भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1213

नौवाँ अध्याय 9/158–171 ] अनुवाद—व्येङ्कट भट्टने कहा,—“कहाँ मैं एक अधम जीव और कहाँ आप वही श्रीकृष्ण—साक्षात् ईश्वर। ईश्वरकी लीला अगाध (अनन्त) है, उस विषयमें मैं कुछ भी नहीं जानता। आपने जो कहा, मैं उसे ही सत्य मानता हूँ। श्रीलक्ष्मी-नारायणने मुझे अपनी सेवा प्रदान की है और उनकी कृपासे ही मुझे आपके श्रीचरणकमलोंका दर्शन प्राप्त हुआ है। आपने कृपा करके मुझे श्रीकृष्णकी महिमा बतलायी है, जिनके रूप-गुण-ऐश्वर्यकी सीमाको कोई नहीं पा सकता। अब मैं जान गया हूँ कि श्रीकृष्णभक्ति ही सर्वोपरि है। आपने कृपा करके यह सब बतलाकर मुझे कृतार्थ कर दिया है॥” 158–162 ॥ भट्टका महाप्रभुको प्रणाम और महाप्रभुका आलिङ्गन :— एत बलि' भट्ट पड़िला प्रभुर चरणे। कृपा करि' प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गने॥ 163॥ अनुवाद—इतना कहकर व्येङ्कट भट्ट महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंमें गिर पड़े। महाप्रभुने अहैतुकी कृपाके कारण उनका आलिङ्गन किया॥ 163॥ चातुर्मास्यके अन्तमें महाप्रभुकी पुनः दक्षिण-यात्रा :— चातुर्मास्य पूर्ण हैल, भट्ट-आज्ञा लञा। दक्षिण चलिला प्रभु श्रीरङ्ग देखिया॥ 164॥ अनुवाद—चातुर्मास्यके पूर्ण होनेपर महाप्रभु व्येङ्कट भट्टसे आज्ञा लेकर और श्रीरङ्गनाथके दर्शन करके दक्षिणकी ओर चल दिये॥ 164॥ अनुगामी भट्टको महाप्रभुके द्वारा सान्त्वना-दान :— सङ्गेते चलिला भट्ट, ना याय भवने। ताँरे विदाय दिला प्रभु अनेक यतने॥ 165॥ महाप्रभुके विरहमें भट्ट :— प्रभुर वियोगे भट्ट हैल अचेतन। एइ रङ्गलीला करे शचीर नन्दन॥ 166॥ अनुवाद—व्येङ्कट भट्ट महाप्रभुके साथ-साथ चलने लगे, वे अपने घर लौट नहीं रहे थे। महाप्रभुने बहुत यत्न करके उन्हें विदा किया। महाप्रभुके विरहमें व्येङ्कट भट्ट मूर्च्छित होकर गिर पड़े। श्रीशचीनन्दन इस प्रकारकी अद्भुत लीलाएँ करते हैं॥ 165–166॥ ऋषभ पर्वतपर महाप्रभुके द्वारा नारायणका दर्शन :— ऋषभ-पर्वते चलि' आइला गौरहरि। नारायण देखिला ताँहा नति-स्तुति करि'॥ 167॥ अनुवाद—तब महाप्रभु ऋषभ-पर्वतपर आये। वहाँ उन्होंने भगवान् श्रीमन्नारायणके विग्रहका दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया और स्तव-स्तुति की॥ 167॥ अनुभाष्य—'ऋषभ पर्वत'—दक्षिण-कर्णाटकमें मादुरा जिलेके एक प्रान्तमें है। मादुराके बारह मील उत्तरमें 'आनागड़मलय-पर्वत' कुटकाचलके उपवनमें जिस स्थानपर ऋषभदेव दावानलके द्वारा भस्मीभूत हुए थे, वही आजकल 'पालनि हिल'के नामसे विख्यात है॥ 167॥ परमानन्दपुरीके साथ मिलन :— परमानन्दपुरी ताँहा रहे चतुर्मास। शुनि' महाप्रभु गेला पुरी-गोसाञिर पाश॥ 168॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्दपुरी भी ऋषभ पर्वतपर रहकर चातुर्मास्यका पालन कर रहे थे। यह सुनकर महाप्रभु श्रीपुरी गोसांईके दर्शनके लिये उनके पास गये॥ 168॥ गुरुज्ञानसे पुरीकी वन्दना और पुरीके द्वारा आलिङ्गन :— पुरी-गोसाञिर प्रभु कैल चरण-वन्दन। प्रेमे पुरी गोसाञि ताँरे कैल आलिङ्गन॥ 169॥ तिनदिन प्रेमे दोँहे कृष्णकथा-रङ्गे। सेइ विप्र-घरे दोँहे रहे एकसङ्गे॥ 170॥ पुरी-गोसाञि बोले,—“आमि याब पुरुषोत्तमे। पुरुषोत्तम देखि' गौड़े याब गङ्गास्नाने॥” 171॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीपरमानन्दपुरीके चरणोंमें प्रणाम करके उनकी वन्दना की। श्रीपुरी गोस्वामीने प्रेममें । 365