श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1207, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय 9/121-128 ] अनुवाद-श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरियोंके प्रति जो कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो क्या कहूँ?॥ 121॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/80 संख्या देखें॥ 121 ॥ गोपियोंके आनुगत्यके बिना लक्ष्मीका श्रीकृष्णके साथ रासविलास असम्भव :- लक्ष्मी केने ना पाइल, इहार कि कारण। तप करि' कैछे कृष्ण पाइल श्रुतिगण ॥ 122 ॥ अनुवाद-तपस्या करके श्रुतियोंने कैसे श्रीकृष्णको रासलीलामें प्राप्त किया? और लक्ष्मीजीको रासमें प्रवेश क्यों नहीं मिला? इसका क्या कारण है? ॥ 122॥ गोपियोंके आनुगत्यसे ही श्रुतियोंको रागमार्गमें श्रीकृष्णसेवाकी प्राप्ति :- श्रीमद्भागवत (10/87/23)- निभृतमरुन्मनोऽक्षदृढ़योगयुजो हृदि य- न्मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः स्मरणात्। स्त्रिय उरगेन्द्र-भोगभुजदण्डविषक्त-धियो वयमपि ते समाः समदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाः ॥ 123 ॥ अनुवाद-मुनियोंने प्राणायामके द्वारा निश्वासको जीतकर मन और इन्द्रियोंको दृढ़रूपसे योगयुक्त करके हृदयमें जिस ब्रह्मकी उपासना की थी, भगवान्के सभी शत्रुओंने भी उनके निरन्तर ध्यानके बलसे उस ब्रह्ममें प्रवेश किया था। व्रजस्त्रियोंने श्रीकृष्णके सर्पके शरीरतुल्य भुजाओंके सौन्दर्यरूप तीव्र विषके द्वारा हतबृद्धि होकर उनके चरणकमलोंकी सुधाको प्राप्त किया था। हमने भी वैसी गोपीदेह प्राप्त करके गोपीभावसे उनके चरणकमलोंकी सुधाका पान किया है॥123॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/223 संख्या देखें ॥ 123 ॥ महाप्रभुके प्रश्नका उत्तर देनेमें भट्टकी असमर्थता :- श्रुति पाय, लक्ष्मी ना पाय, इथे कि कारण।” भट्ट कहे,-"इहा प्रवेशिते नारे मोर मन॥ 124 ॥ आमि जीव, -क्षुद्रबुद्धि, सहजे अस्थिर। ईश्वरेर लीला-कोटिसमुद्र-गम्भीर ॥ 125 ॥ प्रभुकी कृपासे ही प्रभुकी लीलाका ज्ञान :- तुमि साक्षात् सेइ कृष्ण, जान निजकर्म। यारे जानाह, सेइ जाने तोमार लीलामर्म॥" 126 ॥ अनुवाद-(महाप्रभुका प्रश्न-) श्रुतियोंको रासकी प्राप्ति हुई, परन्तु लक्ष्मीजीको नहीं हुई, इसका क्या कारण है?” व्येङ्कट भट्टने कहा, - "इस रहस्यमें प्रवेश करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। मैं एक जीव हूँ जिसकी बुद्धि अल्प और स्वभावतः चञ्चल है। श्रीकृष्णकी लीला करोड़ों समुद्रकी भाँति गम्भीर (गहरी) है, मेरी बुद्धिका उसमें प्रवेश नहीं है। आप साक्षात् वही श्रीकृष्ण हैं, आप ही अपनी लीलाओंके उद्देश्यको जानते हैं। आप जिसे उसे जनाते हैं, वही आपकी लीलाओंके मर्मको जान पाता है॥” 124-126॥ अनुभाष्य-(कठ, 2/23, मुःउः 3/2/3)- “यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।” अर्थात् “जब जीवात्मा भगवान्के प्रति सेवोन्मुख होकर परमात्माकी कृपायाचना करता है, तब उसीके निकट वे परमात्मा अपना स्वयंप्रकाश श्रीविग्रह प्रकट करते हैं ॥ 126 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्ण और व्रजवासियोंके सहज रागात्मक स्वभावका वर्णन :- प्रभु कहे,-"कृष्णेर एक सजीव लक्षण। स्वमाधुर्ये सर्व चित्त करे आकर्षण ॥ 127 ॥ व्रजलोकेर भावे पाइये ताँहार चरण। ताँरे ईश्वर करि' नाहि जाने व्रजजन ॥ 128 ॥ । 359