भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1215

नौवाँ अध्याय 9/179–187 ] विशाल और विशेषरूपसे देखने योग्य है। यह नगरी बहुत समय तक पाण्ड्यवंशीय राजाओंके शासनके अधीन थी। मुसलमानोंके आक्रमणसे 'सुन्दरलिङ्ग'के मन्दिरके बहुत अंश विध्वंस हो गये। 1372 ईसवीमें 'कम्पन्न उदयैर'ने मादुराके सिंहासनपर अधिकार किया। बहुत पहले राजा कुलशेखरने इस पुरीका निर्माण करके इसमें ब्राह्मणोंके घरोंको स्थापित किया था। 'अनन्तगुणपाण्ड्य'—कुलशेखरसे ग्यारहवें अधस्तन (वंशज) हैं॥ 179 ॥ वहाँ एक रामभक्त-ब्राह्मणके घरपर भिक्षा :- सेइ विप्र महाप्रभुके कैल निमन्त्रण। रामभक्त सेइ विप्र—विरक्त महाजन॥ 180 ॥ स्नानके बाद प्रसाद सेवाके लिये महाप्रभुका आगमन, किन्तु ब्राह्मणका रसोई न बनाना :- कृतमालाय स्नान करि' आइला ताँर घरे। भिक्षा कि दिबेन विप्र,—पाक नाहि करे॥ 181 ॥ अनुवाद—उस ब्राह्मणने महाप्रभुको भिक्षाके लिये अपने घरमें निमन्त्रण किया। वह ब्राह्मण रामभक्त था और विरक्त महात्मा था। कृतमाला नदीमें स्नान करके महाप्रभु उस ब्राह्मणके घर आये, परन्तु वह ब्राह्मण भिक्षा क्या करायेगा, उसने तब तक भोजनके लिये कुछ भी नहीं बनाया था॥ 180-181 ॥ अनुभाष्य—'कृतमाला'—वर्तमान समयमें 'बैगाइ' अथवा 'भगाइ' नदीकी एक धारा है। 'सरुली', 'वराह-नदी' और 'वट्टिल्ल गुण्डु'—ये तीन धाराएँ बैगाई-नदीमें आकर मिलती है। (भा: 11/5/39)—“ताम्रपर्णी-नदी यत्र कृतमाला पयःस्विनी॥” अर्थात् “जहाँ ताम्रपर्णी, कृतमाला और पयस्विनी नदियाँ बहती हैं॥” 181 ॥ रसोई न बनाना और उपवास :- महाप्रभु कहे ताँरे,—“शुन महाशय। मध्याह्न हैल, केने पाक नाहि हय॥” 182 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस ब्राह्मणसे कहा,—“सुनो महाशय ! मध्याह्नका समय हो गया है, आपने अब तक रसोई नहीं बनायी है॥” 182 ॥ ब्राह्मणकी मानसी उपासना :- विप्र कहे,—“प्रभु मोर अरण्ये वसति। पाकेर सामग्री वने ना मिले सम्प्रति॥ 183 ॥ वन्य शाक-फल-मूल आनिबे लक्ष्मण। तबे सीता करिबेन पाक-प्रयोजन॥” 184 ॥ अनुवाद—ब्राह्मणने उत्तर दिया,—“मेरे प्रभु वनमें वास करते हैं। वनमें इस समय भोजन बनानेकी सामग्री नहीं मिलती। लक्ष्मणजी जब वनसे शाक, फल और मूल आदि लायेंगे, तभी श्रीसीतादेवी रसोईका प्रबन्ध करेंगी॥” 183-184 ॥ सुनकर महाप्रभुकी प्रसन्नता और ब्राह्मणका रन्धन :- ताँर उपासना शुनि' प्रभु तुष्ट हैला। आस्ते-व्यस्ते सेइ विप्र रन्धन करिला॥ 185 ॥ अनुवाद—उस ब्राह्मणकी उपासनाके विषयमें सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। अन्तमें उस ब्राह्मणने बहुत शीघ्रतासे भोजन तैयार किया॥ 185 ॥ तृतीय प्रहरमें महाप्रभुका भोजन, किन्तु ब्राह्मणका उपवास :- प्रभु भिक्षा कैल दिनेर तृतीय प्रहरे। अनिर्विघ्न सेइ विप्र उपवास करे॥ 186 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने दिनके तीसरे प्रहरमें भोजन ग्रहण किया, किन्तु क्षुब्ध होनेके कारण उस ब्राह्मणने उपवास किया॥ 186 ॥ उपवासके कारणकी जिज्ञासा :- प्रभु कहे,—“विप्र, काँहे कर उपवास। केने एत दुःख, केने करह हुताश॥” 187 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उससे पूछा,—“हे ब्राह्मण! तुम । 367