भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1217, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1217

नौवाँ अध्याय 9/195-200 ] “यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः। यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचिज्जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः॥” अर्थात् “सभी इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धिसे देह और इन्द्रियोंका स्वामी जीवात्मा श्रेष्ठ है एवं जीवात्मासे अव्यक्त (जिसे अतिक्रम करना अति दुष्कर है) माया श्रेष्ठ है। मायासे सर्वव्यापक और प्राकृतधर्मरहित पुरुषोत्तम श्रेष्ठ है। उनको जाननेसे ही जीव अमृतत्व (जन्म-मृत्युसे मुक्ति) प्राप्त करता है। उनका रूप जीवको दिखलायी नहीं देता, कोई भी (अपनी चेष्टासे) नेत्रोंसे उनके दर्शन नहीं कर सकता। वे केवल भक्तिसे पवित्र हुए हृदयसे निर्मल मनके द्वारा और विशुद्ध बुद्धिकी सहायतासे जीवकी धारणाके विषय होते हैं। जो उनको इस प्रकार जानता है, वही अमृतत्व लाभ करता है।xx वे परमेश्वर वाणीके द्वारा नहीं जाने जाते, मनके द्वारा उनका बोध नहीं होता, नेत्रोंके द्वारा वे देखें नहीं जा सकते (कठोपनिषद्)।” “जो मनुष्य त्रिधातुओं (कफ-वात-पित्त) से बने जड़ शरीरमें आत्मबुद्धि, स्त्री-पुत्रादिमें ममत्वबुद्धि, जन्मभूमिमें पूजनीयबुद्धि तथा जलादिमें तीर्थबुद्धि रखता है—किन्तु इन समस्त बुद्धिके मध्य किसी प्रकारकी बुद्धि भगवद्भक्तोंमें नहीं हो, तो वह गाय आदि (घास चरनेवाले) पशुओंमें भी गधा ही है॥”195॥ ब्राह्मणका महाप्रभुके वाक्योंपर विश्वास और भोजन :- प्रभुर वचने विप्रेर हइल विश्वास। भोजन करिल, हैल जीवनेर आश॥ 197॥ अनुवाद-महाप्रभुके वचन सुनकर ब्राह्मणको उनपर विश्वास हुआ। तब उसने भोजन किया और उसमें जीवनको धारण करनेकी आशाका सञ्चार हुआ॥ 197॥ दुर्वशनमें 'रामचन्द्र'का दर्शन :- ताँरे आश्वासिया प्रभु करिला गमन। कृतमालाय स्नान करि' आइला दुर्वशन॥ 198॥ महेन्द्रपर्वतपर भृगुराम-दर्शन :- दुर्वशने रघुनाथे कैल दरशन। महेन्द्र-शैले परशुरामेर कैल वन्दन॥ 199॥ अनुवाद-उस ब्राह्मणको आश्वासन देकर महाप्रभु वहाँसे चल दिये और कृतमाला नदीमें स्नान करके दुर्वशन नामक स्थानपर आये। दुर्वशनमें महाप्रभुने श्रीरघुनाथके दर्शन किये। फिर महेन्द्र-पर्वतपर जाकर श्रीपरशुरामके दर्शनकर उनकी वन्दना की॥198-199॥ अनुभाष्य- 'दुर्वशन'-'दर्भशयन' अथवा श्रीरामचन्द्रजीका मन्दिर, रामनादसे सात मील पूर्वकी ओर समुद्रके तटपर अवस्थित है। 'महेन्द्र-शैल'-'तिनेभेलि'के निकट इस पर्वतकी तलहटीमें 'त्रिचिनगुड़िं'-नगर है; इसके पश्चिममें त्रिवाङ्कुर-राज्य है। रामायणमें महेन्द्र-पर्वतका उल्लेख मिलता है॥199॥ धनुषकोटि-तीर्थ-स्नान, रामेश्वरका दर्शन और विश्राम :- सेतुबन्धे आसिं' कैल धनुस्तीर्थे स्नान। रामेश्वर देखि' ताँहा करि विश्राम॥ 200॥ अनुवाद-वहाँसे सेतुबन्ध (रामेश्वर)में आकर महाप्रभुने धनुस्तीर्थमें स्नान किया और रामेश्वरका दर्शन करके वहाँपर विश्राम किया॥200॥ अनुभाष्य- सेतुबन्ध, धनुस्तीर्थ और रामेश्वर-'मण्डपम्' और 'पम्बम्' द्वीपके बीच समुद्रमें कहीं रेतीला और कहीं जलमग्न मार्ग वर्तमान है। पम्बम् द्वीपकी लम्बाई साढ़े पाँच कोस और चौड़ाई तीन कोस है। पम्बम्-बन्दरगाहसे चार मील उत्तरमें 'रामेश्वर'-मन्दिर है-“देवीपत्तनमारभ्य गच्छेयुः सेतुबन्धम्।” इस स्थानपर चौबीस तीर्थ हैं, उनमेंसे 'धनुष्कोटि' भी एक है। यह रामेश्वरसे बारह मील दक्षिण-पूर्वमें है। विभीषणकी प्रार्थनापर अयोध्या वापिस लौटनेसे पहले श्रीरामचन्द्रने (मतान्तरमें लक्ष्मणने) अपने धनुषके कोनेसे सेतु (पुल) को तोड़ दिया था। इस धनुस्तीर्थका दर्शन करनेसे पुनर्जन्म नहीं होता; धनुस्तीर्थमें स्नान करनेसे । 369