श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 9/79 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
पश्चिममें पापनाशन-नामक एक नगर है। इसी स्थानपर ही एक मन्दिरके निकट ताम्रपर्णी-नदी पहाड़से समतल भूमिपर आ गयी है। (तिनेभेलि म्यानुयेल)। 'श्रीरङ्गक्षेत्र'-त्रिचिनपल्लीके निकट कावेरी या कोलिरन-नदीके ऊपर श्रीरङ्गम अवस्थित है। यह ताञ्जोर जिलेमें कुम्भकोणम्से चार-पाँच कोस पश्चिममें है। श्रीरङ्गनाथजीका मन्दिर भारतके समस्त मन्दिरोंकी अपेक्षा बड़ा है; इसकी सात प्राचीर हैं। श्रीरङ्गमके सात रास्तोंके पुराने नाम- (1) धर्मका पथ। (2) राजमहेन्द्रका पथ। (3) कुलशेखरका पथ। (4) आलिनाड़नका पथ। (5) तिरुविक्रमका पथ। (6) माड़माड़ि-गाइसका तिरुविडि पथ। और (7) अड़इयावलइन्दानका पथ। चोलराज आदिकुलोत्तुङ्गसे पहले राजमहेन्द्रने राज्य किया था; उससे पहले धर्मवर्मने और उससे पहले श्रीरङ्गमका पतन हुआ था। कुलशेखर आदि कुछ व्यक्तियों और आलवान्दारुने श्रीरङ्ग-मन्दिरमें वास किया था। यामुनाचार्य, श्रीरामानुज, सुदर्शनाचार्य आदिने श्रीरङ्गनाथकी सेवाकी प्रधान अध्यक्षता की थी। लक्ष्मीकी अवतार 'गोदादेवी'-जो बारह सिद्ध दिव्यसूरियोंमेंसे एक हैं, उन्होंने श्रीरङ्गनाथके साथ विवाह करके भगवद्-देहमें प्रवेश किया। कार्मुक-अवतार तिरुमङ्गइ आलोवरने दस्यु-वृत्तिके द्वारा एकत्रित धनसे श्रीरङ्गनाथ मन्दिरकी चौथी प्राचीर और अन्यान्य गृहादिका निर्माण करवाया था। कहा जाता है, -289 कल्याब्दमें तोन्डरडिप्पडि आलोवर जन्म ग्रहण करके भक्तिसाधन करते-करते किसी वेश्याके प्रलोभनसे पतित हुए। श्रीरङ्गनाथने अपने सेवककी दुर्दशा देखकर उसके उद्धारकी अभिलाषासे अपने एक सोनेके बर्तनको किसी सेवक द्वारा उस स्त्री (वेश्या)के घरमें भेज दिया। मन्दिरमें सोनेके बर्तनको नहीं देखनेपर बहुत खोज-बीन करनेपर वह उस स्त्रीके घरमें मिला। श्रीरङ्गनाथकी उस स्त्रीपर कृपा देखकर भक्तका भ्रम दूर हुआ। तिरुमङ्गइके आविर्भाव कालसे पहले इन्होंने रङ्गनाथ मन्दिरकी तीसरी प्राचीरका निर्माण करवाया और वहाँ इन्होंने तुलसीके बगीचेकी रचना की थी। श्रीरामानुजके शिष्य-कुरेश, उनके सबसे छोटे पुत्र-श्रीरामपिल्लाइ, उनके पुत्र-वाग्विजय भट्ट, उनके पुत्र-वेदव्यास भट्ट या श्रीसुदर्शनाचार्य हैं। इन महात्माकी वृद्धावस्थाके समय मुसलमानोंने रङ्गनाथ मन्दिरपर आक्रमण किया और बारह हजार श्रीवैष्णवोंको मार डाला। तब श्रीरङ्गनाथदेवको तिरुपतिमें स्थानान्तरित किया गया था। विजयनगर राज्यके अधीन गिङ्गिके शासनकर्त्ता श्रीवैष्णव ब्राह्मण 'कम्पन्न उदय' या 'गोप्पणार्य' ने श्रीवैष्णवोंकी प्रार्थनापर श्रीरङ्गनाथदेवको 'तिरुपति'से 'सिंहब्रह्म'में लाकर तीन वर्ष तक रखा और बादमें 1293 शकाब्दमें श्रीरङ्गक्षेत्रमें पुनः प्रतिष्ठित किया। श्रीरङ्गनाथ मन्दिरके प्राचीरके पूर्व भागमें श्रील वेदान्त-देशिकके द्वारा रचित यह श्लोक खुदा हुआ है, जैसे- “आनीय नीलशृङ्गद्युतिरचित-जगद्भ्रान्तादञ्जनाद्रेः श्रेण्यामाराध्य कञ्चित् समयमथ निहत्योद्धनुष्कांस्तुलुष्कान्। लक्ष्मी-क्ष्माभ्यामुभाभ्यां सह निजनगरे स्थापयन् रङ्गनाथं सम्यग्वर्यां सपर्यां पुनरकृतयशो दर्पणे गोप्पणार्यः ॥ ” “विश्वेशं रङ्गराजं वृषभगिरितटात् गोप्पणः क्षौणिदेवो नीत्वा स्वां राजधानीं निजबलनिहतोत्सिक्त-तौलुष्कसैन्यः। कृत्वा श्रीरङ्गभूमिं कृतयुगसहितां तन्तु लक्ष्मी-महीभ्यां संस्थाप्यास्यां सरोजोद्भवं इव कुरुत साधुचर्यां सपर्याम् ॥ ” अर्थात् “गोप्पणार्यने तलुष्क लोगोंको मारकर जगत्को आनन्द देनेवाले नीलशृङ्गद्युतिसे रचित श्रीरङ्गनाथदेवको अञ्जन पर्वतकी श्रेणीसे लाकर लक्ष्मी और भूदेवीके साथ अपने नगरमें स्थापित किया। उन्होंने श्रेष्ठ अर्चन पद्धतिसे उनकी कुछ समय तक वहाँ सेवा की। अभिमानी तौलुष्क राज्यकी सेनाका निजबलसे नाश करनेवाले पृथिवीपति गोप्पणने तब जगदीश श्रीरङ्गनाथको वृषभगिरितटसे लाकर सत्ययुगके गुणोंसे युक्त अपनी राजधानी श्रीरङ्गक्षेत्रमें लक्ष्मी और भूदेवीके साथ स्थापित
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