श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1202, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 9/87-96 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुके दर्शनके फलसे असंख्य लोगोंको श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :- लक्ष लक्ष लोक आइल नाना-देश हैते। सबे कृष्णनाम कहे प्रभुके देखिते॥ 89 ॥ कृष्णनाम बिना केह नाहि कहे आर। सबे कृष्णभक्त हैल,—लोके चमत्कार ॥ 90 ॥ शुद्धभक्तियोगमें जड़विद्या अथवा पाण्डित्यका अभिमान अथवा कृत्रिम-भावाभास नहीं :- अष्टादशाध्याय पड़े आनन्द-आवेशे। अशुद्ध पड़ेन, लोक करे उपहासे॥ 94 ॥ केह हासे, केह निन्दे, ताहा नाहि माने। आविष्ट हञा गीता पड़े आनन्दित-मने॥ 95 ॥ अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन कावेरीमें स्नान करनेके बाद श्रीरङ्गनाथका दर्शन करते और वहाँ प्रेमावेशमें नृत्य करते। वहाँके सब लोग महाप्रभुके सौन्दर्य आदि और प्रेमावेशको देखने आते और महाप्रभुके दर्शनसे उन सबके दुःख और शोक दूर हो जाते। अनेक स्थानोंसे लाखों-लाखों लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आये। महाप्रभुको देखने मात्रसे ही वे श्रीकृष्णनामका उच्चारण करने लगे। श्रीकृष्णनामके अतिरिक्त कोई कुछ भी नहीं कहता था और इस प्रकार सभी कृष्णभक्त बन गये,—जिसे देखकर लोगोंके हृदयमें चमत्कार हुआ॥ 87-90॥ अनुवाद—उसी स्थानमें एक वैष्णव-ब्राह्मण रहता था। वह प्रतिदिन मन्दिरमें आकर गीताका पाठ करता था। बड़े आनन्दके आवेशमें वह ब्राह्मण गीताके पूरे अठारह अध्यायोंका पाठ करता था, परन्तु वह पाठ शुद्ध नहीं होता था, जिसके कारण लोग उसका उपहास करते थे। कोई उनपर हँसता था, तो कोई उनकी निन्दा करता था, तो भी वह ब्राह्मण गीताका पाठ करना बन्द नहीं करता था। बल्कि प्रेमाविष्ट होकर आनन्दित मनसे गीताको पढ़ता जाता था॥ 93-95॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'वैष्णव-ब्राह्मण'-गोविन्दके कड़चामें (?) इस ब्राह्मणका नाम 'युधिष्ठिर' कहा गया है॥ 93॥ एक-एक वैष्णव ब्राह्मणके घर एक-एक दिन भिक्षा :- श्रीरङ्गक्षेत्रे वैसे यत वैष्णव-ब्राह्मण। एक एक दिन सबे कैल निमन्त्रण ॥ 91 ॥ एक एक दिने चातुर्मास्य पूर्ण हैल। कतक ब्राह्मण भिक्षा दिते ना पाइल ॥ 92 ॥ अनर्थसे निवृत्त एवं चेतनताको प्राप्त करनेवाले व्यक्तिके सात्त्विक-भाव :- पुलकाश्रु, कम्प, स्वेद,—यावत् पठन। देखि' आनन्दित हैल महाप्रभुर मन ॥ 96 ॥ अनुवाद—श्रीरङ्गक्षेत्रमें जितने ब्राह्मण-वैष्णव रहते थे, वे एक-एक दिन करके महाप्रभुको निमन्त्रण करने लगे। एक-एक दिन निमन्त्रण करते-करते चातुर्मास्यका समय पूरा हो गया, परन्तु कुछ ब्राह्मण महाप्रभुको भोजन न करा पाये॥ 91-92॥ अनुवाद—गीताका पाठ करते समय उस ब्राह्मणकी देहमें पुलक, अश्रु, कम्प और स्वेद आदि अष्ट-सात्त्विक भाव उदित हो रहे थे, जिसे देखकर महाप्रभुके मनमें बहुत आनन्द हुआ॥ 96 ॥ अनुभाष्य-(भाः 1/5/11)— “तद्वाग्विसर्गो जनताघविप्लवो यस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि। नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि यत् शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः॥” अर्थात् “इसके विपरीत जिन वाणियों अथवा एक शरणागत सेवोन्मुख ब्राह्मणका गीतापाठ :- सेइ क्षेत्रे रहे एक वैष्णव-ब्राह्मण। देवालये आसि' करे गीता आवर्त्तन ॥ 93 ॥ 354 ।