श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1205, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय 9/106-114 ] अनुवाद—तब महाप्रभुने उस ब्राह्मणको शिक्षा दी और कहा, — “मुझे तुमने कृष्ण समझा है, इस बातको किसीके सामने प्रकाशित मत करना ॥” 106 ॥
महाप्रभु-भक्त ब्राह्मण :— सेइ विप्र महाप्रभुर बड़ भक्त हैल। चारि मास प्रभु-सङ्ग कभु ना छाड़िल॥ 107 ॥
अनुवाद—वह ब्राह्मण महाप्रभुका बड़ा भक्त बन गया। चार महीने जब तक महाप्रभु श्रीरङ्गम्में थे, तब तक उस ब्राह्मणने कभी भी उनका साथ नहीं छोड़ा॥ 107 ॥
व्येङ्कटभट्टके घरमें महाप्रभु गौरचन्द्र :— एइमत भट्टगृहे रहे गौरचन्द्र। निरन्तर भट्ट-सङ्गे कृष्णकथानन्द॥ 108 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरचन्द्र व्येङ्कट भट्टके घरमें रहे और निरन्तर कृष्णकथा करते हुए दोनोंने उसका आनन्द लिया॥ 108 ॥
लक्ष्मीनारायण-सेवक श्रीसम्प्रदायी भट्ट :— 'श्री-वैष्णव' भट्ट सेवे लक्ष्मी-नारायण। ताँर भक्ति देखि' प्रभुर तुष्ट हैल मन॥ 109 ॥
अनुवाद—व्येङ्कट भट्ट 'श्रीवैष्णव' सम्प्रदायके थे, इसलिये वे श्रीलक्ष्मी-नारायणकी सेवा करते थे। उनकी भक्तिको देखकर महाप्रभु बहुत सन्तुष्ट हुए॥ 109 ॥
महाप्रभुके साथ उनका सख्यभाव :— निरन्तर ताँर सङ्गे हैल सख्यभाव। हास्य-परिहास दुँहे सख्येरे स्वभाव॥ 110 ॥
अनुवाद—निरन्तर साथ रहनेके कारण महाप्रभु और व्येङ्कट भट्टका साथ सख्यभाव हो गया, इसलिये दोनों कभी सखाकी भाँति हास-परिहास भी करते थे॥ 110 ॥
महाप्रभुकी उनको श्रीकृष्णसेवा-दानकी इच्छा, महाप्रभु और भट्टका संवाद; महाप्रभुका कौतुकपूर्ण प्रश्न—लक्ष्मी और गोपियोंकी श्रीकृष्णसेवाका वैशिष्ट्य :— प्रभु कहे, — “भट्ट, तोमार लक्ष्मी-ठाकुराणी। कान्त-वक्षःस्थिता, पतिव्रता-शिरोमणि॥ 111 ॥
नारायणाश्रित होते हुए भी लक्ष्मीका श्रीकृष्णके माधुर्यसे आकर्षित होकर श्रीकृष्णसङ्ग प्राप्त करनेकी प्रार्थना :— आमार ठाकुर कृष्ण—गोप, गो-चारण। साध्वी हञा केने चाहे ताँहार सङ्गम॥ 112 ॥
इस उद्देश्यसे लक्ष्मीकी कठोर तपस्या :— एइ लागि' सुखभोग छाड़ि' चिरकाल। व्रत-नियम करि' तप करिल अपार ॥” 113 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, “भट्ट! आपकी ठाकुराणी श्रीलक्ष्मी देवी पतिव्रता शिरोमणि हैं और सदा अपने कान्तके वक्षःस्थलपर विराजमान रहती हैं। मेरे ठाकुर श्रीकृष्ण एक गोप हैं और गैया चराते हैं, परन्तु तुम्हारी ठाकुराणी साध्वी होकर भी उनका सङ्ग क्यों चाहती हैं? इसके लिये उन्होंने बहुत लम्बे समय तक वैकुण्ठके समस्त सुख-भोगोंको छोड़कर व्रत लेकर नियमोंका पालन करते हुए बहुत कठोर तपस्या भी की है॥” 111-113 ॥
श्रीमद्भागवत (10/16/36)— कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महे, तवाङ्घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः। यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपो, विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता॥ 114 ॥
अनुवाद—हे देव! जिनकी चरणरजको प्राप्त करनेकी वासनासे कमलाने (लक्ष्मीने) बहुत समय तक समस्त प्रकारके विषय-भोगोंका परित्याग करके दृढ़व्रत धारण करके तपस्या की थी, उस चरणरजको इस कालिय-नागने किस सुकृतिके द्वारा लाभ करनेका अधिकार प्राप्त किया, उसे हम नहीं जानती॥ 114 ॥
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