श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1201, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय 9/79-88 ] किया। राजा गोप्पणने ब्रह्माके समान साधु आचरण करते हुए श्रीरङ्गनाथदेवका उनकी शक्तियों सहित पूजनकी पद्धति स्थापित की॥” 79 ॥ स्नानके पश्चात् रङ्गनाथ-दर्शन और नृत्य-गान :- कावेरीते स्नान करि' देखि' रङ्गनाथ। स्तुति-प्रणति करि' मानिला कृतार्थ ॥ 80 ॥ प्रेमावेशे कैल बहुत गान नर्त्तन। देखि' चमत्कार हैल सब लोकेर मन ॥ 81 ॥ अनुवाद-कावेरीमें स्नान करके महाप्रभुने श्रीरङ्गनाथके दर्शन किये। उन्हें प्रणामकर उनकी स्तुति करके महाप्रभुने स्वयंको कृतार्थ माना। महाप्रभुने वहाँ प्रेमावेशमें बहुत देर तक नृत्य-कीर्तन किया, जिसे देखकर सभी लोगोंके मन चमत्कृत हो गये ॥ 80-81 ॥ अनुभाष्य-कावेरीका जलपान करनेसे भगवद्भक्ति (भा: 11/5/40) देखें ॥ 80 ॥ रङ्गक्षेत्रवासी व्येङ्कटभट्टके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :- श्री-वैष्णव एक, - 'व्येङ्कट भट्ट' नाम। प्रभुरे निमन्त्रण कैल करिया सम्मान ॥ 82 ॥ अनुवाद-श्रीव्येङ्कट भट्ट नामक एक श्रीवैष्णवने आदरपूर्वक महाप्रभुको अपने घरमें निमन्त्रित किया ॥ 82 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्येङ्कटभट्ट, उनके भाई त्रिमल्लभट्ट और प्रबोधानन्द सरस्वती, -ये पहले श्रीसम्प्रदायमें आचार्यरूपमें थे। व्येङ्कटभट्टके पुत्रका नाम ही श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी है॥ 82 ॥ अनुभाष्य- 'श्रीव्येङ्कटभट्ट' - श्रीरङ्गक्षेत्रमें रहनेवाले श्रीसम्प्रदायके एक ब्राह्मण थे। 'श्रीरङ्ग'-तमिलदेशके अन्तर्गत है, इसलिये वहाँके निवासियोंके 'व्येङ्कट', 'तिरुमलय' आदि नाम आजकल नहीं होते। ये वंश सम्भवतः कुछ समय पहलेसे ही श्रीरङ्गममें वास करने लगे थे। 'व्येङ्कटभट्ट' - 'बड़गलइ' शाखामें रामानुजीय-वैष्णव थे। इनके एक और भ्राता - त्रिदण्डी रामानुजीयाचार्य स्वामी श्रीपाद प्रबोधानन्द सरस्वती थे। व्येङ्कटके पुत्र ही श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी हैं। आदिलीला 10/105 संख्या और श्रीभक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्ग देखें॥ 82 ॥ व्येङ्कटभट्टके द्वारा महाप्रभुकी सेवा और उनको अपने घरमें चातुर्मास्य व्रत पालन करनेकी प्रार्थना :- निज-घरे लञा कैल पादप्रक्षालन। सेइ जल लञा कैल सवंशे भक्षण॥ 83 ॥ भिक्षा कराञा किछु कैल निवेदन। “चातुर्मास्य आसिं', प्रभु, हैल उपसन्न ॥ 84 ॥ चातुर्मास्ये कृपा करि' रह मोर घरे। कृष्णकथा कहिं' कृपाय उद्धार' आमारे॥” 85 ॥ अनुवाद-श्रीव्येङ्कट भट्टने महाप्रभुको अपने घर ले जाकर उनके श्रीचरणोंको धोया और उसी जलको (चरणामृतको) अपने वंशसहित पान किया। महाप्रभुको भोजन करानेके बाद उन्होंने उनसे कुछ निवेदन किया,-“प्रभो! चातुर्मास्यका समय आ गया है। ये चार मास आप कृपा करके मेरे घरपर ही रहिये और कृष्णकथा कहकर कृपया हम सबका उद्धार कीजिये॥” 83-85 ॥ व्येङ्कटभट्टके घरमें महाप्रभुके द्वारा चातुर्मास्य यापन :- ताँर घरे रहिला प्रभु कृष्णकथा-रसे। भट्टसङ्गे गोङाइल सुखे चारि मासे ॥ 86 ॥ अनुवाद-महाप्रभु व्येङ्कट भट्टके अनुरोधपर उनके घरमें रहे। उन्होंने व्येङ्कट भट्ट और उनके परिवारके साथ कृष्णकथाके रसमें निमग्न होकर सुखपूर्वक चार मास बिताये ॥ 86 ॥ प्रतिदिन श्रीरङ्गनाथका दर्शन :- कावेरीते स्नान करि' श्रीरङ्ग-दर्शन। प्रतिदिन प्रेमावेशे करेन नर्त्तन ॥ 87 ॥ महाप्रभु-दर्शनसे लोगोंको अशोक-अभय-अमृत-प्राप्ति :- सौन्दर्यादि प्रेमावेश देखि' सर्वलोक। देखिबारे आइसे, देखे, खण्डे दुःख-शोक ॥ 88 ॥ । 353