भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1209

नौवाँ अध्याय 9/133-142 ] लक्ष्मीके ऐश्वर्यज्ञानसे श्रीकृष्णका सङ्ग असम्भव :- लक्ष्मी चाहे सेइ देहे कृष्णेर सङ्गम। गोपी-रागानुगा हञा ना कैल भजन ॥ 136 ॥ अन्य देहे ना पाइये रासविलास। अतएव 'नायं' श्लोक कहे वेदव्यास ॥ *137 ॥ अनुवाद—लक्ष्मीजी अपनी उसी देहसे ही श्रीकृष्णका सङ्ग प्राप्त करना चाहती थीं। किन्तु उन्होंने गोपियोंके अनुरागके अनुगत होकर श्रीकृष्णका भजन नहीं किया था। श्रीवेदव्यासने श्रीमद्भागवतमें 'नायं सुखापो-' श्लोक कहा है, क्योंकि गोपीदेहके अतिरिक्त अन्य किसी देहसे श्रीकृष्णके रासमण्डलमें प्रवेश सम्भव नहीं है॥ *136-137 ॥

  • किसी अन्य संस्करणमें 'नायं' से 'नायं श्रियो-' श्लोक लिया गया है। यद्यपि उस श्लोकमें गोपियोंकी महिमा बतलायी गयी है, उनके समान किसी औरका वैसा सौभाग्य नहीं है, परन्तु यह स्पष्ट रूपसे नहीं कहा है कि गोपीदेहके बिना रासमें किसीका प्रवेश सम्भव नहीं है। पहले 'श्रीवैष्णव' सम्प्रदायके व्येङ्कटभट्टकी नारायणकी ही 'स्वयंरूप'के रूपमें धारणा :- पूर्वे भट्टेर मने एक हैत अभिमान। "श्रीनारायण' ह'न स्वयं-भगवान् ॥ 138 ॥ ताँहार भजन सर्वोपरि-कक्षा हय। 'श्री-वैष्णवे'र भजन एइ सर्वोपरि हय ॥ '139 ॥ अनुवाद—पहले व्येङ्कट भट्टके मनमें एक अभिमान था,—“श्रीनारायण' ही स्वयं भगवान् हैं। उनका भजन ही सर्वश्रेष्ठ श्रेणीका है और 'श्रीवैष्णव'-सम्प्रदायकी भजन परिपाटी ही सर्वश्रेष्ठ है ॥' 138-139 ॥ एइ ताँर गर्व प्रभु करिते खण्डन। परिहासद्वारे उठाय एतेक वचन ॥ 140 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उनके इसी गर्वका खण्डन करनेके लिये ही परिहासमें ये सब बातें कहीं॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रुतियाँ श्रीकृष्णके रासमण्डलमें प्रवेश करनेकी चेष्टा करनेपर भी जब सफल नहीं हो पायीं और केवल हृदयगत गोपीभावको लेकर भी जब प्रवेश नहीं कर पायीं, तब बाहरी गोपी-देह और हृदयमें गोपीभाव ग्रहण करके गोपियोंके अनुगत होकर श्रीकृष्णके रासमें प्रविष्ट हुई थीं। श्रीकृष्ण-गोप जातिके हैं, गोपियाँ ही उनकी प्रेयसियाँ हैं, इसलिये ऐश्वर्यमयी देवीके रूपमें या अन्य स्त्रीरूपमें, 'श्रीकृष्णसङ्गम' प्राप्त नहीं होता। लक्ष्मीदेवीने अपनी देवी-देहमें ही श्रीकृष्णके सङ्गमकी प्रार्थना की थी, किन्तु उन्होंने गोपियोंके स्वाभाविक अनुरागके अनुगत होकर भजन नहीं किया। इसलिये वे गोपीसे पृथक् अन्य देहमें रासविलास प्राप्त नहीं कर पायी। इसके सम्बन्धमें श्रीव्यासदेवने “नायं सुखापो भगवान्”—यह श्लोक लिखा है। व्येङ्कट भट्टके मनमें एक अभिमान था कि परव्योममें रहनेवाले श्रीनारायण ही स्वयं भगवान् हैं, उनका भजन ही सर्वोत्तम उपासनाका विशेष स्तर है; इसलिये श्रीसम्प्रदायी वैष्णवोंका भजन ही सर्वोपरि है। इस वृथा गर्वका खण्डन करनेके अभिप्रायसे ही महाप्रभुने परिहासके द्वारा इस विचारको उठाया था ॥ 133-140 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/23-24, 28-115 संख्या और लघुभागवतामृतमें श्रीरूपगोस्वामी प्रभुका विचार आलोच्य है॥ 138-139 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्ण और नारायणकी लीलाके वैशिष्ट्यका वर्णन और श्रीकृष्णके स्वयंरूप होनेकी संस्थापना :- प्रभु कहे,–“भट्ट, तुमि ना करिह संशय। 'स्वयं भगवान्' कृष्ण एइ त' निश्चय ॥ 141 ॥ कृष्णेर विलासमूर्ति-श्रीनारायण। अतएव लक्ष्मी-आद्येर हरे तेंह मन ॥ 142 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,- “श्रीकृष्णकी विलासमूर्ति श्रीनारायण हैं। इसलिये श्रीकृष्ण लक्ष्मी आदि देवियोंके मनका भी हरण करते हैं। भट्ट, तुम कोई भी संशय । 361