिंहे प्रणति-स्तुति प्रेमावेशे कैल। प्रभुर प्रभावे लोक चमत्कार हैल॥ 67॥ अनुवाद—त्रिपत्तिमें आकर महाप्रभुने श्रीरामचन्द्रके दर्शन किये। उन्होंने श्रीरघुनाथको प्रणाम किया और उनकी स्तव-स्तुति की। अपने प्रभावसे महाप्रभुने सभी लोगोंको विस्मित कर दिया। तब दयामय महाप्रभु पाना-नृसिंहमें आये। महाप्रभुने प्रेमावेशमें नृसिंह भगवान्को प्रणाम किया और उनकी स्तव-स्तुति की। महाप्रभुके प्रेमावेशको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये॥ 65–67॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पाना-नृसिंह'—चीनीका पाना अर्थात् शरबत जिसका भोग श्रीनृसिंहदेवको लगता है॥ 66॥ अनुभाष्य—'पाना-नृसिंह' (पानाकल् नरसिंह)—कृष्णा जिलेमें विजयवाड़ा शहरसे सात मील दूर 'मङ्गलगिरि'में स्थित है। छह सौ सीढ़ियाँ चढ़नेके बाद यह प्रसिद्ध मन्दिर है। प्रवाद (किंवदन्ती)—इन श्रीनृसिंहदेवको शरबतका भोग लगानेपर, वे शरबतको आधेसे अधिक ग्रहण नहीं करते। इस मन्दिरमें ताञ्जोरके भूतपूर्व महाराजाने 'श्रीकृष्णके द्वारा व्यवहार किये गये कहलानेवालें' एक शङ्खका दान किया था। मार्चके महीनेंमें इस स्थानपर बहुत बड़ा मेला लगता है॥ 66॥ शिवकाञ्चीमें शिवका दर्शन और महाप्रभुकी कृपासे शैवोंको भी वैष्णवताकी प्राप्ति :- शिवकाञ्ची आसिया कैल शिव-दरशन। प्रभावे 'वैष्णव' कैल सब शैवगण॥ 68॥ अनुवाद—फिर महाप्रभुने शिवकाञ्ची आकर शिवजीका दर्शन किया। अपने प्रभावसे महाप्रभुने समस्त शैवोंको वैष्णव बना दिया॥ 68॥ अनुभाष्य—'शिवकाञ्ची'—अर्थात् काञ्चीपुरम, यह 'दक्षिणकाशी'के नामसे जाना जाता है। यहाँ असंख्य शिवलिङ्ग हैं, उनमेंसे 'एकाम्बर कैलाशनाथ'का मन्दिर बहुत प्राचीन है॥ 68॥ । 349