भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1204, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1204

[ 9/98–106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अर्जुनरे रथे कृष्ण हय रज्जुधर। बसियाछेन ताते—येन श्यामल-सुन्दर ॥ 99 ॥ अर्जुनरे कहिलेन हित-उपदेश। ताँरे देखि' हय मोर आनन्द-आवेश ॥ 100 ॥ यावत् पड़ों, तावत् पाङ ताँर दरशन। एइ लागि' गीता-पाठ ना छाड़े मोर मन॥”101॥ अनुवाद—ब्राह्मणने उत्तर दिया,—“मैं तो मूर्ख हूँ, शब्दोंके अर्थ तक भी नहीं जानता हूँ। मैं तो गुरुदेवकी आज्ञा मानकर भले शुद्ध हो या अशुद्ध, गीताका पाठ करता हूँ। अर्जुनके रथपर श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण, घोड़ेकी लगामको पकड़कर सारथीके रूपमें बैठे हैं और अर्जुनको हितोपदेश दे रहे हैं—उन्हें देखने मात्रसे ही मैं आनन्दसे आविष्ट हो जाता हूँ। जब तक मैं गीताको पढ़ता रहता हूँ, तब तक मुझे उनका दर्शन होता रहता है, इसलिये मेरा मन गीताके पाठको छोड़ना नहीं चाहता॥”98–100॥ महाप्रभुके द्वारा शुद्धचित्त ऐकान्तिक भक्तकी प्रशंसा :— प्रभु कहे,—“गीता-पाठे तोमारइ अधिकार। तुमि से जानह एइ गीतार अर्थ-सार॥”102॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस ब्राह्मणसे कहा,—“गीता-पाठमें वास्तवमें तुम्हारा ही अधिकार है। तुम जो जानते हो, वही गीताका सारार्थ है॥”102॥ अनुभाष्य—भाः 7/5/23 और “भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकया”; “गीताधीता च येनापि भक्तिभावेन चेतसा। वेदशास्त्रपुराणानि तेनाधीतानि सर्वशः॥” आदि एवं (श्वेःउः 6/23)—“यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥” आदि देखें। अर्थात् ‘श्रीमद्भागवत केवल भक्तिके द्वारा ही ग्रहण की जा सकती है—बुद्धि या टीकाके द्वारा नहीं।’ ‘जो भक्तिभावयुक्त चित्तसे श्रीमद्भगवद्गीता अध्ययन करते हैं, वे वेद-पुराणादि सर्वशास्त्र अध्ययन करते हैं।’ ‘जिनकी श्रीभगवान्‌में पराभक्ति है, और जैसी श्रीभगवान्‌में है, श्रीगुरुदेवमें भी वैसी पराभक्ति है, उन महात्माके हृदयमें कहे गये सभी विषय अर्थात् श्रुतियोंके मर्मार्थ प्रकाशित होते हैं॥’102॥ महाप्रभुके द्वारा ब्राह्मणको आलिङ्गन और ब्राह्मणको महाप्रभुमें श्रीकृष्णका ज्ञान :— एत बलि' सेइ विप्रे कैल आलिङ्गन। प्रभु-पद धरि' विप्र करेन रोदन॥ 103॥ “तोमा देखि' ताहा हैते द्विगुण सुख हय। सेइ कृष्ण तुमि,—हेन मोर मने लय॥”104॥ अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभुने उस ब्राह्मणका आलिङ्गन किया और वह ब्राह्मण महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़कर रोते हुए कहने लगा, —“गीता पाठके समय श्रीकृष्णका दर्शन करके मुझे जिस आनन्दकी प्राप्ति होती थी, उससे भी दो गुणा अधिक आनन्दकी प्राप्ति आपके दर्शनसे हो रही है, मेरा मन कहता है कि आप वही श्रीकृष्ण हैं॥”103–104॥ कर्मज्ञान-अन्याभिलाषशून्य छलरहित शुद्ध मन ही वृन्दावन, उसी मनमें ही सम्विद्विग्रह श्रीकृष्णका अधिष्ठान :— कृष्णस्फूर्त्ये ताँर मन हञाछे निर्मल। अतएव प्रभुर तत्त्व जानिल सकल॥ 105 ॥ अनुवाद—गीताका पाठ करते हुए उस ब्राह्मणके हृदयमें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति हुई थी, जिससे उसका हृदय निर्मल हो गया था, इसलिये वह महाप्रभुके तत्त्वके विषयमें सब कुछ जान सका॥ 105॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 6/83–84 संख्या देखें॥ 105 ॥ महाप्रभुकी अपने प्रचारकी निषेधाज्ञाके द्वारा असुर लोगोंकी वञ्चना :— तबे महाप्रभु ताँरे कराइल शिक्षण। “एइ बात काँहा ना करिह प्रकाशन॥”106॥ 356 ।

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1204, कुल 2549 में से · BharatKosha