भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1198

[ 9/69–74 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला विष्णुकाञ्चीमें लक्ष्मी-नारायणका दर्शन और वहाँके लोगोंको वैष्णवताकी प्राप्ति :— विष्णुकाञ्ची आसि' देखिल लक्ष्मी-नारायण। प्रणाम करिया कैल बहुत स्तवन॥ 69 ॥ प्रेमावेशे नृत्य-गीत बहुत करिल। दिन-दुइ रहिं लोके 'कृष्णभक्त' कैल॥ 70 ॥ अनुवाद—उसके बाद महाप्रभुने विष्णुकाञ्ची आकर श्रीलक्ष्मी-नारायणका दर्शनकर उनको प्रणाम किया और उनकी बहुत स्तव-स्तुति की। प्रेमावेशमें महाप्रभुने बहुत देर तक नृत्य-गान किया। दो दिन वहाँ रहकर महाप्रभुने लोगोंको कृष्णभक्त बना दिया॥ 69–70 ॥ अनुभाष्य—'विष्णुकाञ्ची'—काञ्चीपुरमसे पाँच मीलकी दूरी पर है। यहाँ 'वरदराज' विष्णु-विग्रह और 'अनन्त सरोवर' है॥ 69 ॥ त्रिकालहस्तीमें शम्भु-दर्शन :— त्रिमलय देखि' गेला त्रिकालहस्ती-स्थाने। महादेव देखि' ताँरे करिल प्रणामे ॥ 71 ॥ अनुवाद—त्रिमलयका दर्शन करके महाप्रभु त्रिकालहस्ती नामक स्थानपर आये। वहाँ महादेवका दर्शन करके महाप्रभुने उन्हें प्रणाम किया॥ 71 ॥ अनुभाष्य—'त्रिमलय'—ताञ्जोर अथवा तौण्डीर-मण्डलमें स्थित है। 'त्रिकालहस्ती'—तिरुपतिसे बाइस मील उत्तर-पूर्व दिशामें सुवर्णमुखी-नदीके दक्षिण-तटपर स्थित है। यह 'श्रीकालहस्ती' अथवा प्रचलित भाषामें 'कालहस्ती'-नामसे भी जाना जाता है। यह स्थान 'वायुलिङ्ग-शिव' मन्दिरके लिये विख्यात है। (उत्तर आर्कटम्यानुयेल) ॥ 71 ॥ पक्षीतीर्थमें शिव-दर्शन, वृद्धकोल-तीर्थमें श्वेतवराह-विग्रहका दर्शन :— पक्षीतीर्थ देखि' कैल शिव दरशन। वृद्धकोल-तीर्थे तबे करिला गमन॥ 72 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने पक्षीतीर्थमें आकर शिवजीका दर्शन किया और वहाँसे वृद्धकोल-तीर्थके लिये गमन किया॥ 72 ॥ अनुभाष्य—'पक्षीतीर्थ'—तिरुकालुकुन्द्रम्। चेङ्गलपट्टुसे नौ मील दक्षिण-पूर्वमें, समतल भूमिसे 500 फुट ऊँचे पर्वतमालाके ऊपर एक शिव-मन्दिर है। इस पर्वतका नाम वेदगिरि अथवा वेदाचलम् है और मूर्तिका नाम—वेदगिरिश्वर है। प्रतिदिन दो बाज पक्षी आकर सेवायेत पुजारीसे आहार प्राप्त करते हैं। वहाँ किंवदन्ती है कि अनादिकालसे ही ऐसा चला आ रहा है (चेङ्गलपट्टु म्यानुयेल)। 'वृद्धकोल'—श्रीवराह-विग्रहका मन्दिर; इस मन्दिरकी विशेषता यह है कि यह केवल एक पत्थरसे ही बना है। यह 'महाबलीपुरम्' अथवा 'सप्तमन्दिर'के अन्तर्गत 'बलिपीठम्'से प्रायः एक मील दक्षिणमें है। इस मन्दिरके अन्दर वराहरूपी विष्णुविग्रहके ऊपर 'शेष'-नागने छत्र धारण किया हुआ है॥ 72 ॥ पीताम्बर-शम्भुका दर्शन :— श्वेतवराह देखि', ताँरे नमस्करि'। पीताम्बर-शिव-स्थाने गेला गौरहरि ॥ 73 ॥ अनुवाद—वृद्धकोलमें आकर महाप्रभुने श्वेतवराहका दर्शनकर उन्हें प्रणाम किया। फिर श्रीगौरहरि पीताम्बर शिवजीका दर्शन करनेके लिये गये॥ 73 ॥ अनुभाष्य—'पीताम्बर'—अर्थात् 'चिदाम्बरम्'। यह 'कुडालोर'-नगरसे छब्बीस मील दक्षिणकी ओर स्थित है। विग्रहका नाम—'आकाशलिङ्ग' शिव है। उनतालीस एकड़ जमीनके ऊपर बना हुआ यह एक बहुत बड़ा मन्दिर है। यह चारों ओर साठ फुट चौड़े पक्के रास्तेसे घिरा हुआ है (दक्षिण आर्कट म्यानुयेल) ॥ 73 ॥ शियाली-भैरवीरूपिणी कात्यायनीका दर्शन :— शियाली भैरवी देवी करि' दरशन। कावेरीर तीरे आइला शचीर नन्दन ॥ 74 ॥ 350 ।