श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 9/79 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
पश्चिममें पापनाशन-नामक एक नगर है। इसी स्थानपर ही एक मन्दिरके निकट ताम्रपर्णी-नदी पहाड़से समतल भूमिपर आ गयी है। (तिनेभेलि म्यानुयेल)। 'श्रीरङ्गक्षेत्र'-त्रिचिनपल्लीके निकट कावेरी या कोलिरन-नदीके ऊपर श्रीरङ्गम अवस्थित है। यह ताञ्जोर जिलेमें कुम्भकोणम्से चार-पाँच कोस पश्चिममें है। श्रीरङ्गनाथजीका मन्दिर भारतके समस्त मन्दिरोंकी अपेक्षा बड़ा है; इसकी सात प्राचीर हैं। श्रीरङ्गमके सात रास्तोंके पुराने नाम- (1) धर्मका पथ। (2) राजमहेन्द्रका पथ। (3) कुलशेखरका पथ। (4) आलिनाड़नका पथ। (5) तिरुविक्रमका पथ। (6) माड़माड़ि-गाइसका तिरुविडि पथ। और (7) अड़इयावलइन्दानका पथ। चोलराज आदिकुलोत्तुङ्गसे पहले राजमहेन्द्रने राज्य किया था; उससे पहले धर्मवर्मने और उससे पहले श्रीरङ्गमका पतन हुआ था। कुलशेखर आदि कुछ व्यक्तियों और आलवान्दारुने श्रीरङ्ग-मन्दिरमें वास किया था। यामुनाचार्य, श्रीरामानुज, सुदर्शनाचार्य आदिने श्रीरङ्गनाथकी सेवाकी प्रधान अध्यक्षता की थी। लक्ष्मीकी अवतार 'गोदादेवी'-जो बारह सिद्ध दिव्यसूरियोंमेंसे एक हैं, उन्होंने श्रीरङ्गनाथके साथ विवाह करके भगवद्-देहमें प्रवेश किया। कार्मुक-अवतार तिरुमङ्गइ आलोवरने दस्यु-वृत्तिके द्वारा एकत्रित धनसे श्रीरङ्गनाथ मन्दिरकी चौथी प्राचीर और अन्यान्य गृहादिका निर्माण करवाया था। कहा जाता है, -289 कल्याब्दमें तोन्डरडिप्पडि आलोवर जन्म ग्रहण करके भक्तिसाधन करते-करते किसी वेश्याके प्रलोभनसे पतित हुए। श्रीरङ्गनाथने अपने सेवककी दुर्दशा देखकर उसके उद्धारकी अभिलाषासे अपने एक सोनेके बर्तनको किसी सेवक द्वारा उस स्त्री (वेश्या)के घरमें भेज दिया। मन्दिरमें सोनेके बर्तनको नहीं देखनेपर बहुत खोज-बीन करनेपर वह उस स्त्रीके घरमें मिला। श्रीरङ्गनाथकी उस स्त्रीपर कृपा देखकर भक्तका भ्रम दूर हुआ। तिरुमङ्गइके आविर्भाव कालसे पहले इन्होंने रङ्गनाथ मन्दिरकी तीसरी प्राचीरका निर्माण करवाया और वहाँ इन्होंने तुलसीके बगीचेकी रचना की थी। श्रीरामानुजके शिष्य-कुरेश, उनके सबसे छोटे पुत्र-श्रीरामपिल्लाइ, उनके पुत्र-वाग्विजय भट्ट, उनके पुत्र-वेदव्यास भट्ट या श्रीसुदर्शनाचार्य हैं। इन महात्माकी वृद्धावस्थाके समय मुसलमानोंने रङ्गनाथ मन्दिरपर आक्रमण किया और बारह हजार श्रीवैष्णवोंको मार डाला। तब श्रीरङ्गनाथदेवको तिरुपतिमें स्थानान्तरित किया गया था। विजयनगर राज्यके अधीन गिङ्गिके शासनकर्त्ता श्रीवैष्णव ब्राह्मण 'कम्पन्न उदय' या 'गोप्पणार्य' ने श्रीवैष्णवोंकी प्रार्थनापर श्रीरङ्गनाथदेवको 'तिरुपति'से 'सिंहब्रह्म'में लाकर तीन वर्ष तक रखा और बादमें 1293 शकाब्दमें श्रीरङ्गक्षेत्रमें पुनः प्रतिष्ठित किया। श्रीरङ्गनाथ मन्दिरके प्राचीरके पूर्व भागमें श्रील वेदान्त-देशिकके द्वारा रचित यह श्लोक खुदा हुआ है, जैसे- “आनीय नीलशृङ्गद्युतिरचित-जगद्भ्रान्तादञ्जनाद्रेः श्रेण्यामाराध्य कञ्चित् समयमथ निहत्योद्धनुष्कांस्तुलुष्कान्। लक्ष्मी-क्ष्माभ्यामुभाभ्यां सह निजनगरे स्थापयन् रङ्गनाथं सम्यग्वर्यां सपर्यां पुनरकृतयशो दर्पणे गोप्पणार्यः ॥ ” “विश्वेशं रङ्गराजं वृषभगिरितटात् गोप्पणः क्षौणिदेवो नीत्वा स्वां राजधानीं निजबलनिहतोत्सिक्त-तौलुष्कसैन्यः। कृत्वा श्रीरङ्गभूमिं कृतयुगसहितां तन्तु लक्ष्मी-महीभ्यां संस्थाप्यास्यां सरोजोद्भवं इव कुरुत साधुचर्यां सपर्याम् ॥ ” अर्थात् “गोप्पणार्यने तलुष्क लोगोंको मारकर जगत्को आनन्द देनेवाले नीलशृङ्गद्युतिसे रचित श्रीरङ्गनाथदेवको अञ्जन पर्वतकी श्रेणीसे लाकर लक्ष्मी और भूदेवीके साथ अपने नगरमें स्थापित किया। उन्होंने श्रेष्ठ अर्चन पद्धतिसे उनकी कुछ समय तक वहाँ सेवा की। अभिमानी तौलुष्क राज्यकी सेनाका निजबलसे नाश करनेवाले पृथिवीपति गोप्पणने तब जगदीश श्रीरङ्गनाथको वृषभगिरितटसे लाकर सत्ययुगके गुणोंसे युक्त अपनी राजधानी श्रीरङ्गक्षेत्रमें लक्ष्मी और भूदेवीके साथ स्थापित
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नौवाँ अध्याय 9/79-88 ] किया। राजा गोप्पणने ब्रह्माके समान साधु आचरण करते हुए श्रीरङ्गनाथदेवका उनकी शक्तियों सहित पूजनकी पद्धति स्थापित की॥” 79 ॥ स्नानके पश्चात् रङ्गनाथ-दर्शन और नृत्य-गान :- कावेरीते स्नान करि' देखि' रङ्गनाथ। स्तुति-प्रणति करि' मानिला कृतार्थ ॥ 80 ॥ प्रेमावेशे कैल बहुत गान नर्त्तन। देखि' चमत्कार हैल सब लोकेर मन ॥ 81 ॥ अनुवाद-कावेरीमें स्नान करके महाप्रभुने श्रीरङ्गनाथके दर्शन किये। उन्हें प्रणामकर उनकी स्तुति करके महाप्रभुने स्वयंको कृतार्थ माना। महाप्रभुने वहाँ प्रेमावेशमें बहुत देर तक नृत्य-कीर्तन किया, जिसे देखकर सभी लोगोंके मन चमत्कृत हो गये ॥ 80-81 ॥ अनुभाष्य-कावेरीका जलपान करनेसे भगवद्भक्ति (भा: 11/5/40) देखें ॥ 80 ॥ रङ्गक्षेत्रवासी व्येङ्कटभट्टके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :- श्री-वैष्णव एक, - 'व्येङ्कट भट्ट' नाम। प्रभुरे निमन्त्रण कैल करिया सम्मान ॥ 82 ॥ अनुवाद-श्रीव्येङ्कट भट्ट नामक एक श्रीवैष्णवने आदरपूर्वक महाप्रभुको अपने घरमें निमन्त्रित किया ॥ 82 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्येङ्कटभट्ट, उनके भाई त्रिमल्लभट्ट और प्रबोधानन्द सरस्वती, -ये पहले श्रीसम्प्रदायमें आचार्यरूपमें थे। व्येङ्कटभट्टके पुत्रका नाम ही श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी है॥ 82 ॥ अनुभाष्य- 'श्रीव्येङ्कटभट्ट' - श्रीरङ्गक्षेत्रमें रहनेवाले श्रीसम्प्रदायके एक ब्राह्मण थे। 'श्रीरङ्ग'-तमिलदेशके अन्तर्गत है, इसलिये वहाँके निवासियोंके 'व्येङ्कट', 'तिरुमलय' आदि नाम आजकल नहीं होते। ये वंश सम्भवतः कुछ समय पहलेसे ही श्रीरङ्गममें वास करने लगे थे। 'व्येङ्कटभट्ट' - 'बड़गलइ' शाखामें रामानुजीय-वैष्णव थे। इनके एक और भ्राता - त्रिदण्डी रामानुजीयाचार्य स्वामी श्रीपाद प्रबोधानन्द सरस्वती थे। व्येङ्कटके पुत्र ही श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी हैं। आदिलीला 10/105 संख्या और श्रीभक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्ग देखें॥ 82 ॥ व्येङ्कटभट्टके द्वारा महाप्रभुकी सेवा और उनको अपने घरमें चातुर्मास्य व्रत पालन करनेकी प्रार्थना :- निज-घरे लञा कैल पादप्रक्षालन। सेइ जल लञा कैल सवंशे भक्षण॥ 83 ॥ भिक्षा कराञा किछु कैल निवेदन। “चातुर्मास्य आसिं', प्रभु, हैल उपसन्न ॥ 84 ॥ चातुर्मास्ये कृपा करि' रह मोर घरे। कृष्णकथा कहिं' कृपाय उद्धार' आमारे॥” 85 ॥ अनुवाद-श्रीव्येङ्कट भट्टने महाप्रभुको अपने घर ले जाकर उनके श्रीचरणोंको धोया और उसी जलको (चरणामृतको) अपने वंशसहित पान किया। महाप्रभुको भोजन करानेके बाद उन्होंने उनसे कुछ निवेदन किया,-“प्रभो! चातुर्मास्यका समय आ गया है। ये चार मास आप कृपा करके मेरे घरपर ही रहिये और कृष्णकथा कहकर कृपया हम सबका उद्धार कीजिये॥” 83-85 ॥ व्येङ्कटभट्टके घरमें महाप्रभुके द्वारा चातुर्मास्य यापन :- ताँर घरे रहिला प्रभु कृष्णकथा-रसे। भट्टसङ्गे गोङाइल सुखे चारि मासे ॥ 86 ॥ अनुवाद-महाप्रभु व्येङ्कट भट्टके अनुरोधपर उनके घरमें रहे। उन्होंने व्येङ्कट भट्ट और उनके परिवारके साथ कृष्णकथाके रसमें निमग्न होकर सुखपूर्वक चार मास बिताये ॥ 86 ॥ प्रतिदिन श्रीरङ्गनाथका दर्शन :- कावेरीते स्नान करि' श्रीरङ्ग-दर्शन। प्रतिदिन प्रेमावेशे करेन नर्त्तन ॥ 87 ॥ महाप्रभु-दर्शनसे लोगोंको अशोक-अभय-अमृत-प्राप्ति :- सौन्दर्यादि प्रेमावेश देखि' सर्वलोक। देखिबारे आइसे, देखे, खण्डे दुःख-शोक ॥ 88 ॥ । 353
[ 9/87-96 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुके दर्शनके फलसे असंख्य लोगोंको श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :- लक्ष लक्ष लोक आइल नाना-देश हैते। सबे कृष्णनाम कहे प्रभुके देखिते॥ 89 ॥ कृष्णनाम बिना केह नाहि कहे आर। सबे कृष्णभक्त हैल,—लोके चमत्कार ॥ 90 ॥ शुद्धभक्तियोगमें जड़विद्या अथवा पाण्डित्यका अभिमान अथवा कृत्रिम-भावाभास नहीं :- अष्टादशाध्याय पड़े आनन्द-आवेशे। अशुद्ध पड़ेन, लोक करे उपहासे॥ 94 ॥ केह हासे, केह निन्दे, ताहा नाहि माने। आविष्ट हञा गीता पड़े आनन्दित-मने॥ 95 ॥ अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन कावेरीमें स्नान करनेके बाद श्रीरङ्गनाथका दर्शन करते और वहाँ प्रेमावेशमें नृत्य करते। वहाँके सब लोग महाप्रभुके सौन्दर्य आदि और प्रेमावेशको देखने आते और महाप्रभुके दर्शनसे उन सबके दुःख और शोक दूर हो जाते। अनेक स्थानोंसे लाखों-लाखों लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आये। महाप्रभुको देखने मात्रसे ही वे श्रीकृष्णनामका उच्चारण करने लगे। श्रीकृष्णनामके अतिरिक्त कोई कुछ भी नहीं कहता था और इस प्रकार सभी कृष्णभक्त बन गये,—जिसे देखकर लोगोंके हृदयमें चमत्कार हुआ॥ 87-90॥ अनुवाद—उसी स्थानमें एक वैष्णव-ब्राह्मण रहता था। वह प्रतिदिन मन्दिरमें आकर गीताका पाठ करता था। बड़े आनन्दके आवेशमें वह ब्राह्मण गीताके पूरे अठारह अध्यायोंका पाठ करता था, परन्तु वह पाठ शुद्ध नहीं होता था, जिसके कारण लोग उसका उपहास करते थे। कोई उनपर हँसता था, तो कोई उनकी निन्दा करता था, तो भी वह ब्राह्मण गीताका पाठ करना बन्द नहीं करता था। बल्कि प्रेमाविष्ट होकर आनन्दित मनसे गीताको पढ़ता जाता था॥ 93-95॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'वैष्णव-ब्राह्मण'-गोविन्दके कड़चामें (?) इस ब्राह्मणका नाम 'युधिष्ठिर' कहा गया है॥ 93॥ एक-एक वैष्णव ब्राह्मणके घर एक-एक दिन भिक्षा :- श्रीरङ्गक्षेत्रे वैसे यत वैष्णव-ब्राह्मण। एक एक दिन सबे कैल निमन्त्रण ॥ 91 ॥ एक एक दिने चातुर्मास्य पूर्ण हैल। कतक ब्राह्मण भिक्षा दिते ना पाइल ॥ 92 ॥ अनर्थसे निवृत्त एवं चेतनताको प्राप्त करनेवाले व्यक्तिके सात्त्विक-भाव :- पुलकाश्रु, कम्प, स्वेद,—यावत् पठन। देखि' आनन्दित हैल महाप्रभुर मन ॥ 96 ॥ अनुवाद—श्रीरङ्गक्षेत्रमें जितने ब्राह्मण-वैष्णव रहते थे, वे एक-एक दिन करके महाप्रभुको निमन्त्रण करने लगे। एक-एक दिन निमन्त्रण करते-करते चातुर्मास्यका समय पूरा हो गया, परन्तु कुछ ब्राह्मण महाप्रभुको भोजन न करा पाये॥ 91-92॥ अनुवाद—गीताका पाठ करते समय उस ब्राह्मणकी देहमें पुलक, अश्रु, कम्प और स्वेद आदि अष्ट-सात्त्विक भाव उदित हो रहे थे, जिसे देखकर महाप्रभुके मनमें बहुत आनन्द हुआ॥ 96 ॥ अनुभाष्य-(भाः 1/5/11)— “तद्वाग्विसर्गो जनताघविप्लवो यस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि। नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि यत् शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः॥” अर्थात् “इसके विपरीत जिन वाणियों अथवा एक शरणागत सेवोन्मुख ब्राह्मणका गीतापाठ :- सेइ क्षेत्रे रहे एक वैष्णव-ब्राह्मण। देवालये आसि' करे गीता आवर्त्तन ॥ 93 ॥ 354 ।
नौवाँ अध्याय 9/94-98 ] ग्रन्थोंमें भगवान् अनन्तदेवके महिमासूचक नामोंका वर्णन है, उसका प्रत्येक श्लोक अथवा आख्यान दूषित अपशब्दादिसे युक्त रहनेपर भी, तथा सुर, मान, लय, ताल आदि साहित्यगत अलङ्कार-गुणोंसे रहित होनेपर भी लोगोंके पापोंका विनाश करता है। ऐसी वाणीका वक्ता मिलनेपर ही साधुजन उसका श्रवण करते हैं, श्रोता मिलनेपर कीर्तन करते हैं और यदि कोई न हो तो स्वयं ही गान करते हैं।” भा: 4/31/21, 11/12/5-9 श्लोक और भा: 2/3/24 “तदश्मसारं” श्लोककी श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरकी ‘सारार्थदर्शिनी' टीका विशेष रूपसे देखें॥ 94-96 ॥ अमृताणुकणिका-(भा: 2/3/24) “तदश्मसारं” श्लोककी ‘सारार्थदर्शिनी' टीका- “जिनमें अनन्तस्वरूप श्रीकृष्णके यशोङ्कित सभी नाम सजे हुए हों, उन श्लोकोंकी सुन्दररूपसे रचना नहीं होनेपर भी, वह वाक्यविन्यास ही जीवोंकी समस्त पापराशिको ध्वंस करता है। साधुजन उसीका श्रवण और कीर्तन करते हैं (भा: 1/5/11)। 'तदश्मसारं' (भा: 2/3/24) श्लोककी सारार्थदर्शिनी टीका-बहुत नाम ग्रहण करनेपर भी चित्त द्रवीभूत न होनेपर वह नामापराधका लक्षण है, ऐसा समझना चाहिये। किन्तु अश्रु, पुलक ही चित्तके द्रवित होनेके लक्षण हैं, ऐसा भी नहीं कहा सकता। क्योंकि श्रीरूपगोस्वामीने कहा है,-“निसर्गापिच्छलस्वान्ते तदभ्यासपरेऽपि च। सत्त्वाभासं बिनापि स्युः क्वाप्यश्रुपुलकादयः॥ (भ:र:सि: 2/3/89) - अर्थात् जिनका हृदय स्वभावतः पिच्छिल (फिसलनेवाला) है और जिन्होंने अश्रु बहाने आदिका अभ्यास किया है, उनके हृदयमें सत्त्वाभासके बिना ही कहीं-कहीं अश्रु-पुलकादि देखे जाते हैं। और फिर, अति गम्भीर महानुभाव-भक्तोंका चित्त हरिनामके द्वारा द्रवित होनेपर भी उनके अनेक समय अश्रु-पुलकादि दिखायी नहीं देते। इसलिये उक्त श्लोककी इस प्रकारसे व्याख्या करनी होगी, - हरिनाम ग्रहण करनेपर बाहरसे अश्रु-पुलकादि विकार दिखायी देनेपर भी जो हृदय विगलित नहीं होता, वह पाषाणके समान है, यही अर्थ है। हृदय-विकारके ये असाधारण लक्षण हैं-“(1) क्षान्तिः, (2) अव्यर्थकालत्वं, (3) विरक्तिः, (4) मानशून्यता, (5) आशाबन्ध, (6) समुत्कण्ठा, (7) नामगाने सदा रुचिः, (8) आसक्तिः तद्गुणाख्याने, (9) प्रीतिः तद्वसतित्थले। इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभावाङ्कुरे जने॥” (भ:र:सि: 1/3/25)। निर्मत्सर उत्तमाधिकारियोंको नामग्रहण-मात्रसे ही नाम-माधुर्य अनुभव होता है, तब उनके हृदयमें विकार होता है। हृदय विकार होनेपर 'क्षान्ति' आदि नौ प्रकार असाधारण लक्षण और अश्रु-पुलकादि साधारण लक्षण प्रकाशित होते हैं। किन्तु मात्सर्यपरायण कनिष्ठाधिकारियोंका चित्त अपराधमय होनेके कारण बहुत नामग्रहणपर भी नामके माधुर्यका अनुभव नहीं होनेसे चित्तमें विकार उत्पन्न नहीं होता। फलस्वरूप उनमें 'क्षान्ति'-आदि (असाधारण) लक्षण सब कभी भी प्रकाशित नहीं होते। अश्रु-पुलकादि साधारण-लक्षण दिखायी देनेपर भी उनका हृदय पाषाणतुल्य कहकर निन्दनीय है। साधुसङ्गसे अनर्थनिवृत्ति, निष्ठा, रुचि आदि भूमिकामें आरूढ़ होनेपर यथाकाल उनका चित्त भी द्रवित होगा और चित्तकी कठोरता दूर होगी। किन्तु जिनका चित्त द्रवित होनेपर भी चित्तकी कठिनता बनी रहती है, उनका रोग अति गम्भीर है, ऐसा जानना होगा॥” 94-96 ॥ उसके भावोंको देखकर महाप्रभुकी कारण-जिज्ञासा :- महाप्रभु पुछिल ताँरे, - “शुन, महाशय। कोन् अर्थ जानि' तोमार एत सुख हय ॥” 97 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने उस ब्राह्मणसे पूछा, - “सुनो महाशय ! गीताके किस अर्थको जानकर आपको इतना आनन्द प्राप्त होता है ॥” 97 ॥ वास्तवसत्यमें विश्वासी ब्राह्मणका सरलरूपसे उत्तर :- विप्र कहे, - “मूर्ख आमि, शब्दार्थ ना जानि। शुद्धाशुद्ध गीता पड़ि, गुरु-आज्ञा मानि ॥ 98 ॥ । 355
[ 9/98–106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अर्जुनरे रथे कृष्ण हय रज्जुधर। बसियाछेन ताते—येन श्यामल-सुन्दर ॥ 99 ॥ अर्जुनरे कहिलेन हित-उपदेश। ताँरे देखि' हय मोर आनन्द-आवेश ॥ 100 ॥ यावत् पड़ों, तावत् पाङ ताँर दरशन। एइ लागि' गीता-पाठ ना छाड़े मोर मन॥”101॥ अनुवाद—ब्राह्मणने उत्तर दिया,—“मैं तो मूर्ख हूँ, शब्दोंके अर्थ तक भी नहीं जानता हूँ। मैं तो गुरुदेवकी आज्ञा मानकर भले शुद्ध हो या अशुद्ध, गीताका पाठ करता हूँ। अर्जुनके रथपर श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण, घोड़ेकी लगामको पकड़कर सारथीके रूपमें बैठे हैं और अर्जुनको हितोपदेश दे रहे हैं—उन्हें देखने मात्रसे ही मैं आनन्दसे आविष्ट हो जाता हूँ। जब तक मैं गीताको पढ़ता रहता हूँ, तब तक मुझे उनका दर्शन होता रहता है, इसलिये मेरा मन गीताके पाठको छोड़ना नहीं चाहता॥”98–100॥ महाप्रभुके द्वारा शुद्धचित्त ऐकान्तिक भक्तकी प्रशंसा :— प्रभु कहे,—“गीता-पाठे तोमारइ अधिकार। तुमि से जानह एइ गीतार अर्थ-सार॥”102॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस ब्राह्मणसे कहा,—“गीता-पाठमें वास्तवमें तुम्हारा ही अधिकार है। तुम जो जानते हो, वही गीताका सारार्थ है॥”102॥ अनुभाष्य—भाः 7/5/23 और “भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकया”; “गीताधीता च येनापि भक्तिभावेन चेतसा। वेदशास्त्रपुराणानि तेनाधीतानि सर्वशः॥” आदि एवं (श्वेःउः 6/23)—“यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥” आदि देखें। अर्थात् ‘श्रीमद्भागवत केवल भक्तिके द्वारा ही ग्रहण की जा सकती है—बुद्धि या टीकाके द्वारा नहीं।’ ‘जो भक्तिभावयुक्त चित्तसे श्रीमद्भगवद्गीता अध्ययन करते हैं, वे वेद-पुराणादि सर्वशास्त्र अध्ययन करते हैं।’ ‘जिनकी श्रीभगवान्में पराभक्ति है, और जैसी श्रीभगवान्में है, श्रीगुरुदेवमें भी वैसी पराभक्ति है, उन महात्माके हृदयमें कहे गये सभी विषय अर्थात् श्रुतियोंके मर्मार्थ प्रकाशित होते हैं॥’102॥ महाप्रभुके द्वारा ब्राह्मणको आलिङ्गन और ब्राह्मणको महाप्रभुमें श्रीकृष्णका ज्ञान :— एत बलि' सेइ विप्रे कैल आलिङ्गन। प्रभु-पद धरि' विप्र करेन रोदन॥ 103॥ “तोमा देखि' ताहा हैते द्विगुण सुख हय। सेइ कृष्ण तुमि,—हेन मोर मने लय॥”104॥ अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभुने उस ब्राह्मणका आलिङ्गन किया और वह ब्राह्मण महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़कर रोते हुए कहने लगा, —“गीता पाठके समय श्रीकृष्णका दर्शन करके मुझे जिस आनन्दकी प्राप्ति होती थी, उससे भी दो गुणा अधिक आनन्दकी प्राप्ति आपके दर्शनसे हो रही है, मेरा मन कहता है कि आप वही श्रीकृष्ण हैं॥”103–104॥ कर्मज्ञान-अन्याभिलाषशून्य छलरहित शुद्ध मन ही वृन्दावन, उसी मनमें ही सम्विद्विग्रह श्रीकृष्णका अधिष्ठान :— कृष्णस्फूर्त्ये ताँर मन हञाछे निर्मल। अतएव प्रभुर तत्त्व जानिल सकल॥ 105 ॥ अनुवाद—गीताका पाठ करते हुए उस ब्राह्मणके हृदयमें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति हुई थी, जिससे उसका हृदय निर्मल हो गया था, इसलिये वह महाप्रभुके तत्त्वके विषयमें सब कुछ जान सका॥ 105॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 6/83–84 संख्या देखें॥ 105 ॥ महाप्रभुकी अपने प्रचारकी निषेधाज्ञाके द्वारा असुर लोगोंकी वञ्चना :— तबे महाप्रभु ताँरे कराइल शिक्षण। “एइ बात काँहा ना करिह प्रकाशन॥”106॥ 356 ।
नौवाँ अध्याय 9/106-114 ] अनुवाद—तब महाप्रभुने उस ब्राह्मणको शिक्षा दी और कहा, — “मुझे तुमने कृष्ण समझा है, इस बातको किसीके सामने प्रकाशित मत करना ॥” 106 ॥
महाप्रभु-भक्त ब्राह्मण :— सेइ विप्र महाप्रभुर बड़ भक्त हैल। चारि मास प्रभु-सङ्ग कभु ना छाड़िल॥ 107 ॥
अनुवाद—वह ब्राह्मण महाप्रभुका बड़ा भक्त बन गया। चार महीने जब तक महाप्रभु श्रीरङ्गम्में थे, तब तक उस ब्राह्मणने कभी भी उनका साथ नहीं छोड़ा॥ 107 ॥
व्येङ्कटभट्टके घरमें महाप्रभु गौरचन्द्र :— एइमत भट्टगृहे रहे गौरचन्द्र। निरन्तर भट्ट-सङ्गे कृष्णकथानन्द॥ 108 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरचन्द्र व्येङ्कट भट्टके घरमें रहे और निरन्तर कृष्णकथा करते हुए दोनोंने उसका आनन्द लिया॥ 108 ॥
लक्ष्मीनारायण-सेवक श्रीसम्प्रदायी भट्ट :— 'श्री-वैष्णव' भट्ट सेवे लक्ष्मी-नारायण। ताँर भक्ति देखि' प्रभुर तुष्ट हैल मन॥ 109 ॥
अनुवाद—व्येङ्कट भट्ट 'श्रीवैष्णव' सम्प्रदायके थे, इसलिये वे श्रीलक्ष्मी-नारायणकी सेवा करते थे। उनकी भक्तिको देखकर महाप्रभु बहुत सन्तुष्ट हुए॥ 109 ॥
महाप्रभुके साथ उनका सख्यभाव :— निरन्तर ताँर सङ्गे हैल सख्यभाव। हास्य-परिहास दुँहे सख्येरे स्वभाव॥ 110 ॥
अनुवाद—निरन्तर साथ रहनेके कारण महाप्रभु और व्येङ्कट भट्टका साथ सख्यभाव हो गया, इसलिये दोनों कभी सखाकी भाँति हास-परिहास भी करते थे॥ 110 ॥
महाप्रभुकी उनको श्रीकृष्णसेवा-दानकी इच्छा, महाप्रभु और भट्टका संवाद; महाप्रभुका कौतुकपूर्ण प्रश्न—लक्ष्मी और गोपियोंकी श्रीकृष्णसेवाका वैशिष्ट्य :— प्रभु कहे, — “भट्ट, तोमार लक्ष्मी-ठाकुराणी। कान्त-वक्षःस्थिता, पतिव्रता-शिरोमणि॥ 111 ॥
नारायणाश्रित होते हुए भी लक्ष्मीका श्रीकृष्णके माधुर्यसे आकर्षित होकर श्रीकृष्णसङ्ग प्राप्त करनेकी प्रार्थना :— आमार ठाकुर कृष्ण—गोप, गो-चारण। साध्वी हञा केने चाहे ताँहार सङ्गम॥ 112 ॥
इस उद्देश्यसे लक्ष्मीकी कठोर तपस्या :— एइ लागि' सुखभोग छाड़ि' चिरकाल। व्रत-नियम करि' तप करिल अपार ॥” 113 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, “भट्ट! आपकी ठाकुराणी श्रीलक्ष्मी देवी पतिव्रता शिरोमणि हैं और सदा अपने कान्तके वक्षःस्थलपर विराजमान रहती हैं। मेरे ठाकुर श्रीकृष्ण एक गोप हैं और गैया चराते हैं, परन्तु तुम्हारी ठाकुराणी साध्वी होकर भी उनका सङ्ग क्यों चाहती हैं? इसके लिये उन्होंने बहुत लम्बे समय तक वैकुण्ठके समस्त सुख-भोगोंको छोड़कर व्रत लेकर नियमोंका पालन करते हुए बहुत कठोर तपस्या भी की है॥” 111-113 ॥
श्रीमद्भागवत (10/16/36)— कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महे, तवाङ्घ्रिरेणुस्पर्शाधिकारः। यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपो, विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता॥ 114 ॥
अनुवाद—हे देव! जिनकी चरणरजको प्राप्त करनेकी वासनासे कमलाने (लक्ष्मीने) बहुत समय तक समस्त प्रकारके विषय-भोगोंका परित्याग करके दृढ़व्रत धारण करके तपस्या की थी, उस चरणरजको इस कालिय-नागने किस सुकृतिके द्वारा लाभ करनेका अधिकार प्राप्त किया, उसे हम नहीं जानती॥ 114 ॥
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[ 9/111–121 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [बायाँ स्तम्भ] अनुभाष्य—मध्यलीला 8/146 संख्या देखें॥ 114॥ भट्टका उत्तर, श्रीकृष्णके सङ्गसे नारायण-पत्नीके सतीत्वकी हानिकी असम्भावना :— भट्ट कहे, —“कृष्ण-नारायण—एकइ स्वरूप। कृष्णेते अधिक लीला-वैदग्ध्यादिरूप ॥ 115 ॥ ताँर स्पर्शे नाहि याय पतिव्रता-धर्म। कौतुके लक्ष्मी चाहेन कृष्णेर सङ्गम ॥ 116 ॥ अनुवाद—व्येङ्कट भट्टने कहा, —“श्रीकृष्ण और श्रीनारायण—दोनों एक ही स्वरूप हैं, परन्तु श्रीकृष्णमें लीला-वैदग्ध्यादि अधिक है। कौतुकवशतः श्रीलक्ष्मीने श्रीकृष्णके सङ्गकी इच्छा की, क्योंकि श्रीकृष्णके स्पर्शसे उनका पतिव्रता-धर्म नष्ट नहीं होता ॥ 115–116 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीनारायण ही श्रीकृष्णकी विलास-मूर्ति हैं, इसलिये श्रीकृष्णसे उनका स्वरूप द्विभुज-चतुर्भुजका भेद होनेपर भी पृथक् नहीं है। नारायणमें श्रीकृष्णके समान लालित्य होनेपर भी उनमें श्रीकृष्ण जैसी वैदग्ध्य आदि रूप लीला नहीं है। श्रीकृष्ण ही जब विलासमूर्तिमें श्रीनारायण हैं, तब नारायण-पत्नी-लक्ष्मीका श्रीकृष्ण-स्पर्शसे पतिव्रता-धर्म नहीं नष्ट होता है। इसलिये श्रीकृष्णसङ्गममें लक्ष्मीका कौतुक होना स्वाभाविक ही है ॥ 115–116 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/223 संख्या और मध्यलीला 8/144 संख्या देखें ॥ 111–116 ॥ श्रीकृष्ण और नारायणकी लीलाका वैचित्र्य :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/59)— सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि श्रीश-कृष्णस्वरूपयोः। रसेनोत्कृष्यते कृष्णरूपमेषा रसस्थितिः ॥ 117 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 117 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘श्रीनारायण’ और ‘श्रीकृष्ण’के दो स्वरूपोंमें सिद्धान्तके अनुसार कोई भेद नहीं है, तथापि शृङ्गार-रसविचारसे श्रीकृष्णरूपने ही रसके द्वारा [दायाँ स्तम्भ] उत्कर्षता प्राप्त की है। इसी प्रकार ही रसत्तत्त्वकी स्थापना होती है ॥ 117 ॥ अनुभाष्य— सिद्धान्ततः (वस्तुतत्त्वतः) श्रीश्रीकृष्णस्वरूपयोः (नारायण-कृष्णतत्त्वयोः) अभेदे सति अपि रसेन कृष्णरूपम् (एव) उत्कृष्यते, —एषा रसस्थितिः (रस-स्वभावः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। आदिलीला दूसरा और तीसरा अध्याय एवं लघुभागवतामृत देखें ॥ 117 ॥ कृष्णसङ्गे पतिव्रता-धर्म नहे नाश। अधिक लाभ पाइये, आर रासविलास ॥ 118 ॥ विनोदिनी लक्ष्मीर हय कृष्णे अभिलाष। इहाते कि दोष, केने कर परिहास ॥” 119 ॥ अनुवाद—लक्ष्मीजीने विचार किया कि श्रीकृष्णके सङ्गसे उनका पतिव्रता-धर्म नष्ट नहीं होगा, अपितु श्रीकृष्णका सङ्ग होनेसे रासलीलारूपी अधिक लाभ ही मिलेगा। लक्ष्मीजी विनोदिनी हैं, इसलिये उन्होंने यदि श्रीकृष्णके सङ्गकी अभिलाषा की, तो इसमें क्या दोष है? आप क्यों उनका परिहास कर रहे हैं?” ॥ 118–119 ॥ महाप्रभुका पुनः प्रश्न :— प्रभु कहे, —“दोष नाहि, इहा आमि जानि। रास ना पाइल लक्ष्मी, शास्त्रे इहा शुनि ॥ 120 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“इसमें कोई दोष नहीं है, यह मैं भी जानता हूँ। परन्तु मैंने शास्त्रोंमें सुना है कि लक्ष्मीजीका रासमें प्रवेश नहीं हुआ ॥ 120 ॥ व्रजगोपियोंकी महिमा :— श्रीमद्भागवत (10/47/60)— नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः। स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ- लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम् ॥ 121 ॥ 358 ।
नौवाँ अध्याय 9/121-128 ] अनुवाद-श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरियोंके प्रति जो कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो क्या कहूँ?॥ 121॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/80 संख्या देखें॥ 121 ॥ गोपियोंके आनुगत्यके बिना लक्ष्मीका श्रीकृष्णके साथ रासविलास असम्भव :- लक्ष्मी केने ना पाइल, इहार कि कारण। तप करि' कैछे कृष्ण पाइल श्रुतिगण ॥ 122 ॥ अनुवाद-तपस्या करके श्रुतियोंने कैसे श्रीकृष्णको रासलीलामें प्राप्त किया? और लक्ष्मीजीको रासमें प्रवेश क्यों नहीं मिला? इसका क्या कारण है? ॥ 122॥ गोपियोंके आनुगत्यसे ही श्रुतियोंको रागमार्गमें श्रीकृष्णसेवाकी प्राप्ति :- श्रीमद्भागवत (10/87/23)- निभृतमरुन्मनोऽक्षदृढ़योगयुजो हृदि य- न्मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः स्मरणात्। स्त्रिय उरगेन्द्र-भोगभुजदण्डविषक्त-धियो वयमपि ते समाः समदृशोऽङ्घ्रिसरोजसुधाः ॥ 123 ॥ अनुवाद-मुनियोंने प्राणायामके द्वारा निश्वासको जीतकर मन और इन्द्रियोंको दृढ़रूपसे योगयुक्त करके हृदयमें जिस ब्रह्मकी उपासना की थी, भगवान्के सभी शत्रुओंने भी उनके निरन्तर ध्यानके बलसे उस ब्रह्ममें प्रवेश किया था। व्रजस्त्रियोंने श्रीकृष्णके सर्पके शरीरतुल्य भुजाओंके सौन्दर्यरूप तीव्र विषके द्वारा हतबृद्धि होकर उनके चरणकमलोंकी सुधाको प्राप्त किया था। हमने भी वैसी गोपीदेह प्राप्त करके गोपीभावसे उनके चरणकमलोंकी सुधाका पान किया है॥123॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/223 संख्या देखें ॥ 123 ॥ महाप्रभुके प्रश्नका उत्तर देनेमें भट्टकी असमर्थता :- श्रुति पाय, लक्ष्मी ना पाय, इथे कि कारण।” भट्ट कहे,-"इहा प्रवेशिते नारे मोर मन॥ 124 ॥ आमि जीव, -क्षुद्रबुद्धि, सहजे अस्थिर। ईश्वरेर लीला-कोटिसमुद्र-गम्भीर ॥ 125 ॥ प्रभुकी कृपासे ही प्रभुकी लीलाका ज्ञान :- तुमि साक्षात् सेइ कृष्ण, जान निजकर्म। यारे जानाह, सेइ जाने तोमार लीलामर्म॥" 126 ॥ अनुवाद-(महाप्रभुका प्रश्न-) श्रुतियोंको रासकी प्राप्ति हुई, परन्तु लक्ष्मीजीको नहीं हुई, इसका क्या कारण है?” व्येङ्कट भट्टने कहा, - "इस रहस्यमें प्रवेश करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। मैं एक जीव हूँ जिसकी बुद्धि अल्प और स्वभावतः चञ्चल है। श्रीकृष्णकी लीला करोड़ों समुद्रकी भाँति गम्भीर (गहरी) है, मेरी बुद्धिका उसमें प्रवेश नहीं है। आप साक्षात् वही श्रीकृष्ण हैं, आप ही अपनी लीलाओंके उद्देश्यको जानते हैं। आप जिसे उसे जनाते हैं, वही आपकी लीलाओंके मर्मको जान पाता है॥” 124-126॥ अनुभाष्य-(कठ, 2/23, मुःउः 3/2/3)- “यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।” अर्थात् “जब जीवात्मा भगवान्के प्रति सेवोन्मुख होकर परमात्माकी कृपायाचना करता है, तब उसीके निकट वे परमात्मा अपना स्वयंप्रकाश श्रीविग्रह प्रकट करते हैं ॥ 126 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्ण और व्रजवासियोंके सहज रागात्मक स्वभावका वर्णन :- प्रभु कहे,-"कृष्णेर एक सजीव लक्षण। स्वमाधुर्ये सर्व चित्त करे आकर्षण ॥ 127 ॥ व्रजलोकेर भावे पाइये ताँहार चरण। ताँरे ईश्वर करि' नाहि जाने व्रजजन ॥ 128 ॥ । 359
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[ 9/127–135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला केह ताँरे पुत्र-ज्ञाने उदुखले बान्धे। केह सखा-ज्ञाने जिनि' चड़े ताँर कान्धे ॥ 129 ॥ 'व्रजेन्द्रनन्दन' बलि' ताँरे जाने व्रजजन। ऐश्वर्यज्ञाने नाहि कोन सम्बन्ध-मानन ॥ 130 ॥ व्रजलोकेर भावे येइ करये भजन। सेइ व्रजे पाये शुद्ध व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 131 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/137-158 संख्या एवं मध्यलीला 8/138, 142, 147, 148 संख्या देखें। पयार संख्या 130 की पहली पंक्तिके लिये—आदिलीला 4/33 संख्या, मध्यलीला 8/203–204, 220–222, 226, 228–230 संख्या देखें। पयार संख्या 130 की दूसरी पंक्तिके लिये—आदिलीला 4/21–26 संख्या देखें ॥ 127–130 ॥ श्रीमद्भागवत (10/9/21)— नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः। ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ 132 ॥ अनुवाद—यशोदाके पुत्र भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमान् देहधारियोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, आत्मभूत ज्ञानियोंके लिये वैसे नहीं हैं ॥ 132 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/226 संख्या देखें ॥ 132 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “श्रीकृष्णका एक सजीव लक्षण यह है कि वे अपने माधुर्यके द्वारा सबके चित्तको आकर्षित करते हैं। केवल व्रजवासियोंके भावोंका आनुगत्य करके ही श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति की जा सकती है। व्रजवासी श्रीकृष्णको भगवान् नहीं मानते। कोई उन्हें अपना पुत्र मानकर ऊखलसे बाँध देती हैं, तो कोई उन्हें सखा मानकर खेलमें उनसे जीतकर उनके कन्धेपर चढ़ जाता है। व्रजवासी श्रीकृष्णको व्रजेन्द्रनन्दनके रूपमें ही जानते हैं। ऐश्वर्यज्ञानसे श्रीकृष्णके साथ वे कोई सम्बन्ध नहीं मानते हैं। व्रजवासियोंके भावोंके अनुगत होकर जो श्रीकृष्णका भजन करते हैं, वे ही व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णको प्राप्त करते हैं॥ 127–131 ॥ गोपियोंके आनुगत्यसे श्रुतियोंको रासमें कृष्णसेवा-प्राप्ति :— श्रुतिगण गोपीगणेर अनुगत हञा। व्रजेश्वरीसुत भजे गोपीभाव लञा ॥ 133 ॥ बाह्यान्तरे गोपीदेह व्रजे यबे पाइल। सेइ देहे कृष्णसङ्गे रासक्रीड़ा कैल ॥ 134 ॥ अनुवाद—श्रुतियोंने गोपियोंके अनुगत होकर गोपीभावसे यशोदानन्दनका भजन किया था। जब श्रुतियोंको व्रजमें गोपीदेहकी प्राप्ति हुई, तब उस देहसे उन्होंने श्रीकृष्णके साथ रासक्रीड़ा की थी ॥ 133-134 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'सजीव-लक्षण'—क्रियालक्षण; पाठान्तरमें 'स्वभाव-लक्षण', इसका अर्थ स्पष्ट है। तीसरा पाठान्तर 'स्वभाव-विलक्षण',—श्रीकृष्णका स्वभाव दूसरोंके स्वभावसे भिन्न प्रकारका है, अथवा 'विलक्षण'-शब्दका अर्थ विशेष लक्षण है। 'उदूखल'—ओखली अर्थात् जिसमें धानादि कूटा जाता है। व्रजवासी श्रीकृष्णको 'नन्दनन्दन'के रूपमें जानते हैं। परम ऐश्वर्यशाली 'परमेश्वर'से जो एक अन्य प्रकारका सम्बन्ध है, वे उसे नहीं मानते। व्रजवासियोंके दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन चार प्रकारके भावोंमेंसे कोई भाव ग्रहण करके जो परमतत्त्वका भजन करता है; वह चरम अवस्थामें व्रजेन्द्रनन्दन-श्रीकृष्णको शुद्ध रूपमें व्रजधाममें प्राप्त होता है ॥ 127–131 ॥ गोपीके अतिरिक्त अन्य चिन्मयी स्त्रीके लिये भी मधुर-सेवा-प्राप्ति असम्भव :— गोपजाति कृष्ण, गोपी-प्रेयसी ताँहार। देवी वा अन्य स्त्री कृष्ण ना करे अङ्गीकार ॥ 135 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण गोपजातिके हैं और गोपियाँ उनकी प्रेयसियाँ हैं। श्रीकृष्ण गोपियोंके अतिरिक्त अन्य किसी और देवी या स्त्रीको अङ्गीकार नहीं करते ॥ 135 ॥ 360 ।
नौवाँ अध्याय 9/133-142 ] लक्ष्मीके ऐश्वर्यज्ञानसे श्रीकृष्णका सङ्ग असम्भव :- लक्ष्मी चाहे सेइ देहे कृष्णेर सङ्गम। गोपी-रागानुगा हञा ना कैल भजन ॥ 136 ॥ अन्य देहे ना पाइये रासविलास। अतएव 'नायं' श्लोक कहे वेदव्यास ॥ *137 ॥ अनुवाद—लक्ष्मीजी अपनी उसी देहसे ही श्रीकृष्णका सङ्ग प्राप्त करना चाहती थीं। किन्तु उन्होंने गोपियोंके अनुरागके अनुगत होकर श्रीकृष्णका भजन नहीं किया था। श्रीवेदव्यासने श्रीमद्भागवतमें 'नायं सुखापो-' श्लोक कहा है, क्योंकि गोपीदेहके अतिरिक्त अन्य किसी देहसे श्रीकृष्णके रासमण्डलमें प्रवेश सम्भव नहीं है॥ *136-137 ॥
- किसी अन्य संस्करणमें 'नायं' से 'नायं श्रियो-' श्लोक लिया गया है। यद्यपि उस श्लोकमें गोपियोंकी महिमा बतलायी गयी है, उनके समान किसी औरका वैसा सौभाग्य नहीं है, परन्तु यह स्पष्ट रूपसे नहीं कहा है कि गोपीदेहके बिना रासमें किसीका प्रवेश सम्भव नहीं है। पहले 'श्रीवैष्णव' सम्प्रदायके व्येङ्कटभट्टकी नारायणकी ही 'स्वयंरूप'के रूपमें धारणा :- पूर्वे भट्टेर मने एक हैत अभिमान। "श्रीनारायण' ह'न स्वयं-भगवान् ॥ 138 ॥ ताँहार भजन सर्वोपरि-कक्षा हय। 'श्री-वैष्णवे'र भजन एइ सर्वोपरि हय ॥ '139 ॥ अनुवाद—पहले व्येङ्कट भट्टके मनमें एक अभिमान था,—“श्रीनारायण' ही स्वयं भगवान् हैं। उनका भजन ही सर्वश्रेष्ठ श्रेणीका है और 'श्रीवैष्णव'-सम्प्रदायकी भजन परिपाटी ही सर्वश्रेष्ठ है ॥' 138-139 ॥ एइ ताँर गर्व प्रभु करिते खण्डन। परिहासद्वारे उठाय एतेक वचन ॥ 140 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उनके इसी गर्वका खण्डन करनेके लिये ही परिहासमें ये सब बातें कहीं॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रुतियाँ श्रीकृष्णके रासमण्डलमें प्रवेश करनेकी चेष्टा करनेपर भी जब सफल नहीं हो पायीं और केवल हृदयगत गोपीभावको लेकर भी जब प्रवेश नहीं कर पायीं, तब बाहरी गोपी-देह और हृदयमें गोपीभाव ग्रहण करके गोपियोंके अनुगत होकर श्रीकृष्णके रासमें प्रविष्ट हुई थीं। श्रीकृष्ण-गोप जातिके हैं, गोपियाँ ही उनकी प्रेयसियाँ हैं, इसलिये ऐश्वर्यमयी देवीके रूपमें या अन्य स्त्रीरूपमें, 'श्रीकृष्णसङ्गम' प्राप्त नहीं होता। लक्ष्मीदेवीने अपनी देवी-देहमें ही श्रीकृष्णके सङ्गमकी प्रार्थना की थी, किन्तु उन्होंने गोपियोंके स्वाभाविक अनुरागके अनुगत होकर भजन नहीं किया। इसलिये वे गोपीसे पृथक् अन्य देहमें रासविलास प्राप्त नहीं कर पायी। इसके सम्बन्धमें श्रीव्यासदेवने “नायं सुखापो भगवान्”—यह श्लोक लिखा है। व्येङ्कट भट्टके मनमें एक अभिमान था कि परव्योममें रहनेवाले श्रीनारायण ही स्वयं भगवान् हैं, उनका भजन ही सर्वोत्तम उपासनाका विशेष स्तर है; इसलिये श्रीसम्प्रदायी वैष्णवोंका भजन ही सर्वोपरि है। इस वृथा गर्वका खण्डन करनेके अभिप्रायसे ही महाप्रभुने परिहासके द्वारा इस विचारको उठाया था ॥ 133-140 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/23-24, 28-115 संख्या और लघुभागवतामृतमें श्रीरूपगोस्वामी प्रभुका विचार आलोच्य है॥ 138-139 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्ण और नारायणकी लीलाके वैशिष्ट्यका वर्णन और श्रीकृष्णके स्वयंरूप होनेकी संस्थापना :- प्रभु कहे,–“भट्ट, तुमि ना करिह संशय। 'स्वयं भगवान्' कृष्ण एइ त' निश्चय ॥ 141 ॥ कृष्णेर विलासमूर्ति-श्रीनारायण। अतएव लक्ष्मी-आद्येर हरे तेंह मन ॥ 142 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,- “श्रीकृष्णकी विलासमूर्ति श्रीनारायण हैं। इसलिये श्रीकृष्ण लक्ष्मी आदि देवियोंके मनका भी हरण करते हैं। भट्ट, तुम कोई भी संशय । 361
[ 9/141-149 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला मत करो, श्रीकृष्ण ही 'स्वयं भगवान्' हैं, श्रीमद्भागवत 'चतुर्भुज-मूर्त्ति' देखाय गोपीगणेर आगे। ही इस विषयमें प्रमाण है॥ 141-142 ॥ सेइ 'कृष्णे' गोपिकार नहे अनुरागे ॥ "149 ॥ श्रीमद्भागवत (1/3/28) :- अनुवाद-अपने असाधारण गुणोंके कारण स्वयं एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। भगवान् श्रीकृष्ण लक्ष्मीके मनको हर लेते हैं, परन्तु इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ 143 ॥ श्रीनारायण गोपियोंके मनको नहीं हर सकते। श्रीनारायणकी तो बात ही क्या, गोपियोंके साथ परिहास करनेके लिये अनुवाद-राम-नृसिंहादि, पुरुषावतारके अंश या श्रीकृष्ण नारायण हो गये। नारायण रूप धारण करके कला (अंशके अंश) हैं, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् उन्होंने गोपियोंको 'चतुर्भुज-मूर्ति' दिखलायी। उन (चतुर्भुज) हैं। दैत्योंके द्वारा पीड़ित लोगोंकी प्रत्येक युगमें ये श्रीकृष्णमें भी गोपियोंका अनुराग उत्पन्न नहीं (अवतार) रक्षा करते हैं॥ 143 ॥ हुआ ॥ 147-149 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/67 संख्या देखें॥ 143॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनारायणमें साठ गुण हैं; उन नारायण हैते कृष्णेर असाधारण गुण। गुणोंके ऊपर और भी श्रीकृष्णके चार असाधारण गुण अतएव लक्ष्मीर कृष्णे तृष्णा अनुक्षण ॥ 144 ॥ है, वे श्रीनारायणमें नहीं हैं। जैसे (1) सर्वाद्भुत- चमत्कारलीलासमुद्रविशिष्टता, (2) अतुल्यमधुर-प्रेम- तुमि ये पड़िला श्लोक, से हय प्रमाण। परिशोभितप्रियमण्डलयुक्तता, (3) त्रिजगन्मानसाकर्षि- सेइ श्लोके आइसे 'कृष्ण-स्वयं भगवान्' ॥ 145 ॥ मुरलीगीतपरायणता, (4) चराचरविस्मयकारि-समोर्द्ध- अनुवाद-श्रीकृष्णमें चार असाधारण गुण हैं जो रहितरूप-श्रीयुक्तता। ऐसे असाधारण चार गुणोंसे युक्त श्रीनारायणमें नहीं हैं, इसलिये लक्ष्मी सदा श्रीकृष्णका श्रीकृष्णमें ऐश्वर्यस्वरूपिणी लक्ष्मीकी भी प्रतिक्षण तृष्णा सङ्ग चाहती हैं। आपने जो श्लोक 'सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि--' उत्पन्न होती है। 'सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि' जिस श्लोकका पढ़ा था, वही इस बातका प्रमाण है कि श्रीकृष्ण 'स्वयं तुमने उच्चारण किया है, उसमें ही श्रीकृष्णकी 'स्वयं-भगवत्ता' भगवान्' हैं॥ 144-145 ॥ प्रमाणित होती है। स्वयं-भगवत्तासे युक्त श्रीकृष्ण ही लक्ष्मीके मनका हरण करते हैं। गोपियोंके मनको हरण भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/59) :- करनेके उपयोगी चार गुण श्रीनारायणमें नहीं रहनेपर वे सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि श्रीश-कृष्णस्वरूपयोः। गोपियोंके मनका हरण नहीं कर सकते। नारायणकी रसेनोत्कृष्यते कृष्णरूपमेषा रसस्थितिः ॥ 146 ॥ बात तो दूर रहे, श्रीकृष्ण परिहास करते हुए स्वयं अनुवाद-इसी अध्यायमें 117 संख्या देखें॥ 146॥ नारायणके रूपमें 'प्रकाशित' होनेपर भी गोपियोंका उनमें अनुराग नहीं हुआ। लक्ष्मी श्रीकृष्णका माधुर्य चाहती हैं, परन्तु गोपियाँ चतुर्भुज यहाँ यह विचारणीय है कि श्रीरूपगोस्वामीने नारायणका ऐश्वर्य नहीं चाहती :- 'भक्तिरसामृतसिन्धु'की महाप्रभुके साथ व्येङ्कटभट्टके साथ स्वयं भगवान् 'कृष्ण' हरे लक्ष्मीर मन। साक्षात्तारके अनेक दिनोंके बाद रचना की, तब गोपिकार मन हरिते नारे 'नारायण' ॥ 147 ॥ श्रीव्येङ्कटभट्टने किस प्रकार इस ग्रन्थके श्लोकका स्वयं श्रीकृष्णके चतुर्भुजरूपका भी गोपियों द्वारा अनादर :- प्रमाणके रूपमें पाठ किया था? हम इस प्रकार इसका नारायणेरका कथा, श्रीकृष्ण आपने। समाधान करते हैं- गोपिकारे हास्य कराइते हय 'नारायणे' ॥ 148 ॥ 'भक्तिरसामृतसिन्धु' आदि ग्रन्थोंके जो-जो श्लोक 362 ।
नौवाँ अध्याय 9/144-156 ] उन ग्रन्थोंकी रचनासे पहले प्रयोग किये गये हैं—ऐसा कहकर इस ग्रन्थमें उनका उल्लेख हुआ है, तो यह समझना चाहिये कि वे श्लोक बहुत प्राचीन श्रीकृष्णभक्तोंमें भी प्रचलित थे। श्रीलरूप गोस्वामीने उन प्राचीन श्लोकोंका ही अपने ग्रन्थमें प्रयोग किया है। कविराज-गोस्वामीकी इस ग्रन्थकी रचनासे पहले, श्रीरूपके सभी ग्रन्थ रचित हो चुके थे। इसलिये (कविराज गोस्वामीने अपने इस ग्रन्थमें श्रीरूपके) उन-उन ग्रन्थोंसे उद्धृत कहकर इन सब श्लोकोंका उल्लेख किया है। अनेक स्थानोंपर, कविराज गोस्वामीने भावमात्रका सहारा लेकर पूर्व-गोस्वामियोंके श्लोकोंको वार्त्तालापमें प्रवेश कराया है ॥ 144-149 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 17/278-293 संख्या देखें ॥ 148-149 ॥ ललितमाधव (6/14) :- गोपीनां पशुपेन्द्रनन्दनजुषो भावस्य कस्तां कृती विज्ञातुं क्षमते दुरूहपदवीसञ्चारिणः प्रक्रियाम्। आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि तनुं तस्मिन् भुजैर्जिष्णुभि- र्यासां हन्त चतुर्भिरद्भुतरुचिं रागोदयः कुञ्चति ॥ 150 ॥ अनुवाद—किसी समय श्रीकृष्णने कौतुकवशतः अद्भुत-रुचियुक्त चतुर्भुज नारायणरूप प्रकाश किया, जिसे देखकर गोपियोंके रागका उदय सङ्कुचित हो गया। इसलिये नन्दनन्दनमें अनन्य-भजनशील दुर्गम-पारकीय- पथका अवलम्बन करनेवाली गोपियोंकी भाव-क्रियाको कौन पण्डित समझ सकता है? ॥ 150 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 17/281 संख्या देखें ॥ 150 ॥ महाप्रभुके द्वारा लक्ष्मी और गोपियोंके तत्त्वका समन्वय :- एत कहि' प्रभु ताँर गर्व चूर्ण करिया। ताँरे सुख दिते कहे सिद्धान्त फिराइया ॥ 151 ॥ “दुःख ना भाविह, भट्ट, कैलुँ परिहास। शास्त्रसिद्धान्त शुन, याते वैष्णव-विश्वास ॥ 152 ॥ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और नारायणतत्त्व एवं सर्वलक्ष्मीमयी श्रीराधा और लक्ष्मीतत्त्व :- कृष्ण-नारायण, यैछे एकइ स्वरूप। गोपी-लक्ष्मी-भेद नाहि हय एकरूप ॥ 153 ॥ एकइ विग्रहे करे नानाकार रूप। गोपी-लक्ष्मी-भेद नाहि, जानिह ‘स्वरूप’ ॥ 154 ॥ अनुवाद—ऐसा कहकर महाप्रभुने व्येङ्कट भट्टके गर्वको तो चूर्ण कर दिया, परन्तु उसे प्रसन्न करनेके लिये महाप्रभुने सिद्धान्तको घुमाकर कहा,— “भट्ट, आप दुःखी मत होइये, मैंने तो केवल परिहास किया था। अब आप शास्त्रोंके वे सिद्धान्त सुनो, जिनमें वैष्णवोंका विश्वास है। श्रीकृष्ण और श्रीनारायण जैसे एक ही स्वरूप हैं, वैसे ही गोपियों और लक्ष्मीमें भी कोई भेद नहीं है, वे भी एकरूप हैं। एक ही विग्रह अनेक रूप धारण करते हैं, इसलिये गोपी और लक्ष्मीमें भी कोई भेद नहीं है, इसलिये उनके ‘स्वरूप’को जानो ॥ 151-154 ॥ अनुभाष्य—जिस प्रकार श्रीकृष्ण एवं नारायण—वस्तुतः अभेद अर्थात् एक ही वस्तु हैं, उसी प्रकार गोपी एवं लक्ष्मी वस्तुतः अभिन्न हैं। रस विचारसे लक्ष्मीकी अपेक्षा गोपीकी उत्कर्षता होनेपर भी दोनोंको सिद्धान्तसे अभिन्न ही जानना चाहिये ॥ 153 ॥ कृष्णतत्त्व और विष्णुत्तत्त्व एवं श्रीराधातत्त्व और लक्ष्मीतत्त्वमें भेदबुद्धि—अपराधजनक :- गोपीद्वारे लक्ष्मी करे कृष्णसङ्गास्वाद। ईश्वर-तत्त्वे भेद मानिले हय अपराध ॥ 155 ॥ अनुवाद—गोपियोंके द्वारा ही लक्ष्मी श्रीकृष्णके सङ्गका आस्वादन करती हैं। ईश्वरके विभिन्न रूपोंमें भेद माननेसे अपराध होता है ॥ 155 ॥ भक्तोंके स्वरूपके अनुरूप सेवा-भेदसे आराध्यवस्तुका माधुर्य और ऐश्वर्यभेद :- एक ईश्वर—भक्तेर ध्यान-अनुरूप। एकइ विग्रहे करे नानाकार रूप ॥” 156 ॥ । 363
[ 9/151-162 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-एक ही विग्रह नाना प्रकारके आकार और रूप प्रकाश करते हैं। एक ईश्वर भक्तोंके ध्यानके अनुरूप भिन्न-भिन्न रूपोंमें स्वयंको प्रकाशित करते हैं॥” 156 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने परिहास-वाक्य छोड़कर अन्तमें कहा, - ओहे भट्ट, तुम दुःखी मत होवो, ‘श्रीकृष्ण’ और ‘श्रीनारायण’ जिस प्रकार अभेद हैं, गोपी और लक्ष्मी भी उसी प्रकार अभेद हैं। सर्वलक्ष्मीमयी राधिका एक ही विग्रहसे नाना आकार और रूप प्रकाशित करती हैं। गोपियोंके द्वारा लक्ष्मी कृष्णसङ्गका आस्वादन करती हैं अर्थात् स्वरूपशक्ति माधुर्यस्वरूपमें गोपीदेहमें श्रीकृष्ण-सङ्गास्वादन करती हैं और ऐश्वर्यदेहमें लक्ष्मीरूपमें नारायण-सङ्गास्वादन करती हैं। ईश्वर-तत्त्वमें भेद नहीं है। भक्तोंके भावोंके भेदसे एक ही चिद्-विग्रहमें अनेक प्रकारके आकार और रूपके ध्यानभेद मात्र जानने चाहिये॥ 151-156 ॥ [औदार्यपराः आदौ गौरादिकं, ततः माधुर्यपर-भावापन्नाः गौराभिन्नरूपं श्यामादिकं पश्यन्ति]। श्लोक-भावानुवाद-वैदूर्यमणि जिस प्रकार नीले-पीले रङ्गोंको अपने विभागसे प्रकट करती हुई विभिन्न रङ्गोंवाली प्रतीत होती है, उसी प्रकार श्रीअच्युत (जिनमें कोई भी च्युति या न्यूनता न हो अथवा भक्तोंका जिनसे कभी भी विच्छेद न हो, जैसा कि स्कन्दपुराणके काशीखण्डमें कहा गया है- 'जिनके भक्त महान विपत्ति (प्रलयादि सङ्कट) में भी उनसे दूर नहीं होते अथवा उन्हें नहीं भुलाते, इसलिये वे सभी लोकोंमें साधुओंके द्वारा अच्युत-नामसे कीर्त्तित होते हैं) भक्तके भावानुसार उपासना-भेदसे ध्यानमें अलग अलग रूप (चतुर्भुज-द्विभुज आकार भेद तथा शुक्ल-रक्त-श्यामादि वर्ण भेद) दिखलायी देते हैं [उदारतापरायण श्रीगौरहरिके भक्त पहले श्रीगौरचन्द्रका ध्यान करते हैं और तब माधुर्य-भावापन्न जन श्रीगौरसे अभिन्न श्याम (द्वापर), रक्त (त्रेता) और शुक्ल (सत्य) आदि रूपोंका दर्शन करते हैं] ॥ 157 ॥ लघुभागवतामृत (1/357) में उद्धृत श्रीनारदपञ्चरात्र-वचन :- मणैर्यथा विभागेन नीलपीतादिभिर्युतः। रूपभेदमवाप्नोति ध्यानभेदात्तथाच्युतः॥ 157 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 157 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैदूर्यमणि जिस प्रकार विभिन्न वस्तुओंके निकट आनेसे उनके रङ्गके अनुसार नीले-पीले आदि रङ्गभेदसे दिखायी देती है, उसी प्रकार भक्तके भावानुसार ध्यानभेदसे एक अद्वितीय अच्युतके ध्यानमें अलग अलग रूप दिखलायी देते हैं ॥ 157 ॥ व्यङ्कटभट्टका महाप्रभुको श्रीकृष्ण समझना :- भट्ट कहे,-“काँहा आमि जीव पामर। काँहा तुमि सेइ कृष्ण, - साक्षात् ईश्वर ॥ 158 ॥ महाप्रभुके सिद्धान्तमें भट्टका दृढ़ विश्वास :- अगाध ईश्वर-लीला किछुइ ना जानि। तुमि येइ कह, सेइ सत्य करि' मानि ॥ 159 ॥ उपास्य लक्ष्मीनारायणकी कृपासे ही महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :- मोरे पूर्ण कृपा कैल लक्ष्मी-नारायण। ताँर कृपाय पाइनु तोमार चरण-दरशन ॥ 160 ॥ महाप्रभुकी कृपासे भट्टके द्वारा श्रीकृष्णसेवा आरम्भ :- कृपा करि' कहिले मोरे कृष्णेर महिमा। याँर रूप-गुणैश्वर्येर केह ना पाय सीमा ॥ 161 ॥ एबे से जानिनु कृष्णभक्ति सर्वोपरि। कृतार्थ करिले, मोरे कहिले कृपा करि' ॥” 162 ॥ अनुभाष्य- मणिः (वैदूर्य) नीलादिभिः [गुणैः युतः सन्] यथा विभागेन [उपलक्षितः भवति, यद्वा, विभागेन उपलक्षितः सन् नीलादिभिर्युतः भवति] तथा अच्युतः (च्युतिरहितः, यद्वा, नास्ति च्युतं क्षरणं भक्तानां यस्मात्-“न च्यवन्ते हि यद्भक्ता महत्यां प्रलयापादि। अतोऽच्युतोऽखिले लोके महद्भिः परिगीयते ॥”* इति काशीखण्ड-वचनात्); ध्यानभेदात् (उपासनाभेदात्) रूपभेदं (चतुर्भुज-द्विभुजाद्याकारभेदं शुक्लरक्तश्यामादिकं च) अवाप्नोति 364 ।
नौवाँ अध्याय 9/158–171 ] अनुवाद—व्येङ्कट भट्टने कहा,—“कहाँ मैं एक अधम जीव और कहाँ आप वही श्रीकृष्ण—साक्षात् ईश्वर। ईश्वरकी लीला अगाध (अनन्त) है, उस विषयमें मैं कुछ भी नहीं जानता। आपने जो कहा, मैं उसे ही सत्य मानता हूँ। श्रीलक्ष्मी-नारायणने मुझे अपनी सेवा प्रदान की है और उनकी कृपासे ही मुझे आपके श्रीचरणकमलोंका दर्शन प्राप्त हुआ है। आपने कृपा करके मुझे श्रीकृष्णकी महिमा बतलायी है, जिनके रूप-गुण-ऐश्वर्यकी सीमाको कोई नहीं पा सकता। अब मैं जान गया हूँ कि श्रीकृष्णभक्ति ही सर्वोपरि है। आपने कृपा करके यह सब बतलाकर मुझे कृतार्थ कर दिया है॥” 158–162 ॥ भट्टका महाप्रभुको प्रणाम और महाप्रभुका आलिङ्गन :— एत बलि' भट्ट पड़िला प्रभुर चरणे। कृपा करि' प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गने॥ 163॥ अनुवाद—इतना कहकर व्येङ्कट भट्ट महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंमें गिर पड़े। महाप्रभुने अहैतुकी कृपाके कारण उनका आलिङ्गन किया॥ 163॥ चातुर्मास्यके अन्तमें महाप्रभुकी पुनः दक्षिण-यात्रा :— चातुर्मास्य पूर्ण हैल, भट्ट-आज्ञा लञा। दक्षिण चलिला प्रभु श्रीरङ्ग देखिया॥ 164॥ अनुवाद—चातुर्मास्यके पूर्ण होनेपर महाप्रभु व्येङ्कट भट्टसे आज्ञा लेकर और श्रीरङ्गनाथके दर्शन करके दक्षिणकी ओर चल दिये॥ 164॥ अनुगामी भट्टको महाप्रभुके द्वारा सान्त्वना-दान :— सङ्गेते चलिला भट्ट, ना याय भवने। ताँरे विदाय दिला प्रभु अनेक यतने॥ 165॥ महाप्रभुके विरहमें भट्ट :— प्रभुर वियोगे भट्ट हैल अचेतन। एइ रङ्गलीला करे शचीर नन्दन॥ 166॥ अनुवाद—व्येङ्कट भट्ट महाप्रभुके साथ-साथ चलने लगे, वे अपने घर लौट नहीं रहे थे। महाप्रभुने बहुत यत्न करके उन्हें विदा किया। महाप्रभुके विरहमें व्येङ्कट भट्ट मूर्च्छित होकर गिर पड़े। श्रीशचीनन्दन इस प्रकारकी अद्भुत लीलाएँ करते हैं॥ 165–166॥ ऋषभ पर्वतपर महाप्रभुके द्वारा नारायणका दर्शन :— ऋषभ-पर्वते चलि' आइला गौरहरि। नारायण देखिला ताँहा नति-स्तुति करि'॥ 167॥ अनुवाद—तब महाप्रभु ऋषभ-पर्वतपर आये। वहाँ उन्होंने भगवान् श्रीमन्नारायणके विग्रहका दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया और स्तव-स्तुति की॥ 167॥ अनुभाष्य—'ऋषभ पर्वत'—दक्षिण-कर्णाटकमें मादुरा जिलेके एक प्रान्तमें है। मादुराके बारह मील उत्तरमें 'आनागड़मलय-पर्वत' कुटकाचलके उपवनमें जिस स्थानपर ऋषभदेव दावानलके द्वारा भस्मीभूत हुए थे, वही आजकल 'पालनि हिल'के नामसे विख्यात है॥ 167॥ परमानन्दपुरीके साथ मिलन :— परमानन्दपुरी ताँहा रहे चतुर्मास। शुनि' महाप्रभु गेला पुरी-गोसाञिर पाश॥ 168॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्दपुरी भी ऋषभ पर्वतपर रहकर चातुर्मास्यका पालन कर रहे थे। यह सुनकर महाप्रभु श्रीपुरी गोसांईके दर्शनके लिये उनके पास गये॥ 168॥ गुरुज्ञानसे पुरीकी वन्दना और पुरीके द्वारा आलिङ्गन :— पुरी-गोसाञिर प्रभु कैल चरण-वन्दन। प्रेमे पुरी गोसाञि ताँरे कैल आलिङ्गन॥ 169॥ तिनदिन प्रेमे दोँहे कृष्णकथा-रङ्गे। सेइ विप्र-घरे दोँहे रहे एकसङ्गे॥ 170॥ पुरी-गोसाञि बोले,—“आमि याब पुरुषोत्तमे। पुरुषोत्तम देखि' गौड़े याब गङ्गास्नाने॥” 171॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीपरमानन्दपुरीके चरणोंमें प्रणाम करके उनकी वन्दना की। श्रीपुरी गोस्वामीने प्रेममें । 365
[ 9/169-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला विभोर होकर उनका आलिङ्गन किया। महाप्रभु भी परमानन्दपुरीके साथ उस ब्राह्मणके घरमें रहे जहाँ वे पहले रह रहे थे। दोनोंने प्रेमपूर्वक कृष्णकथाकी चर्चामें तीन दिन बिताये। श्रीपुरी गोस्वामीने महाप्रभुसे कहा,—“मैं पुरुषोत्तम जाकर श्रीजगन्नाथका दर्शन करके गङ्गास्नान करनेके लिये गौड़देश जाऊँगा॥” 169-171 ॥ अनुभाष्य- 'सेइ विप्रघरे' (उस ब्राह्मणके घर) -यहाँ किस ब्राह्मणके विषयमें कहा है, वह जानना कठिन है॥ 170॥ प्रभु कहे,—“तुमि पुनः आइस नीलाचले। आमि सेतुबन्ध हैते आसिब अल्पकाले॥ 172॥ तोमार निकटे रहि, -हेन वाञ्छा हय। नीलाचले आसिबे, मोरे हञा सदय ॥” 173॥ अनुवाद-महाप्रभुने उनसे कहा,–“आप वहाँसे पुनः नीलाचल आइयेगा, मैं भी सेतुबन्ध (रामेश्वरसे) होकर थोड़े समयमें नीलाचल पहुँच जाऊँगा। मेरी आपके पास रहनेकी इच्छा है। कृपा करके आप अवश्य ही नीलाचल आइयेगा॥” 172-173 ॥ एत बलि' ताँर ठाञि आज्ञा लञा। दक्षिणे चलिला प्रभु हरषित हञा ॥ 174॥ परमानन्द पुरी तबे चलिला नीलाचले। महाप्रभु चलि तबे आइला श्रीशैले ॥ 175॥ अनुवाद-इस प्रकार निवेदन करके उनसे आज्ञा लेकर महाप्रभु हर्षित होकर दक्षिणकी ओर चल पड़े। श्रीपरमानन्दपुरी भी तब नीलाचलकी ओर चल दिये। महाप्रभु चलते-चलते श्रीशैल पहुँचे॥ 174-175॥ अनुभाष्य— 'श्रीशैल' - यहाँ किस श्रीशैलकी बात कह रहे हैं, यह समझ नहीं आता; यहाँ मल्लिकार्जुनका मन्दिर नहीं है, क्योंकि धारवाड़-जिलेमें अवस्थित श्रीशैल यहाँ नहीं हो सकता, वह श्रीशैल बेलगामके दक्षिणमें है जहाँ अनादिलिङ्ग 'मल्लिकार्जुन' (मध्यलीला 9/15 संख्या) विराजमान है; “श्रीपर्वते महादेवो देव्या सह महाद्युतिः। न्यवसत् परमप्रीतो ब्रह्मा च त्रिदशैः सह॥” (माः भाः वनपर्वमें 58 अः) अर्थात् “श्रीपर्वतपर महाद्युतिमान् श्रीमहादेव पार्वतीदेवीजीके साथ और परमप्रीतिमान् ब्रह्माजी देवताओंके साथ वास करते हैं॥” 175॥ महाप्रभुके साथ भव और भवानीका साक्षात्कार :- शिव-दुर्गा रहे ताँहा ब्राह्मणेर वेशे। महाप्रभु देखि' दोँहार हइल उल्लासे ॥ 176॥ दास-दासीके घरमें भिक्षाके छलसे उनकी सेवा ग्रहण :- तिन दिन भिक्षा दिल करि' निमन्त्रण। निभृते बसि' गुप्तवार्त्ता कहे दुइ जन ॥ 177॥ कामकोष्ठोपुरीमें आगमन :- ताँर सङ्गे महाप्रभु करि इष्टगोष्ठी। आज्ञा लञा आइला तबे पुरी कामकोष्ठो ॥ 178॥ अनुवाद—वहाँ श्रीशिव-दुर्गा ब्राह्मण दम्पत्तिके वेशमें रह रहे थे। महाप्रभुको देखकर उन दोनोंको बड़ा उल्लास हुआ। तीन दिन तक उन दोनोंने महाप्रभुको निमन्त्रण करके भोजन कराया और ऐकान्तमें बैठकर उन दोनोंने महाप्रभुके साथ कुछ गुप्त बातें कीं। उन दोनोंके साथ इष्टगोष्ठी करनेके बाद महाप्रभु उनसे आज्ञा लेकर कामकोष्ठो पुरीमें आये॥ 176-178॥ मादुरामें आगमन :- दक्षिण-मथुरा आइला कामकोष्ठि हैते। ताँहा देखा हैल एक ब्राह्मण-सहिते ॥ 179॥ अनुवाद-कामकोष्ठोसे महाप्रभु दक्षिण-मथुरा (मादुरा) आये और वहाँ उनकी एक ब्राह्मणसे भेंट हुई॥ 179॥ अनुभाष्य—'दक्षिण-मथुरा' - वर्तमान समयमें जिसको 'मादुरा' कहते हैं, यह भाग़ाइ-नदीके तटपर है। यह 'शैव क्षेत्र'के नामसे प्रसिद्ध है। यह स्थान पर्वत और वनसे परिपूर्ण है। यहाँ 'रामेश्वर', 'सुन्दरेश्वर' और 'मीनाक्षी देवी' हैं। इन मीनाक्षी-देवीका मन्दिर बहुत 366 ।
नौवाँ अध्याय 9/179–187 ] विशाल और विशेषरूपसे देखने योग्य है। यह नगरी बहुत समय तक पाण्ड्यवंशीय राजाओंके शासनके अधीन थी। मुसलमानोंके आक्रमणसे 'सुन्दरलिङ्ग'के मन्दिरके बहुत अंश विध्वंस हो गये। 1372 ईसवीमें 'कम्पन्न उदयैर'ने मादुराके सिंहासनपर अधिकार किया। बहुत पहले राजा कुलशेखरने इस पुरीका निर्माण करके इसमें ब्राह्मणोंके घरोंको स्थापित किया था। 'अनन्तगुणपाण्ड्य'—कुलशेखरसे ग्यारहवें अधस्तन (वंशज) हैं॥ 179 ॥ वहाँ एक रामभक्त-ब्राह्मणके घरपर भिक्षा :- सेइ विप्र महाप्रभुके कैल निमन्त्रण। रामभक्त सेइ विप्र—विरक्त महाजन॥ 180 ॥ स्नानके बाद प्रसाद सेवाके लिये महाप्रभुका आगमन, किन्तु ब्राह्मणका रसोई न बनाना :- कृतमालाय स्नान करि' आइला ताँर घरे। भिक्षा कि दिबेन विप्र,—पाक नाहि करे॥ 181 ॥ अनुवाद—उस ब्राह्मणने महाप्रभुको भिक्षाके लिये अपने घरमें निमन्त्रण किया। वह ब्राह्मण रामभक्त था और विरक्त महात्मा था। कृतमाला नदीमें स्नान करके महाप्रभु उस ब्राह्मणके घर आये, परन्तु वह ब्राह्मण भिक्षा क्या करायेगा, उसने तब तक भोजनके लिये कुछ भी नहीं बनाया था॥ 180-181 ॥ अनुभाष्य—'कृतमाला'—वर्तमान समयमें 'बैगाइ' अथवा 'भगाइ' नदीकी एक धारा है। 'सरुली', 'वराह-नदी' और 'वट्टिल्ल गुण्डु'—ये तीन धाराएँ बैगाई-नदीमें आकर मिलती है। (भा: 11/5/39)—“ताम्रपर्णी-नदी यत्र कृतमाला पयःस्विनी॥” अर्थात् “जहाँ ताम्रपर्णी, कृतमाला और पयस्विनी नदियाँ बहती हैं॥” 181 ॥ रसोई न बनाना और उपवास :- महाप्रभु कहे ताँरे,—“शुन महाशय। मध्याह्न हैल, केने पाक नाहि हय॥” 182 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस ब्राह्मणसे कहा,—“सुनो महाशय ! मध्याह्नका समय हो गया है, आपने अब तक रसोई नहीं बनायी है॥” 182 ॥ ब्राह्मणकी मानसी उपासना :- विप्र कहे,—“प्रभु मोर अरण्ये वसति। पाकेर सामग्री वने ना मिले सम्प्रति॥ 183 ॥ वन्य शाक-फल-मूल आनिबे लक्ष्मण। तबे सीता करिबेन पाक-प्रयोजन॥” 184 ॥ अनुवाद—ब्राह्मणने उत्तर दिया,—“मेरे प्रभु वनमें वास करते हैं। वनमें इस समय भोजन बनानेकी सामग्री नहीं मिलती। लक्ष्मणजी जब वनसे शाक, फल और मूल आदि लायेंगे, तभी श्रीसीतादेवी रसोईका प्रबन्ध करेंगी॥” 183-184 ॥ सुनकर महाप्रभुकी प्रसन्नता और ब्राह्मणका रन्धन :- ताँर उपासना शुनि' प्रभु तुष्ट हैला। आस्ते-व्यस्ते सेइ विप्र रन्धन करिला॥ 185 ॥ अनुवाद—उस ब्राह्मणकी उपासनाके विषयमें सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। अन्तमें उस ब्राह्मणने बहुत शीघ्रतासे भोजन तैयार किया॥ 185 ॥ तृतीय प्रहरमें महाप्रभुका भोजन, किन्तु ब्राह्मणका उपवास :- प्रभु भिक्षा कैल दिनेर तृतीय प्रहरे। अनिर्विघ्न सेइ विप्र उपवास करे॥ 186 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने दिनके तीसरे प्रहरमें भोजन ग्रहण किया, किन्तु क्षुब्ध होनेके कारण उस ब्राह्मणने उपवास किया॥ 186 ॥ उपवासके कारणकी जिज्ञासा :- प्रभु कहे,—“विप्र, काँहे कर उपवास। केने एत दुःख, केने करह हुताश॥” 187 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उससे पूछा,—“हे ब्राह्मण! तुम । 367
[ 9/187–196 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उपवास क्यों कर रहे हैं? तुम इतने दुःखी क्यों हो? किसलिये इतने चिन्तित हो? ॥” 187 ॥ रावणके द्वारा सीतादेवीके अपहरणके विषयमें विचारकर ब्राह्मणका दुःख और आत्महत्याका सङ्कल्प :- विप्र कहे,—“मोर जीवने नाहि प्रयोजन। अग्नि-जले प्रवेशिया छाड़िब जीवन ॥ 188 ॥ जगन्माता महालक्ष्मी सीता-ठाकुराणी। राक्षसे स्पर्शिल ताँरे,—इहा काने शुनि ॥ 189 ॥ ए शरीर धरिबारे कभु ना युयाय। एइ दुःखे ज्वले देह, प्राण नाहि याय ॥” 190 ॥ अनुवाद—उस ब्राह्मणने कहा,—“मेरे जीवित रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है। मैं अग्नि अथवा जलमें प्रवेश करके अपना जीवन त्याग दूँगा। श्रीसीता-ठाकुराणी जगत्-माता और महालक्ष्मी हैं, उनको रावण नामक राक्षसने स्पर्श किया, यह बात सुनकर मैं बहुत दुःखी हूँ। इस दुःखके कारण मैं अब और शरीर धारण नहीं कर सकता। इस दुःखसे मेरा शरीर जलता है, परन्तु प्राण नहीं निकलते॥” 188–190 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अग्नि-जले'—अग्निमें अथवा जलमें॥ 188 ॥ महाप्रभुके द्वारा आश्वासन और सत्सिद्धान्तका वर्णन :- प्रभु कहे,—“ए भावना ना करिह आर। पण्डित हञा मने ना करह विचार ॥ 191 ॥ अधोक्षजवस्तु अक्षज-चेष्टासे परे :- ईश्वर-प्रेयसी सीता-चिदानन्दमूर्ति। प्राकृत-इन्द्रियेर ताँरे देखिते नाहि शक्ति ॥ 192 ॥ रावण किसी प्रकारसे सीताके दर्शन-स्पर्शयोग्य नहीं :- स्पर्शिवार कार्य आछुक, ना पाय दर्शन। सीतार आकृति-माया हरिल रावण ॥ 193 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने सान्त्वना देते हुए उससे कहा,—“ऐसा विचार कभी भी अपने मनमें मत लाना। पण्डित होकर इसपर विचार क्यों नहीं करते? श्रीसीतादेवी भगवान्की प्रेयसी हैं, उनकी देह चिदानन्दमय है। प्राकृत इन्द्रियोंकी उन्हें देखनेकी शक्ति नहीं है। श्रीसीतादेवीको स्पर्श करनेकी बात तो दूर रहे, कोई मायाबद्ध जीव उनका दर्शन भी नहीं कर सकता। उनकी मायिक-आकृतिका ही रावणने हरण किया था॥ 191–193 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सीताजी स्वयं चिदानन्दमूर्ति हैं, उनकी चिदाकृतिकी छायास्वरूप माया-सीताका ही रावणने हरण किया था॥ 192 ॥ रावणके द्वारा छायारूपी सीताका अपहरण :- रावण आसितेइ सीता अन्तर्धान कैल। रावणेर आगे माया-सीता पाठाइल ॥ 194 ॥ वैकुण्ठ-वस्तु जड़के द्वारा मापी नहीं जा सकती :- अप्राकृत वस्तु नहे प्राकृत-गोचर। वेद-पुराणेते एइ कहे निरन्तर ॥ 195 ॥ महाप्रभुके द्वारा आश्वासन :- विश्वास करह तुमि आमार वचने। पुनरपि कु-भावना ना करिह मने ॥” 196 ॥ अनुवाद—रावणके आते ही वास्तविक सीता अन्तर्धान हो गयी थीं और रावणको छलनेके लिये उन्होंने अपने मायामय रूपको ही उसके सामने भेजा था। अप्राकृत वस्तु प्राकृत इन्द्रियोंसे अनुभव नहीं की जा सकती। वेद-पुराणोंका सदा यही निर्णय है। मेरी बातपर विश्वास करो और फिर कभी भी अपने मनमें इस प्रकारकी बुरी भावना मत लाना॥” 194–196 ॥ अनुभाष्य—(कठोपनिषद् 2/3)— “इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम्। सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम्॥ अव्यक्तात् तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च। यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वञ्च गच्छति॥ न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य, न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्। हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो, य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ×× नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ॥” (भाः 10/84/13)— 368 ।
नौवाँ अध्याय 9/195-200 ] “यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः। यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचिज्जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः॥” अर्थात् “सभी इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धिसे देह और इन्द्रियोंका स्वामी जीवात्मा श्रेष्ठ है एवं जीवात्मासे अव्यक्त (जिसे अतिक्रम करना अति दुष्कर है) माया श्रेष्ठ है। मायासे सर्वव्यापक और प्राकृतधर्मरहित पुरुषोत्तम श्रेष्ठ है। उनको जाननेसे ही जीव अमृतत्व (जन्म-मृत्युसे मुक्ति) प्राप्त करता है। उनका रूप जीवको दिखलायी नहीं देता, कोई भी (अपनी चेष्टासे) नेत्रोंसे उनके दर्शन नहीं कर सकता। वे केवल भक्तिसे पवित्र हुए हृदयसे निर्मल मनके द्वारा और विशुद्ध बुद्धिकी सहायतासे जीवकी धारणाके विषय होते हैं। जो उनको इस प्रकार जानता है, वही अमृतत्व लाभ करता है।xx वे परमेश्वर वाणीके द्वारा नहीं जाने जाते, मनके द्वारा उनका बोध नहीं होता, नेत्रोंके द्वारा वे देखें नहीं जा सकते (कठोपनिषद्)।” “जो मनुष्य त्रिधातुओं (कफ-वात-पित्त) से बने जड़ शरीरमें आत्मबुद्धि, स्त्री-पुत्रादिमें ममत्वबुद्धि, जन्मभूमिमें पूजनीयबुद्धि तथा जलादिमें तीर्थबुद्धि रखता है—किन्तु इन समस्त बुद्धिके मध्य किसी प्रकारकी बुद्धि भगवद्भक्तोंमें नहीं हो, तो वह गाय आदि (घास चरनेवाले) पशुओंमें भी गधा ही है॥”195॥ ब्राह्मणका महाप्रभुके वाक्योंपर विश्वास और भोजन :- प्रभुर वचने विप्रेर हइल विश्वास। भोजन करिल, हैल जीवनेर आश॥ 197॥ अनुवाद-महाप्रभुके वचन सुनकर ब्राह्मणको उनपर विश्वास हुआ। तब उसने भोजन किया और उसमें जीवनको धारण करनेकी आशाका सञ्चार हुआ॥ 197॥ दुर्वशनमें 'रामचन्द्र'का दर्शन :- ताँरे आश्वासिया प्रभु करिला गमन। कृतमालाय स्नान करि' आइला दुर्वशन॥ 198॥ महेन्द्रपर्वतपर भृगुराम-दर्शन :- दुर्वशने रघुनाथे कैल दरशन। महेन्द्र-शैले परशुरामेर कैल वन्दन॥ 199॥ अनुवाद-उस ब्राह्मणको आश्वासन देकर महाप्रभु वहाँसे चल दिये और कृतमाला नदीमें स्नान करके दुर्वशन नामक स्थानपर आये। दुर्वशनमें महाप्रभुने श्रीरघुनाथके दर्शन किये। फिर महेन्द्र-पर्वतपर जाकर श्रीपरशुरामके दर्शनकर उनकी वन्दना की॥198-199॥ अनुभाष्य- 'दुर्वशन'-'दर्भशयन' अथवा श्रीरामचन्द्रजीका मन्दिर, रामनादसे सात मील पूर्वकी ओर समुद्रके तटपर अवस्थित है। 'महेन्द्र-शैल'-'तिनेभेलि'के निकट इस पर्वतकी तलहटीमें 'त्रिचिनगुड़िं'-नगर है; इसके पश्चिममें त्रिवाङ्कुर-राज्य है। रामायणमें महेन्द्र-पर्वतका उल्लेख मिलता है॥199॥ धनुषकोटि-तीर्थ-स्नान, रामेश्वरका दर्शन और विश्राम :- सेतुबन्धे आसिं' कैल धनुस्तीर्थे स्नान। रामेश्वर देखि' ताँहा करि विश्राम॥ 200॥ अनुवाद-वहाँसे सेतुबन्ध (रामेश्वर)में आकर महाप्रभुने धनुस्तीर्थमें स्नान किया और रामेश्वरका दर्शन करके वहाँपर विश्राम किया॥200॥ अनुभाष्य- सेतुबन्ध, धनुस्तीर्थ और रामेश्वर-'मण्डपम्' और 'पम्बम्' द्वीपके बीच समुद्रमें कहीं रेतीला और कहीं जलमग्न मार्ग वर्तमान है। पम्बम् द्वीपकी लम्बाई साढ़े पाँच कोस और चौड़ाई तीन कोस है। पम्बम्-बन्दरगाहसे चार मील उत्तरमें 'रामेश्वर'-मन्दिर है-“देवीपत्तनमारभ्य गच्छेयुः सेतुबन्धम्।” इस स्थानपर चौबीस तीर्थ हैं, उनमेंसे 'धनुष्कोटि' भी एक है। यह रामेश्वरसे बारह मील दक्षिण-पूर्वमें है। विभीषणकी प्रार्थनापर अयोध्या वापिस लौटनेसे पहले श्रीरामचन्द्रने (मतान्तरमें लक्ष्मणने) अपने धनुषके कोनेसे सेतु (पुल) को तोड़ दिया था। इस धनुस्तीर्थका दर्शन करनेसे पुनर्जन्म नहीं होता; धनुस्तीर्थमें स्नान करनेसे । 369
[ 9/200–211 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अग्निष्टोमादि यज्ञोंकी अपेक्षा अधिक फल प्राप्त होता है। पम्बम्-द्वीपमें स्थित सेतुबन्धमें रामेश्वर-शिवमूर्ति अर्थात् 'राम ही जिनके ईश्वर हैं',-ऐसे भक्तावतार शिवकी मूर्ति है॥ 200 ॥ ब्राह्मणोंकी सभामें कूर्मपुराणके पाठका श्रवण :- विप्र-सभाय सुने ताँहा कूर्म-पुराण। तार मध्ये आइला पतिव्रता-उपाख्यान॥ 201 ॥ पतिव्रता-शिरोमणि जनक-नन्दिनी। जगतेर माता सीता-रामेर गृहिणी॥ 202 ॥ अनुवाद—रामेश्वरमें ब्राह्मण-सभामें महाप्रभुने कूर्म-पुराणकी कथाको सुना। कथामें पतिव्रताका प्रसङ्ग आया कि जनकनन्दिनी सीताजी पतिव्रता-शिरोमणि हैं, वे श्रीरामचन्द्रकी पत्नी और जगत्-माता हैं॥ 201-202 ॥ अनुभाष्य—'कूर्मपुराण'—वर्तमान समयके कूर्म-पुराणमें केवलमात्र पूर्व और उत्तर—दो खण्ड ही प्राप्त होते हैं। वास्तविक कूर्मपुराण छह हजार श्लोकवाला नहीं; इसमें सत्तरह हजार श्लोक थे। भागवतके मतानुसार—“तत् सप्त-दशसाहस्रं सूचतुःसंहितं शुभम्। सप्तदश-सहस्राणि लक्ष्मीकल्पानुषङ्गिकम्॥”—यह अठारह महापुराणोंमें पन्द्रहवाँ पुराण है॥ 201 ॥ रावणका छाया-सीताके अपहरणके वृत्तान्तका श्रवण :- रावण देखिया सीता लैल अग्निर शरण। रावण हैते अग्नि कैल सीताके आवरण॥ 203 ॥ 'मायासीता' रावण निल, शुनिला आख्याने। शुनि' महाप्रभु हैल आनन्दित मने॥ 204 ॥ सीता लञा राखिलेन पार्वतीर स्थाने। 'मायासीता' दिया अग्नि वञ्चिला रावणे॥ 205 ॥ रघुनाथ आसि' यबे रावणे मारिल। अग्नि-परीक्षा दिते यबे सीतारे आनिल॥ 206 ॥ तबे मायासीता अग्न्ये कैल अन्तर्धान। सत्य-सीता आनि' दिल राम-विद्यमान॥ 207 ॥ अनुवाद—रावणको देखकर सीताजीने अग्निदेवकी शरण ली और अग्निदेवने सीताजीको रावणसे छिपा लिया। रावणने तो 'मायासीता'का हरण किया था, यह सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। अग्निदेवने असली सीताजीको पार्वतीजीके पास पहुँचा दिया और मायासीता देकर रावणके साथ छल किया। श्रीरघुनाथने जब रावणका वध किया और सीताजीकी अग्नि-परीक्षाके लिये जब उन्हें लाया गया, तब अग्निदेवने मायासीताको अन्तर्धान करके असली सीताजीको लाकर श्रीरामचन्द्रको सौंप दिया॥ 203-207 ॥ सत्-सिद्धान्त सुननेसे महाप्रभुको आनन्द और पुराणके ग्रन्थके पन्नोंको लेना :- ए-सब सिद्धान्त शुनि' प्रभुर आनन्द हैल। ब्राह्मणेर स्थाने मागि' सेइ पत्र निल॥ 208 ॥ नूतन पत्र लेखाञा पुस्तके देओयाइल। प्रतीति लागि' पुरातन पत्र मागि' निल॥ 209 ॥ अनुवाद—ये सब सिद्धान्त सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ और उन्होंने उन ब्राह्मणोंसे कूर्मपुराणके उन पन्नोंको माँगकर ले लिया। महाप्रभुने उन पुराने पन्नोंकी नकल करवाकर नये पन्नोंको पुरानी पुस्तकमें जोड़ दिया और प्रमाणके रूपमें उन्होंने ब्राह्मणोंसे पुराने पन्नोंको अपने पास रखनेकी अनुमति ले ली॥ 208-209 ॥ दक्षिण-मथुरामें आकर सीताभक्त ब्राह्मणको पत्रार्पण :- पत्र लञा पुनः दक्षिण-मथुरा आइला। रामदास-विप्रे सेइ पत्र आनि' दिला॥ 210 ॥ अनुवाद—उन पन्नोंको लेकर महाप्रभु पुनः दक्षिण मथुरा (मदुरा)में आये और उन्होंने रामदास ब्राह्मणको वे मूल-पत्रे दिये॥ 210 ॥ रावणके द्वारा मायासीता-अपहरणसूचक श्लोक :- कूर्मपुराण और बृहद्वह्निपुराण— सीताराधितो वह्निश्च्छाया-सीतामजीजनत्। तां जहार दशग्रीवः सीता वह्निपुरं गता॥ 211 ॥ 370 ।
नौवाँ अध्याय 9/211-218 ] परीक्षा-समये वहिं छाया-सीता विवेश सा। वह्निः सीतां समानीय तत्पुरस्तादनीनयत् ॥ 212 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 211-212 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सीताजीके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर अग्निदेवने 'छायासीता' प्रस्तुत की। दसमूख रावणने उन्हीं छायासीताका हरण किया था, मूल-सीताजी अग्निलोकमें ही रहीं। श्रीरामचन्द्रने जब परीक्षा की, तब छायासीताने अग्निमें प्रवेश किया, अग्निदेवने मूल सीताजीको लाकर उन्हें श्रीरामचन्द्रके निकट उपस्थित किया॥ 211-212 ॥ अनुभाष्य— सीतया (जनकनन्दिन्या) वह्निः (अग्निदेवः) आराधितः (अर्चितः सन्) छायासीतां (मायामयीं तादृशीं मूर्त्तिम्) अजीजनत् (प्रकटितवान्)। दशग्रीवः (दशभिरिन्द्रियैः भोगपरायणः रावणः) तां (प्राकृतां छायासीताम् एव, न तु मूलसीतां, सीतायाः अधोक्षजत्वात्) जहार। सीता (मूलसीता) [तु] वह्निपुरं गता। परीक्षासमये सा छायासीता वहिं विवेश। वह्निः तत्पुरस्तात् सीतां (मूलसीतां) समानीय अनीनयत्। श्लोक-भावानुवाद—जनकनन्दिनी सीताजीके द्वारा प्रार्थना करनेपर अग्निदेवने सीताजीके समान ही एक मायाकी मूर्ति प्रकटित कर दी। दसों इन्द्रियोंके द्वारा जो भोगोंमें ही लगा रहता था, उस दशानन रावणने छाया सीताका ही हरण किया था, मूल सीताका नहीं, क्योंकि सीताजी अधोक्षज हैं अर्थात् प्राकृत इन्द्रियाँ उन्हें देख-स्पर्श नहीं कर सकतीं। मूल सीताजी तो अग्नि लोकमें चली गयीं। परीक्षाके समय वह छाया सीता अग्निमें प्रवेश कर गयी और अग्निदेव मूलसीताको अपने लोकसे अपने साथ ले आये॥ 211-212 ॥ कूर्मपुराणके पन्ने और श्लोक-दर्शनसे विप्रको आनन्द :- पत्र पाञा विप्रेर हैल आनन्दित मन। प्रभुर चरणे धरि' करये क्रन्दन ॥ 213 ॥ अनुवाद—कूर्मपुराणके उन प्राचीन पत्रोंको प्राप्त करके वह ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर रोने लगा॥ 213 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कूर्मपुराण ग्रन्थमें नये पत्रोंको लिखवाकर रामदासको दिखानेके लिये जिन प्राचीन पत्रोंको महाप्रभु लाये थे, उस पत्रोंको पाकर ब्राह्मणका मन बहुत प्रसन्न हुआ॥ 213 ॥ महाप्रभुको 'रघुनाथ' मानना :- विप्र कहे,–“तुमि साक्षात् श्रीरघुनन्दन। संन्यासीर वेषे मोरे दिला दरशन ॥ 214 ॥ ब्राह्मणका दैन्य, महाप्रभुको निमन्त्रण और भिक्षा दान :- महा-दुःख हइते मोरे करिला निस्तार। आजि मोर घरे भिक्षा कर अङ्गीकार ॥ 215 ॥ मनोदुःखे भाल भिक्षा ना दिल सेइ दिने। मोर भाग्ये पुनरपि पाइलुँ दरशने ॥” 216 ॥ एत बलि' सेइ विप्र सुखे पाक कैल। उत्तम प्रकारे प्रभुके भिक्षा कराइल ॥ 217 ॥ अनुवाद—ब्राह्मणने कहा,–“आप तो साक्षात् श्रीरघुनन्दन हैं जो संन्यासीके वेशमें मुझे अपने दर्शन दे रहे हैं। आपने महान् दुःखसे मेरा उद्धार किया है। कृपा करके आज आप मेरे घरपर भिक्षा ग्रहण कीजिये। मनमें दुःख होनेके कारण मैं उस दिन आपको अच्छी तरहसे भोजन नहीं करा सका, परन्तु मेरे सौभाग्यसे आज आप पुनः मेरे घरमें आये हैं।” यह कहकर उस ब्राह्मणने बड़े आनन्दसे भोजन बनाया और उत्तम-उत्तम व्यञ्जनोंके द्वारा महाप्रभुको भोजन कराया ॥ 214-217 ॥ एक रात ब्राह्मणके घरमें वास और ताम्रपर्णीमें स्नान :- सेइ रात्रि ताँहा रहि' ताँरे कृपा करि'। पाण्ड्यदेशे ताम्रपर्णी गेला गौरहरि ॥ 218 ॥ अनुवाद—उस रात महाप्रभु ब्राह्मणके घरमें ही रहे। अगले दिन उसपर कृपा करके श्रीगौरहरि पाण्ड्यदेशमें ताम्रपर्णीके लिये चले गये ॥ 218 ॥ । 371