श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1214, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 9/169-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला विभोर होकर उनका आलिङ्गन किया। महाप्रभु भी परमानन्दपुरीके साथ उस ब्राह्मणके घरमें रहे जहाँ वे पहले रह रहे थे। दोनोंने प्रेमपूर्वक कृष्णकथाकी चर्चामें तीन दिन बिताये। श्रीपुरी गोस्वामीने महाप्रभुसे कहा,—“मैं पुरुषोत्तम जाकर श्रीजगन्नाथका दर्शन करके गङ्गास्नान करनेके लिये गौड़देश जाऊँगा॥” 169-171 ॥ अनुभाष्य- 'सेइ विप्रघरे' (उस ब्राह्मणके घर) -यहाँ किस ब्राह्मणके विषयमें कहा है, वह जानना कठिन है॥ 170॥ प्रभु कहे,—“तुमि पुनः आइस नीलाचले। आमि सेतुबन्ध हैते आसिब अल्पकाले॥ 172॥ तोमार निकटे रहि, -हेन वाञ्छा हय। नीलाचले आसिबे, मोरे हञा सदय ॥” 173॥ अनुवाद-महाप्रभुने उनसे कहा,–“आप वहाँसे पुनः नीलाचल आइयेगा, मैं भी सेतुबन्ध (रामेश्वरसे) होकर थोड़े समयमें नीलाचल पहुँच जाऊँगा। मेरी आपके पास रहनेकी इच्छा है। कृपा करके आप अवश्य ही नीलाचल आइयेगा॥” 172-173 ॥ एत बलि' ताँर ठाञि आज्ञा लञा। दक्षिणे चलिला प्रभु हरषित हञा ॥ 174॥ परमानन्द पुरी तबे चलिला नीलाचले। महाप्रभु चलि तबे आइला श्रीशैले ॥ 175॥ अनुवाद-इस प्रकार निवेदन करके उनसे आज्ञा लेकर महाप्रभु हर्षित होकर दक्षिणकी ओर चल पड़े। श्रीपरमानन्दपुरी भी तब नीलाचलकी ओर चल दिये। महाप्रभु चलते-चलते श्रीशैल पहुँचे॥ 174-175॥ अनुभाष्य— 'श्रीशैल' - यहाँ किस श्रीशैलकी बात कह रहे हैं, यह समझ नहीं आता; यहाँ मल्लिकार्जुनका मन्दिर नहीं है, क्योंकि धारवाड़-जिलेमें अवस्थित श्रीशैल यहाँ नहीं हो सकता, वह श्रीशैल बेलगामके दक्षिणमें है जहाँ अनादिलिङ्ग 'मल्लिकार्जुन' (मध्यलीला 9/15 संख्या) विराजमान है; “श्रीपर्वते महादेवो देव्या सह महाद्युतिः। न्यवसत् परमप्रीतो ब्रह्मा च त्रिदशैः सह॥” (माः भाः वनपर्वमें 58 अः) अर्थात् “श्रीपर्वतपर महाद्युतिमान् श्रीमहादेव पार्वतीदेवीजीके साथ और परमप्रीतिमान् ब्रह्माजी देवताओंके साथ वास करते हैं॥” 175॥ महाप्रभुके साथ भव और भवानीका साक्षात्कार :- शिव-दुर्गा रहे ताँहा ब्राह्मणेर वेशे। महाप्रभु देखि' दोँहार हइल उल्लासे ॥ 176॥ दास-दासीके घरमें भिक्षाके छलसे उनकी सेवा ग्रहण :- तिन दिन भिक्षा दिल करि' निमन्त्रण। निभृते बसि' गुप्तवार्त्ता कहे दुइ जन ॥ 177॥ कामकोष्ठोपुरीमें आगमन :- ताँर सङ्गे महाप्रभु करि इष्टगोष्ठी। आज्ञा लञा आइला तबे पुरी कामकोष्ठो ॥ 178॥ अनुवाद—वहाँ श्रीशिव-दुर्गा ब्राह्मण दम्पत्तिके वेशमें रह रहे थे। महाप्रभुको देखकर उन दोनोंको बड़ा उल्लास हुआ। तीन दिन तक उन दोनोंने महाप्रभुको निमन्त्रण करके भोजन कराया और ऐकान्तमें बैठकर उन दोनोंने महाप्रभुके साथ कुछ गुप्त बातें कीं। उन दोनोंके साथ इष्टगोष्ठी करनेके बाद महाप्रभु उनसे आज्ञा लेकर कामकोष्ठो पुरीमें आये॥ 176-178॥ मादुरामें आगमन :- दक्षिण-मथुरा आइला कामकोष्ठि हैते। ताँहा देखा हैल एक ब्राह्मण-सहिते ॥ 179॥ अनुवाद-कामकोष्ठोसे महाप्रभु दक्षिण-मथुरा (मादुरा) आये और वहाँ उनकी एक ब्राह्मणसे भेंट हुई॥ 179॥ अनुभाष्य—'दक्षिण-मथुरा' - वर्तमान समयमें जिसको 'मादुरा' कहते हैं, यह भाग़ाइ-नदीके तटपर है। यह 'शैव क्षेत्र'के नामसे प्रसिद्ध है। यह स्थान पर्वत और वनसे परिपूर्ण है। यहाँ 'रामेश्वर', 'सुन्दरेश्वर' और 'मीनाक्षी देवी' हैं। इन मीनाक्षी-देवीका मन्दिर बहुत 366 ।