भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1203

नौवाँ अध्याय 9/94-98 ] ग्रन्थोंमें भगवान् अनन्तदेवके महिमासूचक नामोंका वर्णन है, उसका प्रत्येक श्लोक अथवा आख्यान दूषित अपशब्दादिसे युक्त रहनेपर भी, तथा सुर, मान, लय, ताल आदि साहित्यगत अलङ्कार-गुणोंसे रहित होनेपर भी लोगोंके पापोंका विनाश करता है। ऐसी वाणीका वक्ता मिलनेपर ही साधुजन उसका श्रवण करते हैं, श्रोता मिलनेपर कीर्तन करते हैं और यदि कोई न हो तो स्वयं ही गान करते हैं।” भा: 4/31/21, 11/12/5-9 श्लोक और भा: 2/3/24 “तदश्मसारं” श्लोककी श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरकी ‘सारार्थदर्शिनी' टीका विशेष रूपसे देखें॥ 94-96 ॥ अमृताणुकणिका-(भा: 2/3/24) “तदश्मसारं” श्लोककी ‘सारार्थदर्शिनी' टीका- “जिनमें अनन्तस्वरूप श्रीकृष्णके यशोङ्कित सभी नाम सजे हुए हों, उन श्लोकोंकी सुन्दररूपसे रचना नहीं होनेपर भी, वह वाक्यविन्यास ही जीवोंकी समस्त पापराशिको ध्वंस करता है। साधुजन उसीका श्रवण और कीर्तन करते हैं (भा: 1/5/11)। 'तदश्मसारं' (भा: 2/3/24) श्लोककी सारार्थदर्शिनी टीका-बहुत नाम ग्रहण करनेपर भी चित्त द्रवीभूत न होनेपर वह नामापराधका लक्षण है, ऐसा समझना चाहिये। किन्तु अश्रु, पुलक ही चित्तके द्रवित होनेके लक्षण हैं, ऐसा भी नहीं कहा सकता। क्योंकि श्रीरूपगोस्वामीने कहा है,-“निसर्गापिच्छलस्वान्ते तदभ्यासपरेऽपि च। सत्त्वाभासं बिनापि स्युः क्वाप्यश्रुपुलकादयः॥ (भ:र:सि: 2/3/89) - अर्थात् जिनका हृदय स्वभावतः पिच्छिल (फिसलनेवाला) है और जिन्होंने अश्रु बहाने आदिका अभ्यास किया है, उनके हृदयमें सत्त्वाभासके बिना ही कहीं-कहीं अश्रु-पुलकादि देखे जाते हैं। और फिर, अति गम्भीर महानुभाव-भक्तोंका चित्त हरिनामके द्वारा द्रवित होनेपर भी उनके अनेक समय अश्रु-पुलकादि दिखायी नहीं देते। इसलिये उक्त श्लोककी इस प्रकारसे व्याख्या करनी होगी, - हरिनाम ग्रहण करनेपर बाहरसे अश्रु-पुलकादि विकार दिखायी देनेपर भी जो हृदय विगलित नहीं होता, वह पाषाणके समान है, यही अर्थ है। हृदय-विकारके ये असाधारण लक्षण हैं-“(1) क्षान्तिः, (2) अव्यर्थकालत्वं, (3) विरक्तिः, (4) मानशून्यता, (5) आशाबन्ध, (6) समुत्कण्ठा, (7) नामगाने सदा रुचिः, (8) आसक्तिः तद्गुणाख्याने, (9) प्रीतिः तद्वसतित्थले। इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभावाङ्कुरे जने॥” (भ:र:सि: 1/3/25)। निर्मत्सर उत्तमाधिकारियोंको नामग्रहण-मात्रसे ही नाम-माधुर्य अनुभव होता है, तब उनके हृदयमें विकार होता है। हृदय विकार होनेपर 'क्षान्ति' आदि नौ प्रकार असाधारण लक्षण और अश्रु-पुलकादि साधारण लक्षण प्रकाशित होते हैं। किन्तु मात्सर्यपरायण कनिष्ठाधिकारियोंका चित्त अपराधमय होनेके कारण बहुत नामग्रहणपर भी नामके माधुर्यका अनुभव नहीं होनेसे चित्तमें विकार उत्पन्न नहीं होता। फलस्वरूप उनमें 'क्षान्ति'-आदि (असाधारण) लक्षण सब कभी भी प्रकाशित नहीं होते। अश्रु-पुलकादि साधारण-लक्षण दिखायी देनेपर भी उनका हृदय पाषाणतुल्य कहकर निन्दनीय है। साधुसङ्गसे अनर्थनिवृत्ति, निष्ठा, रुचि आदि भूमिकामें आरूढ़ होनेपर यथाकाल उनका चित्त भी द्रवित होगा और चित्तकी कठोरता दूर होगी। किन्तु जिनका चित्त द्रवित होनेपर भी चित्तकी कठिनता बनी रहती है, उनका रोग अति गम्भीर है, ऐसा जानना होगा॥” 94-96 ॥ उसके भावोंको देखकर महाप्रभुकी कारण-जिज्ञासा :- महाप्रभु पुछिल ताँरे, - “शुन, महाशय। कोन् अर्थ जानि' तोमार एत सुख हय ॥” 97 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने उस ब्राह्मणसे पूछा, - “सुनो महाशय ! गीताके किस अर्थको जानकर आपको इतना आनन्द प्राप्त होता है ॥” 97 ॥ वास्तवसत्यमें विश्वासी ब्राह्मणका सरलरूपसे उत्तर :- विप्र कहे, - “मूर्ख आमि, शब्दार्थ ना जानि। शुद्धाशुद्ध गीता पड़ि, गुरु-आज्ञा मानि ॥ 98 ॥ । 355