श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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[ 9/127–135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला केह ताँरे पुत्र-ज्ञाने उदुखले बान्धे। केह सखा-ज्ञाने जिनि' चड़े ताँर कान्धे ॥ 129 ॥ 'व्रजेन्द्रनन्दन' बलि' ताँरे जाने व्रजजन। ऐश्वर्यज्ञाने नाहि कोन सम्बन्ध-मानन ॥ 130 ॥ व्रजलोकेर भावे येइ करये भजन। सेइ व्रजे पाये शुद्ध व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 131 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/137-158 संख्या एवं मध्यलीला 8/138, 142, 147, 148 संख्या देखें। पयार संख्या 130 की पहली पंक्तिके लिये—आदिलीला 4/33 संख्या, मध्यलीला 8/203–204, 220–222, 226, 228–230 संख्या देखें। पयार संख्या 130 की दूसरी पंक्तिके लिये—आदिलीला 4/21–26 संख्या देखें ॥ 127–130 ॥ श्रीमद्भागवत (10/9/21)— नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः। ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ 132 ॥ अनुवाद—यशोदाके पुत्र भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमान् देहधारियोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, आत्मभूत ज्ञानियोंके लिये वैसे नहीं हैं ॥ 132 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/226 संख्या देखें ॥ 132 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “श्रीकृष्णका एक सजीव लक्षण यह है कि वे अपने माधुर्यके द्वारा सबके चित्तको आकर्षित करते हैं। केवल व्रजवासियोंके भावोंका आनुगत्य करके ही श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति की जा सकती है। व्रजवासी श्रीकृष्णको भगवान् नहीं मानते। कोई उन्हें अपना पुत्र मानकर ऊखलसे बाँध देती हैं, तो कोई उन्हें सखा मानकर खेलमें उनसे जीतकर उनके कन्धेपर चढ़ जाता है। व्रजवासी श्रीकृष्णको व्रजेन्द्रनन्दनके रूपमें ही जानते हैं। ऐश्वर्यज्ञानसे श्रीकृष्णके साथ वे कोई सम्बन्ध नहीं मानते हैं। व्रजवासियोंके भावोंके अनुगत होकर जो श्रीकृष्णका भजन करते हैं, वे ही व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णको प्राप्त करते हैं॥ 127–131 ॥ गोपियोंके आनुगत्यसे श्रुतियोंको रासमें कृष्णसेवा-प्राप्ति :— श्रुतिगण गोपीगणेर अनुगत हञा। व्रजेश्वरीसुत भजे गोपीभाव लञा ॥ 133 ॥ बाह्यान्तरे गोपीदेह व्रजे यबे पाइल। सेइ देहे कृष्णसङ्गे रासक्रीड़ा कैल ॥ 134 ॥ अनुवाद—श्रुतियोंने गोपियोंके अनुगत होकर गोपीभावसे यशोदानन्दनका भजन किया था। जब श्रुतियोंको व्रजमें गोपीदेहकी प्राप्ति हुई, तब उस देहसे उन्होंने श्रीकृष्णके साथ रासक्रीड़ा की थी ॥ 133-134 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'सजीव-लक्षण'—क्रियालक्षण; पाठान्तरमें 'स्वभाव-लक्षण', इसका अर्थ स्पष्ट है। तीसरा पाठान्तर 'स्वभाव-विलक्षण',—श्रीकृष्णका स्वभाव दूसरोंके स्वभावसे भिन्न प्रकारका है, अथवा 'विलक्षण'-शब्दका अर्थ विशेष लक्षण है। 'उदूखल'—ओखली अर्थात् जिसमें धानादि कूटा जाता है। व्रजवासी श्रीकृष्णको 'नन्दनन्दन'के रूपमें जानते हैं। परम ऐश्वर्यशाली 'परमेश्वर'से जो एक अन्य प्रकारका सम्बन्ध है, वे उसे नहीं मानते। व्रजवासियोंके दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन चार प्रकारके भावोंमेंसे कोई भाव ग्रहण करके जो परमतत्त्वका भजन करता है; वह चरम अवस्थामें व्रजेन्द्रनन्दन-श्रीकृष्णको शुद्ध रूपमें व्रजधाममें प्राप्त होता है ॥ 127–131 ॥ गोपीके अतिरिक्त अन्य चिन्मयी स्त्रीके लिये भी मधुर-सेवा-प्राप्ति असम्भव :— गोपजाति कृष्ण, गोपी-प्रेयसी ताँहार। देवी वा अन्य स्त्री कृष्ण ना करे अङ्गीकार ॥ 135 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण गोपजातिके हैं और गोपियाँ उनकी प्रेयसियाँ हैं। श्रीकृष्ण गोपियोंके अतिरिक्त अन्य किसी और देवी या स्त्रीको अङ्गीकार नहीं करते ॥ 135 ॥ 360 ।