भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1220

[ 9/218-222 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य- 'पाण्ड्यदेश'-दक्षिण भारतके 'केरल' और 'चोल' राज्यका मध्यवर्ती प्रदेश है। यहाँपर बहुतसे 'पाण्ड्य' उपाधिधारी राजाओंने मदुरा और रामेश्वरपर राज्य किया। रामायण (किष्किन्धाकाण्ड 41/17-18)में- “ताम्रपर्णीं ग्राहजुष्टां तरिष्यथ महानदीम्। स चन्दनवनैश्चित्रैः प्रच्छन्नद्वीपवारिणीम्। युक्तं कपाटं पाण्ड्यानां गता द्रक्ष्यथ वानराः॥” अर्थात् “ताम्रपर्णी नदीके द्वीप और जल विचित्र चन्दनवनोंसे आच्छादित हैं, अतः वह सुन्दर साड़ीसे विभूषित युवती प्रेयसीकी भाँति अपने प्रियतम समुद्रसे मिलती है। वानरों ! वहाँसे आगे बढ़नेपर तुम लोग पाण्ड्यवंशी राजाओंके नगरद्वारपर लगे हुए सुवर्णमय कपाटका दर्शन करोगे, जो मुक्तामणयोंसे विभूषित और दिव्य है।” 'ताम्रपर्णी'-'तिनेभेली' नदीके बाँये तटपर अवस्थित है; इसको 'परुणे' कहते हैं। यह नदी 'पश्चिम घाट'-पर्वतसे बाहर निकलकर बङ्गालकी खाड़ीमें मिलती है। (भाः 11/5/31)-“ताम्रपर्णी-नदी यत्र कृतमाला पयस्विनी।” अर्थात् जहाँ ताम्रपर्णी, कृतमाला और पयस्विनी नदियाँ बहती हैं॥ 218 ॥ नव-तिरुपतिका दर्शन :- ताम्रपर्णी स्नान करि' ताम्रपर्णी-तीरे। नय त्रिपति देखि' बुले कुतूहले ॥ 219 ॥ अनुवाद-ताम्रपर्णी नदीमें स्नान करके महाप्रभुने ताम्रपर्णीके तटपर स्थित नौ विष्णुके मन्दिरोंमें दर्शनके लिये कौतूहलसे वहाँ भ्रमण करने लगे ॥ 219 ॥ अनुभाष्य- 'नय तिरुपति'-'आलोवर तिरुनगरी', यह नगर तिनेभेलीसे सतरह मील दक्षिण-पूर्वमें है; इसके चारों ओर नौ श्रीपति अर्थात् विष्णुके मन्दिर वर्तमान हैं। सभी नौ विग्रह उत्सवके उपलक्षमें इस नगरमें एकत्रित होते हैं॥ 219 ॥ चियड़तलामें श्रीराम-लक्ष्मण और तिलकाञ्चीमें शिवका दर्शन :- चियड़तला तीर्थे देखि' श्रीराम-लक्ष्मण। तिलकाञ्ची आसि' कैल शिव-दरशन ॥ 220 ॥ अनुवाद-वहाँसे चियड़तला तीर्थमें आकर महाप्रभुने श्रीराम-लक्ष्मणके दर्शन किये। और फिर तिलकाञ्चीमें आकर शिवजीके दर्शन किये ॥ 220 ॥ अनुभाष्य- 'चियड़तला'-कोई-कोई इसे 'छेरतला' कहते हैं, यह नगरकैलैरेके निकट है; यहाँ श्रीरामलक्ष्मणका मन्दिर है। 'तिलकाञ्ची'-शिवमन्दिर, सम्भवतः इसे तिनेभेली-नगरसे तीस मील उत्तर-पूर्व दिशामें 'तेन काशी'को लक्ष्य करके कहा गया है॥ 220 ॥ गजेन्द्रमोक्षणमें विष्णु और पानागड़िमें श्रीरामका दर्शन :- गजेन्द्रमोक्षण-तीर्थे देखि' विष्णुमूर्त्ति। पानागड़ि-तीर्थे आसि' देखिल सीतापति ॥ 221 ॥ अनुवाद-उसके बाद महाप्रभु गजेन्द्रमोक्षण-तीर्थमें गये और वहाँ श्रीविष्णुमूर्तिके दर्शन किये। और फिर पानागड़ि-तीर्थमें आकर सीतापति श्रीरामचन्द्रके दर्शन किये ॥ 221 ॥ अनुभाष्य- 'गजेन्द्र-मोक्षण'-भ्रमके कारण कोई-कोई इसको नगरकैलवेरसे दो मील दक्षिणमें स्थित 'स्थानुलिङ्ग' अथवा 'देवेन्द्र-मोक्षणशिव'के नामसे कहते हैं, वास्तवमें ये श्रीविष्णुविग्रह हैं। 'पानागड़ि'-'पानागाड़ि', त्रिवेन्द्रम जाते समय तिनेभेलीसे तीस मील दक्षिणमें, थोड़ेसे पश्चिम कोणमें। पहले यहाँपर श्रीराममूर्ति थी, बादमें शैव लोग उनको 'रामेश्वर' अथवा 'रामलिङ्ग शिव'के रूपमें पूजा करते आ रहे हैं॥ 221 ॥ चाम्तापुरमें श्रीराम-लक्ष्मण, श्रीवैकुण्ठमें विष्णु-दर्शन :- चाम्‍तापुरे आसि' देखि' श्रीराम-लक्ष्मण। श्रीवैकुण्ठे आसि' कैल विष्णु-दरशन ॥ 222 ॥ 372 ।