भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1206, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1206

[ 9/111–121 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [बायाँ स्तम्भ] अनुभाष्य—मध्यलीला 8/146 संख्या देखें॥ 114॥ भट्टका उत्तर, श्रीकृष्णके सङ्गसे नारायण-पत्नीके सतीत्वकी हानिकी असम्भावना :— भट्ट कहे, —“कृष्ण-नारायण—एकइ स्वरूप। कृष्णेते अधिक लीला-वैदग्ध्यादिरूप ॥ 115 ॥ ताँर स्पर्शे नाहि याय पतिव्रता-धर्म। कौतुके लक्ष्मी चाहेन कृष्णेर सङ्गम ॥ 116 ॥ अनुवाद—व्येङ्कट भट्टने कहा, —“श्रीकृष्ण और श्रीनारायण—दोनों एक ही स्वरूप हैं, परन्तु श्रीकृष्णमें लीला-वैदग्ध्यादि अधिक है। कौतुकवशतः श्रीलक्ष्मीने श्रीकृष्णके सङ्गकी इच्छा की, क्योंकि श्रीकृष्णके स्पर्शसे उनका पतिव्रता-धर्म नष्ट नहीं होता ॥ 115–116 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीनारायण ही श्रीकृष्णकी विलास-मूर्ति हैं, इसलिये श्रीकृष्णसे उनका स्वरूप द्विभुज-चतुर्भुजका भेद होनेपर भी पृथक् नहीं है। नारायणमें श्रीकृष्णके समान लालित्य होनेपर भी उनमें श्रीकृष्ण जैसी वैदग्ध्य आदि रूप लीला नहीं है। श्रीकृष्ण ही जब विलासमूर्तिमें श्रीनारायण हैं, तब नारायण-पत्नी-लक्ष्मीका श्रीकृष्ण-स्पर्शसे पतिव्रता-धर्म नहीं नष्ट होता है। इसलिये श्रीकृष्णसङ्गममें लक्ष्मीका कौतुक होना स्वाभाविक ही है ॥ 115–116 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/223 संख्या और मध्यलीला 8/144 संख्या देखें ॥ 111–116 ॥ श्रीकृष्ण और नारायणकी लीलाका वैचित्र्य :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/59)— सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि श्रीश-कृष्णस्वरूपयोः। रसेनोत्कृष्यते कृष्णरूपमेषा रसस्थितिः ॥ 117 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 117 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘श्रीनारायण’ और ‘श्रीकृष्ण’के दो स्वरूपोंमें सिद्धान्तके अनुसार कोई भेद नहीं है, तथापि शृङ्गार-रसविचारसे श्रीकृष्णरूपने ही रसके द्वारा [दायाँ स्तम्भ] उत्कर्षता प्राप्त की है। इसी प्रकार ही रसत्तत्त्वकी स्थापना होती है ॥ 117 ॥ अनुभाष्य— सिद्धान्ततः (वस्तुतत्त्वतः) श्रीश्रीकृष्णस्वरूपयोः (नारायण-कृष्णतत्त्वयोः) अभेदे सति अपि रसेन कृष्णरूपम् (एव) उत्कृष्यते, —एषा रसस्थितिः (रस-स्वभावः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। आदिलीला दूसरा और तीसरा अध्याय एवं लघुभागवतामृत देखें ॥ 117 ॥ कृष्णसङ्गे पतिव्रता-धर्म नहे नाश। अधिक लाभ पाइये, आर रासविलास ॥ 118 ॥ विनोदिनी लक्ष्मीर हय कृष्णे अभिलाष। इहाते कि दोष, केने कर परिहास ॥” 119 ॥ अनुवाद—लक्ष्मीजीने विचार किया कि श्रीकृष्णके सङ्गसे उनका पतिव्रता-धर्म नष्ट नहीं होगा, अपितु श्रीकृष्णका सङ्ग होनेसे रासलीलारूपी अधिक लाभ ही मिलेगा। लक्ष्मीजी विनोदिनी हैं, इसलिये उन्होंने यदि श्रीकृष्णके सङ्गकी अभिलाषा की, तो इसमें क्या दोष है? आप क्यों उनका परिहास कर रहे हैं?” ॥ 118–119 ॥ महाप्रभुका पुनः प्रश्न :— प्रभु कहे, —“दोष नाहि, इहा आमि जानि। रास ना पाइल लक्ष्मी, शास्त्रे इहा शुनि ॥ 120 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“इसमें कोई दोष नहीं है, यह मैं भी जानता हूँ। परन्तु मैंने शास्त्रोंमें सुना है कि लक्ष्मीजीका रासमें प्रवेश नहीं हुआ ॥ 120 ॥ व्रजगोपियोंकी महिमा :— श्रीमद्भागवत (10/47/60)— नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः। स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ- लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम् ॥ 121 ॥ 358 ।

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1206, कुल 2549 में से · BharatKosha