भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1210

[ 9/141-149 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला मत करो, श्रीकृष्ण ही 'स्वयं भगवान्' हैं, श्रीमद्भागवत 'चतुर्भुज-मूर्त्ति' देखाय गोपीगणेर आगे। ही इस विषयमें प्रमाण है॥ 141-142 ॥ सेइ 'कृष्णे' गोपिकार नहे अनुरागे ॥ "149 ॥ श्रीमद्भागवत (1/3/28) :- अनुवाद-अपने असाधारण गुणोंके कारण स्वयं एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। भगवान् श्रीकृष्ण लक्ष्मीके मनको हर लेते हैं, परन्तु इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ 143 ॥ श्रीनारायण गोपियोंके मनको नहीं हर सकते। श्रीनारायणकी तो बात ही क्या, गोपियोंके साथ परिहास करनेके लिये अनुवाद-राम-नृसिंहादि, पुरुषावतारके अंश या श्रीकृष्ण नारायण हो गये। नारायण रूप धारण करके कला (अंशके अंश) हैं, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् उन्होंने गोपियोंको 'चतुर्भुज-मूर्ति' दिखलायी। उन (चतुर्भुज) हैं। दैत्योंके द्वारा पीड़ित लोगोंकी प्रत्येक युगमें ये श्रीकृष्णमें भी गोपियोंका अनुराग उत्पन्न नहीं (अवतार) रक्षा करते हैं॥ 143 ॥ हुआ ॥ 147-149 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/67 संख्या देखें॥ 143॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनारायणमें साठ गुण हैं; उन नारायण हैते कृष्णेर असाधारण गुण। गुणोंके ऊपर और भी श्रीकृष्णके चार असाधारण गुण अतएव लक्ष्मीर कृष्णे तृष्णा अनुक्षण ॥ 144 ॥ है, वे श्रीनारायणमें नहीं हैं। जैसे (1) सर्वाद्भुत- चमत्कारलीलासमुद्रविशिष्टता, (2) अतुल्यमधुर-प्रेम- तुमि ये पड़िला श्लोक, से हय प्रमाण। परिशोभितप्रियमण्डलयुक्तता, (3) त्रिजगन्मानसाकर्षि- सेइ श्लोके आइसे 'कृष्ण-स्वयं भगवान्' ॥ 145 ॥ मुरलीगीतपरायणता, (4) चराचरविस्मयकारि-समोर्द्ध- अनुवाद-श्रीकृष्णमें चार असाधारण गुण हैं जो रहितरूप-श्रीयुक्तता। ऐसे असाधारण चार गुणोंसे युक्त श्रीनारायणमें नहीं हैं, इसलिये लक्ष्मी सदा श्रीकृष्णका श्रीकृष्णमें ऐश्वर्यस्वरूपिणी लक्ष्मीकी भी प्रतिक्षण तृष्णा सङ्ग चाहती हैं। आपने जो श्लोक 'सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि--' उत्पन्न होती है। 'सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि' जिस श्लोकका पढ़ा था, वही इस बातका प्रमाण है कि श्रीकृष्ण 'स्वयं तुमने उच्चारण किया है, उसमें ही श्रीकृष्णकी 'स्वयं-भगवत्ता' भगवान्' हैं॥ 144-145 ॥ प्रमाणित होती है। स्वयं-भगवत्तासे युक्त श्रीकृष्ण ही लक्ष्मीके मनका हरण करते हैं। गोपियोंके मनको हरण भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/59) :- करनेके उपयोगी चार गुण श्रीनारायणमें नहीं रहनेपर वे सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि श्रीश-कृष्णस्वरूपयोः। गोपियोंके मनका हरण नहीं कर सकते। नारायणकी रसेनोत्कृष्यते कृष्णरूपमेषा रसस्थितिः ॥ 146 ॥ बात तो दूर रहे, श्रीकृष्ण परिहास करते हुए स्वयं अनुवाद-इसी अध्यायमें 117 संख्या देखें॥ 146॥ नारायणके रूपमें 'प्रकाशित' होनेपर भी गोपियोंका उनमें अनुराग नहीं हुआ। लक्ष्मी श्रीकृष्णका माधुर्य चाहती हैं, परन्तु गोपियाँ चतुर्भुज यहाँ यह विचारणीय है कि श्रीरूपगोस्वामीने नारायणका ऐश्वर्य नहीं चाहती :- 'भक्तिरसामृतसिन्धु'की महाप्रभुके साथ व्येङ्कटभट्टके साथ स्वयं भगवान् 'कृष्ण' हरे लक्ष्मीर मन। साक्षात्तारके अनेक दिनोंके बाद रचना की, तब गोपिकार मन हरिते नारे 'नारायण' ॥ 147 ॥ श्रीव्येङ्कटभट्टने किस प्रकार इस ग्रन्थके श्लोकका स्वयं श्रीकृष्णके चतुर्भुजरूपका भी गोपियों द्वारा अनादर :- प्रमाणके रूपमें पाठ किया था? हम इस प्रकार इसका नारायणेरका कथा, श्रीकृष्ण आपने। समाधान करते हैं- गोपिकारे हास्य कराइते हय 'नारायणे' ॥ 148 ॥ 'भक्तिरसामृतसिन्धु' आदि ग्रन्थोंके जो-जो श्लोक 362 ।