श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय 9/222–225 ]
अनुवाद—चाम्तापुरमें आकर महाप्रभुने श्रीराम-लक्ष्मणके दर्शन किये। और वहाँसे श्रीवैकुण्ठमें आकर श्रीविष्णुके दर्शन किये॥ 222॥ अनुभाष्य—'चाम्तापुर'—सम्भवतः त्रिवाङ्कुर-राज्यमें स्थित 'चेङ्गानुर' है। यहाँपर श्रीराम-लक्ष्मणका मन्दिर है। 'श्रीवैकुण्ठ'—'श्रीवैकुण्ठम्', आलोयार तिरूनगरीसे चार मील उत्तर एवं तिनेर्भेलीसे सोलह मील दक्षिण-पूर्वमें ताम्रपर्णी नदीके बाँये तटपर अवस्थित है॥ 222॥
कुमारिकामें अगस्त्य-दर्शन :— मलय-पर्वते कैल अगस्त्य-वन्दन। कन्याकुमारी ताँहा कैल दरशन॥ 223॥
अनुवाद—महाप्रभुने मलय पर्वतपर आकर श्रीअगस्त्य मुनिकी वन्दना की। महाप्रभुने फिर कन्याकुमारीका दर्शन किया॥ 223॥ अनुभाष्य—'मलय पर्वत'—दक्षिण भारतमें केरलसे कन्याकुमारी (Cape Comorin) तक फैली हुई पर्वतमाला है। 'अगस्त्य'के सम्बन्धमें चार मत हैं—(1) ताञ्जोर जिलेमें कलिमियार प्वाइंटमें वेदारण्यमके निकट अगस्त्यम्पल्ली-ग्राममें एक अगस्त्य-मुनिका मन्दिर है; (2) मादुरा जिलेमें शिवगिरि पर्वतके शिखरपर अगस्त्य मुनिके द्वारा निर्मित एक सुब्रह्मण्यका (स्कन्दका) मन्दिर है; (3) कोई-कोई कन्याकुमारीके निकटवर्ती पठिया-पर्वतको अगस्त्यका वासस्थान कहते हैं; (4) ताम्रपर्णी नदीके दोनों ओर केलेकी आकृतिवाली चोटी 'अगस्त्यमलय'के नामसे जानी जाती है। 'कन्याकुमारी'—कुमारिका-अन्तरीप॥ 223॥
आम्लितलामें श्रीराम-दर्शन :— आम्लितलाय देखि' श्रीराम गौरहरि। मल्लार-देशेते आइला यथा भट्टथारि॥ 224॥
अनुवाद—तब श्रीगौरहरिने आम्लितलामें श्रीरामचन्द्रके दर्शन किये। वहाँसे वे मल्लारदेशमें आये, जहाँ 'भट्टथारि' लोग वास करते थे॥ 224॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'भट्टथारि'—जिनको चलती भाषामें किसी-किसी स्थानपर 'भाटओयारी' कहते हैं; इनका अपना कोई घर-द्वार नहीं होता। जब जहाँ भी रहते हैं, वे वहाँ तम्बुओंमें रहते हैं। इनका बाहरसे तो संन्यासी वेश होता है, किन्तु इनका व्यवसाय चोरी करना और दूसरोंको ठगना है। ये बहुतसी स्त्रियोंको ठगकर लाते हैं और उन्हें अपने शिविरमें रखते हैं। फिर दूसरे लोगोंको स्त्रियाँ दिखलाकर उन्हें भ्रमित करके अपने दलको बढ़ाते हैं। बङ्गालमें जैसे वेदोंकी पाठशालाएँ हैं, पश्चिम और दक्षिण भारतमें उस प्रकार भाटओयारियोंकी 'शिरकि' हैं॥ 224॥ अनुभाष्य—'मल्लारदेश'—म्यालेबार-देश। इसके उत्तरमें दक्षिण-कानाड़ा (कर्नाटक), पूर्वमें कूर्ग और महीशूर, दक्षिणमें कोचीन एवं पश्चिममें अरब-सागर है॥ 224॥
मालावरादेशमें तमाल-कार्तिक और वेतापनिमें रामके दर्शनकर एक रात वास :— तमाल-कार्तिक देखि' आइल वेतापनि। रघुनाथ देखि' ताँहा वञ्चिला रजनी॥ 225॥
अनुवाद—तमाल-कार्तिकका दर्शन करके महाप्रभु वेतापनि आये और श्रीरघुनाथके दर्शन करके वहीं रात बितायी॥ 225॥ अनुभाष्य—'तमाल कार्तिक'—तिनेभेलीसे चव्वालीस मील दक्षिणमें और 'अमरवल्ली' पर्वतके बीच सङ्कुचित स्थानसे दो मील दक्षिणमें, तोवल-तालुकाके अन्तर्गत सुब्रह्मण्य या कार्तिकदेवका मन्दिर है। 'वेतापनि'—'भूतपण्डि'। यह त्रिवाङ्कुर राज्यमें, नगर-कैलके उत्तरमें, तोबल-तालुकाके बीचमें है। पहले श्रीमन्दिरमें श्रीरामचन्द्रके विग्रह थे। लगता है, वही बादमें रामेश्वर अथवा भूतनाथ शिवलिङ्गके नामसे पूजित हो रहे हैं॥ 225॥
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