श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 9/187–196 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उपवास क्यों कर रहे हैं? तुम इतने दुःखी क्यों हो? किसलिये इतने चिन्तित हो? ॥” 187 ॥ रावणके द्वारा सीतादेवीके अपहरणके विषयमें विचारकर ब्राह्मणका दुःख और आत्महत्याका सङ्कल्प :- विप्र कहे,—“मोर जीवने नाहि प्रयोजन। अग्नि-जले प्रवेशिया छाड़िब जीवन ॥ 188 ॥ जगन्माता महालक्ष्मी सीता-ठाकुराणी। राक्षसे स्पर्शिल ताँरे,—इहा काने शुनि ॥ 189 ॥ ए शरीर धरिबारे कभु ना युयाय। एइ दुःखे ज्वले देह, प्राण नाहि याय ॥” 190 ॥ अनुवाद—उस ब्राह्मणने कहा,—“मेरे जीवित रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है। मैं अग्नि अथवा जलमें प्रवेश करके अपना जीवन त्याग दूँगा। श्रीसीता-ठाकुराणी जगत्-माता और महालक्ष्मी हैं, उनको रावण नामक राक्षसने स्पर्श किया, यह बात सुनकर मैं बहुत दुःखी हूँ। इस दुःखके कारण मैं अब और शरीर धारण नहीं कर सकता। इस दुःखसे मेरा शरीर जलता है, परन्तु प्राण नहीं निकलते॥” 188–190 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अग्नि-जले'—अग्निमें अथवा जलमें॥ 188 ॥ महाप्रभुके द्वारा आश्वासन और सत्सिद्धान्तका वर्णन :- प्रभु कहे,—“ए भावना ना करिह आर। पण्डित हञा मने ना करह विचार ॥ 191 ॥ अधोक्षजवस्तु अक्षज-चेष्टासे परे :- ईश्वर-प्रेयसी सीता-चिदानन्दमूर्ति। प्राकृत-इन्द्रियेर ताँरे देखिते नाहि शक्ति ॥ 192 ॥ रावण किसी प्रकारसे सीताके दर्शन-स्पर्शयोग्य नहीं :- स्पर्शिवार कार्य आछुक, ना पाय दर्शन। सीतार आकृति-माया हरिल रावण ॥ 193 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने सान्त्वना देते हुए उससे कहा,—“ऐसा विचार कभी भी अपने मनमें मत लाना। पण्डित होकर इसपर विचार क्यों नहीं करते? श्रीसीतादेवी भगवान्की प्रेयसी हैं, उनकी देह चिदानन्दमय है। प्राकृत इन्द्रियोंकी उन्हें देखनेकी शक्ति नहीं है। श्रीसीतादेवीको स्पर्श करनेकी बात तो दूर रहे, कोई मायाबद्ध जीव उनका दर्शन भी नहीं कर सकता। उनकी मायिक-आकृतिका ही रावणने हरण किया था॥ 191–193 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सीताजी स्वयं चिदानन्दमूर्ति हैं, उनकी चिदाकृतिकी छायास्वरूप माया-सीताका ही रावणने हरण किया था॥ 192 ॥ रावणके द्वारा छायारूपी सीताका अपहरण :- रावण आसितेइ सीता अन्तर्धान कैल। रावणेर आगे माया-सीता पाठाइल ॥ 194 ॥ वैकुण्ठ-वस्तु जड़के द्वारा मापी नहीं जा सकती :- अप्राकृत वस्तु नहे प्राकृत-गोचर। वेद-पुराणेते एइ कहे निरन्तर ॥ 195 ॥ महाप्रभुके द्वारा आश्वासन :- विश्वास करह तुमि आमार वचने। पुनरपि कु-भावना ना करिह मने ॥” 196 ॥ अनुवाद—रावणके आते ही वास्तविक सीता अन्तर्धान हो गयी थीं और रावणको छलनेके लिये उन्होंने अपने मायामय रूपको ही उसके सामने भेजा था। अप्राकृत वस्तु प्राकृत इन्द्रियोंसे अनुभव नहीं की जा सकती। वेद-पुराणोंका सदा यही निर्णय है। मेरी बातपर विश्वास करो और फिर कभी भी अपने मनमें इस प्रकारकी बुरी भावना मत लाना॥” 194–196 ॥ अनुभाष्य—(कठोपनिषद् 2/3)— “इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम्। सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम्॥ अव्यक्तात् तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च। यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वञ्च गच्छति॥ न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य, न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्। हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो, य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ×× नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ॥” (भाः 10/84/13)— 368 ।