भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1219

नौवाँ अध्याय 9/211-218 ] परीक्षा-समये वहिं छाया-सीता विवेश सा। वह्निः सीतां समानीय तत्पुरस्तादनीनयत् ॥ 212 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 211-212 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सीताजीके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर अग्निदेवने 'छायासीता' प्रस्तुत की। दसमूख रावणने उन्हीं छायासीताका हरण किया था, मूल-सीताजी अग्निलोकमें ही रहीं। श्रीरामचन्द्रने जब परीक्षा की, तब छायासीताने अग्निमें प्रवेश किया, अग्निदेवने मूल सीताजीको लाकर उन्हें श्रीरामचन्द्रके निकट उपस्थित किया॥ 211-212 ॥ अनुभाष्य— सीतया (जनकनन्दिन्या) वह्निः (अग्निदेवः) आराधितः (अर्चितः सन्) छायासीतां (मायामयीं तादृशीं मूर्त्तिम्) अजीजनत् (प्रकटितवान्)। दशग्रीवः (दशभिरिन्द्रियैः भोगपरायणः रावणः) तां (प्राकृतां छायासीताम् एव, न तु मूलसीतां, सीतायाः अधोक्षजत्वात्) जहार। सीता (मूलसीता) [तु] वह्निपुरं गता। परीक्षासमये सा छायासीता वहिं विवेश। वह्निः तत्पुरस्तात् सीतां (मूलसीतां) समानीय अनीनयत्। श्लोक-भावानुवाद—जनकनन्दिनी सीताजीके द्वारा प्रार्थना करनेपर अग्निदेवने सीताजीके समान ही एक मायाकी मूर्ति प्रकटित कर दी। दसों इन्द्रियोंके द्वारा जो भोगोंमें ही लगा रहता था, उस दशानन रावणने छाया सीताका ही हरण किया था, मूल सीताका नहीं, क्योंकि सीताजी अधोक्षज हैं अर्थात् प्राकृत इन्द्रियाँ उन्हें देख-स्पर्श नहीं कर सकतीं। मूल सीताजी तो अग्नि लोकमें चली गयीं। परीक्षाके समय वह छाया सीता अग्निमें प्रवेश कर गयी और अग्निदेव मूलसीताको अपने लोकसे अपने साथ ले आये॥ 211-212 ॥ कूर्मपुराणके पन्ने और श्लोक-दर्शनसे विप्रको आनन्द :- पत्र पाञा विप्रेर हैल आनन्दित मन। प्रभुर चरणे धरि' करये क्रन्दन ॥ 213 ॥ अनुवाद—कूर्मपुराणके उन प्राचीन पत्रोंको प्राप्त करके वह ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर रोने लगा॥ 213 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कूर्मपुराण ग्रन्थमें नये पत्रोंको लिखवाकर रामदासको दिखानेके लिये जिन प्राचीन पत्रोंको महाप्रभु लाये थे, उस पत्रोंको पाकर ब्राह्मणका मन बहुत प्रसन्न हुआ॥ 213 ॥ महाप्रभुको 'रघुनाथ' मानना :- विप्र कहे,–“तुमि साक्षात् श्रीरघुनन्दन। संन्यासीर वेषे मोरे दिला दरशन ॥ 214 ॥ ब्राह्मणका दैन्य, महाप्रभुको निमन्त्रण और भिक्षा दान :- महा-दुःख हइते मोरे करिला निस्तार। आजि मोर घरे भिक्षा कर अङ्गीकार ॥ 215 ॥ मनोदुःखे भाल भिक्षा ना दिल सेइ दिने। मोर भाग्ये पुनरपि पाइलुँ दरशने ॥” 216 ॥ एत बलि' सेइ विप्र सुखे पाक कैल। उत्तम प्रकारे प्रभुके भिक्षा कराइल ॥ 217 ॥ अनुवाद—ब्राह्मणने कहा,–“आप तो साक्षात् श्रीरघुनन्दन हैं जो संन्यासीके वेशमें मुझे अपने दर्शन दे रहे हैं। आपने महान् दुःखसे मेरा उद्धार किया है। कृपा करके आज आप मेरे घरपर भिक्षा ग्रहण कीजिये। मनमें दुःख होनेके कारण मैं उस दिन आपको अच्छी तरहसे भोजन नहीं करा सका, परन्तु मेरे सौभाग्यसे आज आप पुनः मेरे घरमें आये हैं।” यह कहकर उस ब्राह्मणने बड़े आनन्दसे भोजन बनाया और उत्तम-उत्तम व्यञ्जनोंके द्वारा महाप्रभुको भोजन कराया ॥ 214-217 ॥ एक रात ब्राह्मणके घरमें वास और ताम्रपर्णीमें स्नान :- सेइ रात्रि ताँहा रहि' ताँरे कृपा करि'। पाण्ड्यदेशे ताम्रपर्णी गेला गौरहरि ॥ 218 ॥ अनुवाद—उस रात महाप्रभु ब्राह्मणके घरमें ही रहे। अगले दिन उसपर कृपा करके श्रीगौरहरि पाण्ड्यदेशमें ताम्रपर्णीके लिये चले गये ॥ 218 ॥ । 371