श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
नौवाँ अध्याय 9/211-218 ] परीक्षा-समये वहिं छाया-सीता विवेश सा। वह्निः सीतां समानीय तत्पुरस्तादनीनयत् ॥ 212 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 211-212 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सीताजीके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर अग्निदेवने 'छायासीता' प्रस्तुत की। दसमूख रावणने उन्हीं छायासीताका हरण किया था, मूल-सीताजी अग्निलोकमें ही रहीं। श्रीरामचन्द्रने जब परीक्षा की, तब छायासीताने अग्निमें प्रवेश किया, अग्निदेवने मूल सीताजीको लाकर उन्हें श्रीरामचन्द्रके निकट उपस्थित किया॥ 211-212 ॥ अनुभाष्य— सीतया (जनकनन्दिन्या) वह्निः (अग्निदेवः) आराधितः (अर्चितः सन्) छायासीतां (मायामयीं तादृशीं मूर्त्तिम्) अजीजनत् (प्रकटितवान्)। दशग्रीवः (दशभिरिन्द्रियैः भोगपरायणः रावणः) तां (प्राकृतां छायासीताम् एव, न तु मूलसीतां, सीतायाः अधोक्षजत्वात्) जहार। सीता (मूलसीता) [तु] वह्निपुरं गता। परीक्षासमये सा छायासीता वहिं विवेश। वह्निः तत्पुरस्तात् सीतां (मूलसीतां) समानीय अनीनयत्। श्लोक-भावानुवाद—जनकनन्दिनी सीताजीके द्वारा प्रार्थना करनेपर अग्निदेवने सीताजीके समान ही एक मायाकी मूर्ति प्रकटित कर दी। दसों इन्द्रियोंके द्वारा जो भोगोंमें ही लगा रहता था, उस दशानन रावणने छाया सीताका ही हरण किया था, मूल सीताका नहीं, क्योंकि सीताजी अधोक्षज हैं अर्थात् प्राकृत इन्द्रियाँ उन्हें देख-स्पर्श नहीं कर सकतीं। मूल सीताजी तो अग्नि लोकमें चली गयीं। परीक्षाके समय वह छाया सीता अग्निमें प्रवेश कर गयी और अग्निदेव मूलसीताको अपने लोकसे अपने साथ ले आये॥ 211-212 ॥ कूर्मपुराणके पन्ने और श्लोक-दर्शनसे विप्रको आनन्द :- पत्र पाञा विप्रेर हैल आनन्दित मन। प्रभुर चरणे धरि' करये क्रन्दन ॥ 213 ॥ अनुवाद—कूर्मपुराणके उन प्राचीन पत्रोंको प्राप्त करके वह ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर रोने लगा॥ 213 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कूर्मपुराण ग्रन्थमें नये पत्रोंको लिखवाकर रामदासको दिखानेके लिये जिन प्राचीन पत्रोंको महाप्रभु लाये थे, उस पत्रोंको पाकर ब्राह्मणका मन बहुत प्रसन्न हुआ॥ 213 ॥ महाप्रभुको 'रघुनाथ' मानना :- विप्र कहे,–“तुमि साक्षात् श्रीरघुनन्दन। संन्यासीर वेषे मोरे दिला दरशन ॥ 214 ॥ ब्राह्मणका दैन्य, महाप्रभुको निमन्त्रण और भिक्षा दान :- महा-दुःख हइते मोरे करिला निस्तार। आजि मोर घरे भिक्षा कर अङ्गीकार ॥ 215 ॥ मनोदुःखे भाल भिक्षा ना दिल सेइ दिने। मोर भाग्ये पुनरपि पाइलुँ दरशने ॥” 216 ॥ एत बलि' सेइ विप्र सुखे पाक कैल। उत्तम प्रकारे प्रभुके भिक्षा कराइल ॥ 217 ॥ अनुवाद—ब्राह्मणने कहा,–“आप तो साक्षात् श्रीरघुनन्दन हैं जो संन्यासीके वेशमें मुझे अपने दर्शन दे रहे हैं। आपने महान् दुःखसे मेरा उद्धार किया है। कृपा करके आज आप मेरे घरपर भिक्षा ग्रहण कीजिये। मनमें दुःख होनेके कारण मैं उस दिन आपको अच्छी तरहसे भोजन नहीं करा सका, परन्तु मेरे सौभाग्यसे आज आप पुनः मेरे घरमें आये हैं।” यह कहकर उस ब्राह्मणने बड़े आनन्दसे भोजन बनाया और उत्तम-उत्तम व्यञ्जनोंके द्वारा महाप्रभुको भोजन कराया ॥ 214-217 ॥ एक रात ब्राह्मणके घरमें वास और ताम्रपर्णीमें स्नान :- सेइ रात्रि ताँहा रहि' ताँरे कृपा करि'। पाण्ड्यदेशे ताम्रपर्णी गेला गौरहरि ॥ 218 ॥ अनुवाद—उस रात महाप्रभु ब्राह्मणके घरमें ही रहे। अगले दिन उसपर कृपा करके श्रीगौरहरि पाण्ड्यदेशमें ताम्रपर्णीके लिये चले गये ॥ 218 ॥ । 371
[ 9/218-222 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य- 'पाण्ड्यदेश'-दक्षिण भारतके 'केरल' और 'चोल' राज्यका मध्यवर्ती प्रदेश है। यहाँपर बहुतसे 'पाण्ड्य' उपाधिधारी राजाओंने मदुरा और रामेश्वरपर राज्य किया। रामायण (किष्किन्धाकाण्ड 41/17-18)में- “ताम्रपर्णीं ग्राहजुष्टां तरिष्यथ महानदीम्। स चन्दनवनैश्चित्रैः प्रच्छन्नद्वीपवारिणीम्। युक्तं कपाटं पाण्ड्यानां गता द्रक्ष्यथ वानराः॥” अर्थात् “ताम्रपर्णी नदीके द्वीप और जल विचित्र चन्दनवनोंसे आच्छादित हैं, अतः वह सुन्दर साड़ीसे विभूषित युवती प्रेयसीकी भाँति अपने प्रियतम समुद्रसे मिलती है। वानरों ! वहाँसे आगे बढ़नेपर तुम लोग पाण्ड्यवंशी राजाओंके नगरद्वारपर लगे हुए सुवर्णमय कपाटका दर्शन करोगे, जो मुक्तामणयोंसे विभूषित और दिव्य है।” 'ताम्रपर्णी'-'तिनेभेली' नदीके बाँये तटपर अवस्थित है; इसको 'परुणे' कहते हैं। यह नदी 'पश्चिम घाट'-पर्वतसे बाहर निकलकर बङ्गालकी खाड़ीमें मिलती है। (भाः 11/5/31)-“ताम्रपर्णी-नदी यत्र कृतमाला पयस्विनी।” अर्थात् जहाँ ताम्रपर्णी, कृतमाला और पयस्विनी नदियाँ बहती हैं॥ 218 ॥ नव-तिरुपतिका दर्शन :- ताम्रपर्णी स्नान करि' ताम्रपर्णी-तीरे। नय त्रिपति देखि' बुले कुतूहले ॥ 219 ॥ अनुवाद-ताम्रपर्णी नदीमें स्नान करके महाप्रभुने ताम्रपर्णीके तटपर स्थित नौ विष्णुके मन्दिरोंमें दर्शनके लिये कौतूहलसे वहाँ भ्रमण करने लगे ॥ 219 ॥ अनुभाष्य- 'नय तिरुपति'-'आलोवर तिरुनगरी', यह नगर तिनेभेलीसे सतरह मील दक्षिण-पूर्वमें है; इसके चारों ओर नौ श्रीपति अर्थात् विष्णुके मन्दिर वर्तमान हैं। सभी नौ विग्रह उत्सवके उपलक्षमें इस नगरमें एकत्रित होते हैं॥ 219 ॥ चियड़तलामें श्रीराम-लक्ष्मण और तिलकाञ्चीमें शिवका दर्शन :- चियड़तला तीर्थे देखि' श्रीराम-लक्ष्मण। तिलकाञ्ची आसि' कैल शिव-दरशन ॥ 220 ॥ अनुवाद-वहाँसे चियड़तला तीर्थमें आकर महाप्रभुने श्रीराम-लक्ष्मणके दर्शन किये। और फिर तिलकाञ्चीमें आकर शिवजीके दर्शन किये ॥ 220 ॥ अनुभाष्य- 'चियड़तला'-कोई-कोई इसे 'छेरतला' कहते हैं, यह नगरकैलैरेके निकट है; यहाँ श्रीरामलक्ष्मणका मन्दिर है। 'तिलकाञ्ची'-शिवमन्दिर, सम्भवतः इसे तिनेभेली-नगरसे तीस मील उत्तर-पूर्व दिशामें 'तेन काशी'को लक्ष्य करके कहा गया है॥ 220 ॥ गजेन्द्रमोक्षणमें विष्णु और पानागड़िमें श्रीरामका दर्शन :- गजेन्द्रमोक्षण-तीर्थे देखि' विष्णुमूर्त्ति। पानागड़ि-तीर्थे आसि' देखिल सीतापति ॥ 221 ॥ अनुवाद-उसके बाद महाप्रभु गजेन्द्रमोक्षण-तीर्थमें गये और वहाँ श्रीविष्णुमूर्तिके दर्शन किये। और फिर पानागड़ि-तीर्थमें आकर सीतापति श्रीरामचन्द्रके दर्शन किये ॥ 221 ॥ अनुभाष्य- 'गजेन्द्र-मोक्षण'-भ्रमके कारण कोई-कोई इसको नगरकैलवेरसे दो मील दक्षिणमें स्थित 'स्थानुलिङ्ग' अथवा 'देवेन्द्र-मोक्षणशिव'के नामसे कहते हैं, वास्तवमें ये श्रीविष्णुविग्रह हैं। 'पानागड़ि'-'पानागाड़ि', त्रिवेन्द्रम जाते समय तिनेभेलीसे तीस मील दक्षिणमें, थोड़ेसे पश्चिम कोणमें। पहले यहाँपर श्रीराममूर्ति थी, बादमें शैव लोग उनको 'रामेश्वर' अथवा 'रामलिङ्ग शिव'के रूपमें पूजा करते आ रहे हैं॥ 221 ॥ चाम्तापुरमें श्रीराम-लक्ष्मण, श्रीवैकुण्ठमें विष्णु-दर्शन :- चाम्तापुरे आसि' देखि' श्रीराम-लक्ष्मण। श्रीवैकुण्ठे आसि' कैल विष्णु-दरशन ॥ 222 ॥ 372 ।
नौवाँ अध्याय 9/222–225 ]
अनुवाद—चाम्तापुरमें आकर महाप्रभुने श्रीराम-लक्ष्मणके दर्शन किये। और वहाँसे श्रीवैकुण्ठमें आकर श्रीविष्णुके दर्शन किये॥ 222॥ अनुभाष्य—'चाम्तापुर'—सम्भवतः त्रिवाङ्कुर-राज्यमें स्थित 'चेङ्गानुर' है। यहाँपर श्रीराम-लक्ष्मणका मन्दिर है। 'श्रीवैकुण्ठ'—'श्रीवैकुण्ठम्', आलोयार तिरूनगरीसे चार मील उत्तर एवं तिनेर्भेलीसे सोलह मील दक्षिण-पूर्वमें ताम्रपर्णी नदीके बाँये तटपर अवस्थित है॥ 222॥
कुमारिकामें अगस्त्य-दर्शन :— मलय-पर्वते कैल अगस्त्य-वन्दन। कन्याकुमारी ताँहा कैल दरशन॥ 223॥
अनुवाद—महाप्रभुने मलय पर्वतपर आकर श्रीअगस्त्य मुनिकी वन्दना की। महाप्रभुने फिर कन्याकुमारीका दर्शन किया॥ 223॥ अनुभाष्य—'मलय पर्वत'—दक्षिण भारतमें केरलसे कन्याकुमारी (Cape Comorin) तक फैली हुई पर्वतमाला है। 'अगस्त्य'के सम्बन्धमें चार मत हैं—(1) ताञ्जोर जिलेमें कलिमियार प्वाइंटमें वेदारण्यमके निकट अगस्त्यम्पल्ली-ग्राममें एक अगस्त्य-मुनिका मन्दिर है; (2) मादुरा जिलेमें शिवगिरि पर्वतके शिखरपर अगस्त्य मुनिके द्वारा निर्मित एक सुब्रह्मण्यका (स्कन्दका) मन्दिर है; (3) कोई-कोई कन्याकुमारीके निकटवर्ती पठिया-पर्वतको अगस्त्यका वासस्थान कहते हैं; (4) ताम्रपर्णी नदीके दोनों ओर केलेकी आकृतिवाली चोटी 'अगस्त्यमलय'के नामसे जानी जाती है। 'कन्याकुमारी'—कुमारिका-अन्तरीप॥ 223॥
आम्लितलामें श्रीराम-दर्शन :— आम्लितलाय देखि' श्रीराम गौरहरि। मल्लार-देशेते आइला यथा भट्टथारि॥ 224॥
अनुवाद—तब श्रीगौरहरिने आम्लितलामें श्रीरामचन्द्रके दर्शन किये। वहाँसे वे मल्लारदेशमें आये, जहाँ 'भट्टथारि' लोग वास करते थे॥ 224॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'भट्टथारि'—जिनको चलती भाषामें किसी-किसी स्थानपर 'भाटओयारी' कहते हैं; इनका अपना कोई घर-द्वार नहीं होता। जब जहाँ भी रहते हैं, वे वहाँ तम्बुओंमें रहते हैं। इनका बाहरसे तो संन्यासी वेश होता है, किन्तु इनका व्यवसाय चोरी करना और दूसरोंको ठगना है। ये बहुतसी स्त्रियोंको ठगकर लाते हैं और उन्हें अपने शिविरमें रखते हैं। फिर दूसरे लोगोंको स्त्रियाँ दिखलाकर उन्हें भ्रमित करके अपने दलको बढ़ाते हैं। बङ्गालमें जैसे वेदोंकी पाठशालाएँ हैं, पश्चिम और दक्षिण भारतमें उस प्रकार भाटओयारियोंकी 'शिरकि' हैं॥ 224॥ अनुभाष्य—'मल्लारदेश'—म्यालेबार-देश। इसके उत्तरमें दक्षिण-कानाड़ा (कर्नाटक), पूर्वमें कूर्ग और महीशूर, दक्षिणमें कोचीन एवं पश्चिममें अरब-सागर है॥ 224॥
मालावरादेशमें तमाल-कार्तिक और वेतापनिमें रामके दर्शनकर एक रात वास :— तमाल-कार्तिक देखि' आइल वेतापनि। रघुनाथ देखि' ताँहा वञ्चिला रजनी॥ 225॥
अनुवाद—तमाल-कार्तिकका दर्शन करके महाप्रभु वेतापनि आये और श्रीरघुनाथके दर्शन करके वहीं रात बितायी॥ 225॥ अनुभाष्य—'तमाल कार्तिक'—तिनेभेलीसे चव्वालीस मील दक्षिणमें और 'अमरवल्ली' पर्वतके बीच सङ्कुचित स्थानसे दो मील दक्षिणमें, तोवल-तालुकाके अन्तर्गत सुब्रह्मण्य या कार्तिकदेवका मन्दिर है। 'वेतापनि'—'भूतपण्डि'। यह त्रिवाङ्कुर राज्यमें, नगर-कैलके उत्तरमें, तोबल-तालुकाके बीचमें है। पहले श्रीमन्दिरमें श्रीरामचन्द्रके विग्रह थे। लगता है, वही बादमें रामेश्वर अथवा भूतनाथ शिवलिङ्गके नामसे पूजित हो रहे हैं॥ 225॥
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[ 9/226-236 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भट्टथारिके चङ्गुलमें महाप्रभुके सङ्गी कृष्णदास ब्राह्मण :- गोसाञिर सङ्गे रहे कृष्णदास ब्राह्मण। भट्टथारि-सह ताँहा हैल दरशन ॥ 226 ॥ स्त्रीधन देखाञा तारे लोभ जन्माइल। आर्य सरल विप्रेर बुद्धिनाश कैल ॥ 227 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके साथ उनका सेवक कृष्णदास आया था। वह ब्राह्मण था, परन्तु भट्टथारियोंके साथ उसकी भेंट हो गयी। भट्टथारियोंने उसे स्त्रियाँ दिखलाकर उसमें लोभ उत्पन्न कर दिया, जिसने उस सरल पवित्र ब्राह्मणकी बुद्धि नष्ट कर दी ॥ 226-227 ॥ अनुभाष्य- 'भट्टथारि'-मध्यलीला 1/112 संख्या देखें ॥ 226 ॥ कृष्णदासको ढूँढ़ते हुए भट्टथारिके शिविरमें महाप्रभुका आगमन :- प्राते उठि' आइला विप्र भट्टथारि-घरे। ताहार उद्देशे प्रभु आइला सत्वरे ॥ 228 ॥ अनुवाद-प्रातःकालमें उठते ही कृष्णदास ब्राह्मण स्त्री लोभसे महाप्रभुको छोड़कर भट्टथारियोंके शिविरमें आ गया। और महाप्रभु उसे ढूँढ़ते हुए शीघ्रतासे वहाँ आ पहुँचे ॥ 228 ॥ भट्टथारियोंसे महाप्रभुके द्वारा कृष्णदासकी याचना :- आसिया कहेन सब भट्टथारिगणे। “आमार ब्राह्मण तुमि राख कि कारणे ॥ 229 ॥ आमिह संन्यासी देख, तुमिह संन्यासी। मोरे दुःख देह, -तोमार 'न्याय' नाहि वासि ॥" 230 ॥ अनुवाद-आकर महाप्रभुने भट्टथारियोंसे कहा,-"मेरे साथी ब्राह्मणको तुमने अपने पास किसलिये रख लिया है? मैं संन्यासी हूँ और आप भी संन्यासी हो, परन्तु आप मुझे जानबूझकर दुःख दे रहे हो, इसका कोई न्यायसङ्गत कारण मुझे दिखलायी नहीं देता ॥ " 229-230 ॥ भट्टथारियोंके द्वारा महाप्रभुपर आक्रमण, किन्तु महाप्रभुके अचिन्त्य-शक्तिबलसे वे ही आक्रान्त हुए :- शुनि' सब भट्टथारि उठे अस्त्र लञा। मारिबारे आइल सबे चारिदिके धाञा ॥ 231 ॥ तार अस्त्र तार अङ्गे पड़े हात हैते। खण्ड खण्ड हैल भट्टथारि पलाय चारिभिते ॥ 232 ॥ महाप्रभुके द्वारा कृष्णदास ब्राह्मणका उद्धार :- भट्टथारि-घरे ताँहा उठिल क्रन्दन। केशे धरि' विप्रे लञा करिल गमन ॥ 233 ॥ अनुवाद-यह सुनकर सभी भट्टथारि अपने अस्त्र लेकर उठ खड़े हुए और महाप्रभुको मारनेके लिये सब चारों ओरसे दौड़कर आये। परन्तु उनके अस्त्र उनके हाथोंसे छूटकर उनके ही अङ्गोंपर आघात करने लगे। जब कुछ भट्टथारियोंके शरीर खण्ड-खण्ड हो गये, तब बचे हुए भट्टथारि चारों दिशाओंमें भागने लगे। भट्टथारियोंके शिविरमें उनके सम्बन्धी जोर-जोरसे रोने लगे और महाप्रभु कृष्णदास ब्राह्मणको केशोंसे पकड़कर वहाँसे लेकर चल दिये ॥ 231-233 ॥ आदिकेशव-मन्दिरमें विष्णु-दर्शनसे महाप्रभुका नृत्य-गीत और उनके दर्शनसे सभीका आश्चर्यचकित होना :- सेइ दिन चलि' आइला पयस्विनी-तीरे। स्नान करि' गेला आदिकेशव-मन्दिरे ॥ 234 ॥ केशव देखिया प्रेमे आविष्ट हैला। नति, स्तुति, नृत्य, गीत, बहुत करिला ॥ 235 ॥ प्रेम देखि' लोके हैल महा-चमत्कार। सर्वलोक कैल प्रभुर परम सत्कार ॥ 236 ॥ अनुवाद-उस दिन चलकर महाप्रभु पयस्विनी नदीके तटपर पहुँचे। वहाँ स्नान करके वे आदिकेशवके मन्दिरमें गये। आदिकेशवके दर्शन करके महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये और उनको प्रणाम करके उनकी 374 ।
नौवाँ अध्याय [ 9/234-242 ] स्तव-स्तुति की। तब बहुत देर तक महाप्रभुने नृत्य-गान किया। महाप्रभुके प्रेमको देखकर लोगोंको बहुत आश्चर्य हुआ और सभी लोगोंने महाप्रभुका परम सत्कार किया ॥ 234-236 ॥ शुद्धभक्त-सङ्गसे ब्रह्मसंहिताके पाँचवें अध्यायकी प्राप्ति :- महाभक्तगणसह ताँहा गोष्ठी कैल। 'ब्रह्मसंहिताध्याय'-पुँथि ताँहा पाइल ॥ 237 ॥ अनुवाद-आदिकेशव मन्दिरमें महाप्रभुने वहाँ एकत्रित महान्-भक्तोंके साथ इष्टगोष्ठी की। वहाँ उन्हें 'ब्रह्मसंहिता' ग्रन्थके एक अध्यायकी (पाँचवें अध्यायकी) एक पोथी प्राप्त हुई ॥ 237 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'ब्रह्मसंहिताध्याय'-ब्रह्मसंहिताका पाँचवाँ अध्याय, जो अब बङ्गालमें श्रीजीवगोस्वामीकी टीकाके साथ मिलता है ॥ 237 ॥ ग्रन्थ-दर्शनसे महाप्रभुको आनन्द :- पुँथि पाञा प्रभुर हैल आनन्द अपार। कम्पाश्रु-पुलक-स्वेद-स्तम्भ विकार ॥ 238 ॥ अनुवाद-इस पोथीको प्राप्त करके महाप्रभुको अपार प्रसन्नता हुई और कम्प, अश्रु, पुलक, स्वेद और स्तम्भादि अष्ट-सात्त्विक विकार उनकी देहमें प्रकाशित हो आये ॥ 238 ॥ ब्रह्मसंहिताका माहात्म्य :- सिद्धान्त-शास्त्र नाहि 'ब्रह्मसंहिता'र सम। गोविन्दमहिमा-तत्त्व परम कारण ॥ 239 ॥ अल्पाक्षरे कहे सिद्धान्त अपार। सकल-वैष्णवशास्त्र-मध्ये अति सार ॥ 240 ॥ अनुवाद-ब्रह्मसंहिताके समान और कोई भी सिद्धान्त-शास्त्र नहीं है। यह ग्रन्थ श्रीगोविन्दकी महिमाको सर्वाधिक प्रकाशित करनेवाला है, क्योंकि इसमें उनका सर्वोत्तम तत्त्व प्रकाशित हुआ है। समस्त सिद्धान्त इस ग्रन्थमें संक्षेपमें वर्णन किये गये हैं। यह ग्रन्थ सभी वैष्णव-शास्त्रोंका परमसार स्वरूप है ॥ 239-240 ॥ अनुभाष्य- 'ब्रह्मसंहिताध्याय'-'ब्रह्मसंहिता'-ग्रन्थका पाँचवाँ अध्याय। इसमें अचिन्त्यभेदाभेदस्थिति, अभ्यास, अष्टादशाक्षर मन्त्र, आत्मा, आत्माराम, कर्म, कामगायत्री, कामबीज, कारणब्धिशायी, कृष्णधामका चिद्-विशेष, गणेश, गर्भोदकशायी, गायत्री-उत्पत्ति, गोकुल, 'गोविन्द-रूप, स्वरूप-तत्त्व और धाम', जीवतत्त्व, जीवका प्राप्य स्वरूप, दुर्गा, तप, पञ्चभूत, प्रेम, ब्रह्म, ब्रह्माजीकी दीक्षा, भक्तिनेत्र, भक्तिके सोपान (सीढ़ियाँ), मन, महाविष्णु, योगनिद्रा, रमा, रागमार्गीय भक्ति, श्रीरामादि अवतार, लिङ्गादि शब्दका तात्पर्य, बद्धजीव, उसका साधन, विष्णुतत्त्व, वेदसार-स्तव, शम्भु, श्रुत, स्वकीय, परकीय, सदाचार, सूर्य और हैमाण्ड आदि विषय वर्णित हुए हैं ॥ 237-240 ॥ श्रीअनन्त पद्मनाभ-दर्शन :- बहु यत्ने सेइ पुँथि लइला लिखिया। 'अनन्त-पद्मनाभ' आइला हरषित हञा ॥ 241 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने बड़े यत्नसे ब्रह्म-संहिता ग्रन्थ लेकर उसकी नकल करवाकर अपने पास रख ली। फिर महाप्रभु हर्षित होकर 'अनन्त-पद्मनाभ' आये ॥ 241 ॥ अनुभाष्य- 'अनन्त-पद्मनाभ'-मध्यलीला 1/115 संख्या देखें ॥ 241 ॥ दो दिन वहाँ वास और बादमें श्रीजनार्दनका दर्शन :- दिन-दुइ पद्मनाभेर कैल दरशन। आनन्दे देखिते आइला श्रीजनार्दन ॥ 242 ॥ अनुवाद-दो दिन तक वहाँ रहकर महाप्रभुने भगवान् पद्मनाभके दर्शन किये और फिर आनन्दपूर्वक श्रीजनार्दनके दर्शनके लिये आये ॥ 242 ॥ अनुभाष्य- 'श्रीजनार्दन'-त्रिवेन्द्रमके छब्बीस मील उत्तरमें वर्काला-रेलवे स्टेशनके निकट विराजमान हैं ॥ 242 ॥ । 375
[ 9/243-244 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पयस्विनीके तटपर शङ्कर नारायण-दर्शनः- दिन दुइ ताँहा करि' कीर्त्तन-नर्त्तन। पयस्विनी आसिया देखे शङ्कर नारायण ॥ 243 ॥ अनुवाद-दो दिन तक वहाँ रहकर महाप्रभुने नृत्य-कीर्तन किया और वहाँसे पयस्विनी नदीके तटपर आकर शङ्कर नारायणके दर्शन किये ॥ 243 ॥ शृङ्गेरि-मठमें आगमन और बादमें मत्स्यतीर्थ दर्शन :- शृङ्गेरि-मठे आइला शङ्कराचार्य-स्थाने। मत्स्य-तीर्थ देखि' कैल तुङ्गभद्राय स्नाने ॥ 244 ॥ अनुवाद-उसके बाद महाप्रभु शङ्कराचार्यके स्थान शृङ्गेरि-मठमें आये। फिर मत्स्यतीर्थका दर्शन करके उन्होंने तुङ्गभद्रा नदीमें स्नान किया ॥ 244 ॥ अनुभाष्य- 'शृङ्गेरि-मठ'-महीशूरके अन्तर्गत शिमोगा जिलेमें शृङ्गेरि-मठ है। यह स्थान तुङ्गभद्रा नदीके बाँये तटपर और हरिहरपुरके सात मील दक्षिणमें अवस्थित है। इसका वास्तविक नाम- (ऋष्य) शृङ्गगिरि अथवा शृङ्गवेर पुरी है। इस स्थानपर दक्षिण भारतमें स्थित शङ्कराचार्यका प्रधान मठ है। श्रीशङ्कराचार्यने अपने चार शिष्योंके द्वारा भारतके (1) उत्तरमें-बदरिकामें ज्योतिर्मठ; (2) पूर्वमें-पुरुषोत्तममें भोगवर्द्धन अथवा गोवर्धन मठ; (3) पश्चिममें-द्वारकामें शारदा मठ और (4) दक्षिणमें-'शृङ्गेरि' मठ स्थापित किये। शृङ्गेरि मठमें 'सरस्वती', 'भारती', 'पुरी'-इन तीन प्रकारका एक-दण्ड संन्यास ग्रहण करते हैं। “चतुर्थो दक्षिणाम्नायः शृङ्गेर्यां वर्त्तते मठः। सम्प्रदायो भूरिवारः भूर्भुवः गोत्र उच्यते ॥ पदानि त्रीणि ख्यातानि सरस्वती भारती पुरी। वराहो देवता यत्र क्षेत्रं रामेश्वरं वदेत् ॥ तीर्थञ्च तुङ्गाभद्राख्यं शक्तिः कामाक्षिका स्मृता। चैतन्य-ब्रह्मचारीति हस्तामलकदेशिकः ॥ आन्ध्र-द्राविड़-कर्णाट-केरलादि-प्रभेदतः। शृङ्गेर्यधीना देशास्ते ह्यावाचीदिगवस्थिताः ॥ स्वरज्ञानरतो नित्यं स्वरवादी कवीश्वरः। संसार-सागरासार-हन्तासौ हि 'सरस्वती' ॥ विद्याभारेण सम्पूर्णः सर्वभावं परित्यजन्। दुःखभारं न जानाति 'भारती' परिकीर्त्यते ॥ ज्ञानतत्त्वेन सम्पूर्णः पूर्णतत्त्वपदे स्थितः। परब्रह्मरतो नित्यं 'पुरी'नामा स उच्यते ॥” (मठाम्नाय) अर्थात् मठका नाम-शृङ्गेरि, दिशा-दक्षिण; देश-आन्ध्र, द्रविड़, कर्णाटक और केरलादि; सम्प्रदाय-भूरिवार, गोत्र-भूर्भुवः, क्षेत्र-रामेश्वर; महावाक्य अथवा बोध-'अहं ब्रह्मास्मि'; देव-वराह; शक्ति-कामाक्षी; आचार्य-हस्तामलक; संन्यास-पदवी-'सरस्वती', 'भारती', और 'पुरी'; ब्रह्मचारी-चैतन्य; तीर्थ-तुङ्गभद्रा; वेद-यजुः। शृङ्गेरि मठके गुरु और संन्यास ग्रहण-काल-परम्परा जैसे-
- शङ्कराचार्य-22 शक।
- सुरेश्वराचार्य-30 शक।
- बोधनाचार्य-680 शक।
- ज्ञानधनाचार्य-768 शक।
- ज्ञानोत्तम शिवाचार्य-827 शक।
- ज्ञानगिरि आचार्य-871 शक।
- सिंहगिरि आचार्य-958 शक।
- ईश्वर तीर्थ-1019 शक।
- नारसिंह तीर्थ-1067 शक।
- विद्यातीर्थ विद्याशङ्कर-1150 शक।
- भारतीकृष्ण तीर्थ-1250 शक।
- विद्यारण्य भारती-1253 शक।
- चन्द्रशेखर भारती-1290 शक।
- नरसिंह भारती-1309 शक।
- पुरुषोत्तम भारती-1328 शक।
- शङ्करानन्द-1350 शक।
- चन्द्रशेखर भारती-1371 शक।
- नरसिंह भारती-1386 शक।
- पुरुषोत्तम भारती-1394 शक।
- रामचन्द्र भारती-1430 शक।
- नरसिंह भारती-1479 शक।
- नरसिंह भारती-1485 शक।
- धनमड़ि नरसिंह भारती-1498 शक। 376 ।
नौवाँ अध्याय 9/244-245 ] 24) अभिनव नरसिंह भारती-1521 शक। 25) सच्चिदानन्द भारती-1544 शक। 26) नरसिंह भारती-1585 शक। 27) सच्चिदानन्द भारती-1627 शक। 28) अभिनव सच्चिदानन्द भारती-1663 शक। 29) नृसिंह भारती-1689 शक। 30) सच्चिदानन्द भरती-1692 शक। 31) अभिनव सच्चिदानन्द भारती-1730 शक, 32) नरसिंह भारती-1739 शक, इनकी समाधिके विषयमें जाननेके लिये 'वैष्णव-मञ्जूषा-समाहृति' (चतुर्थ संख्या) देखें। 33) सच्चिदानन्द शिवाभिनव विद्या नरसिंह भारती-1788 शक। 'शङ्कराचार्य'–इन्होंने दक्षिण भारतके केरल-देशके अन्तर्गत 'कालाडि' नामक ग्राममें 608 शकमें वैशाखी शुक्ला-तृतीयाके दिवसमें जन्म ग्रहण किया। इनके पिताके नाम 'शिवगुरु' था। बचपनमें ही इनके पिता परलोक सिधार गये। आठ वर्षकी आयुके पार होते-न-होते ही इन्होंने शास्त्र-अध्ययन समाप्त करके नर्मदाके तटपर 'गोविन्द'से संन्यास ग्रहण किया। संन्यास ग्रहण करनेके बाद कुछ दिनों तक वे गोविन्दके पास रहे। तब उनकी अनुमतिसे वाराणसी गये और वहाँसे बदरिकाश्रममें जाकर बारह वर्षकी आयुमें ब्रह्मसूत्रके एक भाष्यका प्रणयन किया। बादमें दस उपनिषदों, गीता, सनत्सुजातीय और नृसिंह-तापनी आदि ग्रन्थोंके भाष्यकी भी रचनाकी। शङ्कराचार्यके शिष्योंमेंसे 'पद्मनाभ', 'सुरेश्वर', 'हस्तामलक' और 'त्रोटक'-ये चार व्यक्ति प्रधान है। शङ्कराचार्यने वाराणसीसे होकर प्रयागमें आकर कुमारिल भट्टके साथ भेंट की। कुमारिल मरणासन्न थे, इसलिये उस समय उन्होंने उनके साथ स्वयं विचार (शास्त्रार्थ) न करके अपने प्रधान शिष्य 'मण्डन'के पास माहिष्मती-नगरमें भेज दिया। वहाँ शङ्कराचार्यने मण्डनको विचारमें पराजित कर दिया। मण्डनकी सहधर्मिणी (पत्नी) 'सरस्वती' अथवा 'उभयभारती' उनके विचारके समय मध्यस्था थी; ऐसा कहा जाता है कि उसने शङ्कराचार्यके साथ कामशास्त्रके विषयमें विचार करनेकी इच्छा प्रकाशित की। शङ्कर नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे, अतएव कामशास्त्रके विषयमें कुछ नहीं जानते थे। उन्होंने 'उभयभारती'से एक महीनेका समय माँगकर योगबलसे एक क्षणभर पहले मरे हुए एक राजाके शरीरमें प्रवेश किया। इस प्रकार उन्होंने कामशास्त्रका अनुभव प्राप्त किया। ज्ञान अर्जन करके 'उभयभारती'से विचार-विमर्श करनेकी प्रार्थना की, परन्तु उन्होंने विचार ना करके शङ्करकी प्रार्थनाके अनुसार उनके शृङ्गेरि मठमें वे अचला रहेंगी अर्थात् सदा वहाँ वास करेंगी, यह वर देकर संसारसे विदा हो गयीं। मण्डनने शङ्कराचार्यसे संन्यास ग्रहण किया और उनका नाम 'सुरेश्वर' हुआ। शङ्कराचार्यने एक-एक करके भारतमें प्रायः सर्वत्र भ्रमण करके नाना मतावलम्बियोंको विचारमें पराजित करके उन्हें अपने मतमें ले आये। उन्होंने तैंतीस वर्षकी आयुमें देहत्याग किया। 'मत्स्यतीर्थ'-सम्भवतः मालाबर-जिलामें समुद्रके तटपर स्थित वर्तमान 'माहे' नगर है। कोई-कोई कहते हैं कि भिजागापटनमके अन्तर्गत पद्म-तालुकाके बीचमें 'पादेरु'से छह मील उत्तरकी ओर मटम-ग्रामके निकट माचेरु-नदीका एक अद्भुत टापु ही मत्स्यतीर्थ है (भिजागापटम् गेजेटियार); किन्तु वह स्थान यहाँपर लक्षित नहीं हुआ है, ऐसा ही बोध होता है॥ 244 ॥ उडुपीमें मध्वाचार्य-स्थानमें नर्त्तक-गोपाल-दर्शन :- मध्वाचार्य-स्थाने आइला याँहा 'तत्त्ववादी'। उडुपीते 'कृष्ण' देखि' ताँहा हैल प्रेमोन्मादी ॥ 245 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीमध्वाचार्यके स्थान उडुपीमें आये, जहाँ तत्त्ववादी रहते थे। उडुपीमें महाप्रभु श्रीकृष्णके दर्शन करके प्रेममें उन्मत्त हो गये॥ 245 ॥ अनुभाष्य- 'श्रीमध्वाचार्य'-दक्षिण भारतमें सह्याद्रिके पश्चिममें 'कानाड़ा' जिला है; 'दक्षिण कानाड़ा' जिलेमें I 377
[ 9/245 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ] एक प्रधान नगर है—'म्याङ्गलोर', उसके उत्तरमें 'उडुपी' (उडिपी) है। उडुपी ग्रामके पाजका-क्षेत्रमें शिवाल्ली ब्राह्मणकुलके 'मध्यगेह' भट्ट और वेदविद्याके पुत्रके रूपमें 1040 शकाब्दमें, (मतान्तरमें 1160 शकाब्दमें) श्रीमध्वाचार्यने जन्म ग्रहण किया। बाल्यकालमें श्रीमध्वाचार्यका नाम 'वासुदेव' था। उनके विषयमें कुछ अलौकिक बातें कही जाती हैं— बाल्यकालमें—उडुपीसे पाजकाक्षेत्रमें लौटते समय बिना किसी विघ्नके आना, माताकी अनुपस्थितिमें बड़ी बहनके सामने रोना बन्द करनेके छलसे गैयाओंके द्वारा खाये जानेवाले एक नाद भर भूसेको खाना, एक विशाल साँड़की पूँछ पकड़कर झूलना और इमलीके बीजोंको ही वास्तविक धनके रूपमें बदलकर उससे पिताके द्वारा साहुकारसे लिये ऋणको चुकाना आदि। पौगण्ड अवस्थामें—नेडिउरुग्रामके उत्सवमें मध्वका खोना और बादमें उडुपीमें अनन्तेश्वर मन्दिरमें मिलना, नेयाम्पल्लि-ग्राममें 'शिव' नामक ब्राह्मणके भ्रमका प्रदर्शन आदि। पाँच वर्षकी आयुमें उनका उपनयन संस्कार हुआ था। महाभारतमें वर्णित 'मणिमान्' नामक असुर सर्पका आकार धारण करके वहाँ वास करता था। उपनयनके बाद ही 'वासुदेव'ने अपने पैरके अगूँठे द्वारा उस सर्पका संहार किया। माताके चिन्ता करनेपर वे एक छलाँग लगाकर माताके सामने उपस्थित हो गये। इस छोटी अवस्थामें ही उन्होंने पढ़ाईमें बहुत निपुणता दिखलायी। पिताकी सब प्रकारसे असहमति होनेपर भी उन्होंने 'अच्युतप्रेक्ष'से बारह वर्षकी आयुमें संन्यास ग्रहणकर 'पूर्णप्रज्ञ तीर्थ' नाम प्राप्त किया। दक्षिण भारतके अनेक प्रदेशोंमें भ्रमण करनेके बाद शृङ्गेरि मठके मठाधीश विद्याशङ्करके साथ उनका बहुत शास्त्रार्थ हुआ। विद्याशङ्कर अति उच्च पदपर थे, परन्तु उन्हें मध्वाचार्यके सामने झुकना पड़ा। 'सत्यतीर्थ' नामक संन्यासीके साथ श्रीमध्व बदरिका गये। वहाँ श्रीव्यासको अपने द्वारा रचित 'गीता-भाष्य' सुनाया और श्रीव्यासने उनके भाष्यको
[दायाँ स्तम्भ] सम्मति प्रदान की। श्रीव्याससे थोड़े ही समयमें उन्होंने अनेक विषयोंकी शिक्षा प्राप्त की। बदरिकासे आनन्दमठमें लौटनेके समय ही श्रीमध्वकी ब्रह्मसूत्र-भाष्य रचना पूर्ण हुई; सत्यतीर्थने उसे लिख दिया। श्रीमध्व बदरीसे गञ्जाममें गोदावरी-प्रदेशमें गये। वहाँ 'शोभन भट्ट' और 'स्वामी शास्त्री' नामक दो पण्डित उन्हें मिले। वे दोनों श्रीमध्वके शिष्य हुए और उनका नाम 'पद्मनाभ तीर्थ' और 'नरहरि तीर्थ' हुआ। उडुपीमें लौटकर एक दिन समुद्र स्नानके लिये जाते-जाते उन्होंने पाँच अध्यायोंमें 'श्रीकृष्ण' स्तोत्रकी रचना की। श्रीकृष्णके चिन्तनमें विभोर होकर वे एक दिन समुद्रके तटपर बालूके ऊपर बैठे थे। तभी उन्होंने देखा कि एक नौका जिसमें द्वारकामें व्यापारके लिये सामान जा रहा था, वह समुद्रमें फँस गयी है। नौकाको बालूमें धँसते देखकर नौकाको ऊपर उठानेके उद्देश्यसे उन्होंने वहींसे ही हाथोंसे कुछ इशारे किये और वह नौका बालूसे निकलकर तटपर आ गयी। इस सहायताके बदलेमें नाविकोंने जब उन्हें कुछ देनेकी इच्छा जतलायी, तब उन्होंने केवल नौकामें रखे हुए कुछ गोपीचन्दनको लेना स्वीकार किया। परन्तु नाविकोंने उन्हें एक बड़ा गोपीचन्दनका टुकड़ा दिया। रास्तेमें लाते-लाते 'बड़व-न्डेश्वर' नामक स्थानपर वह टूट गया और उसमेंसे एक बहुत सुन्दर 'बालकृष्णमूर्ति' उन्हें प्राप्त हुई। मूर्तिके एक हाथमें एक दही मन्थन करनेवाला दण्ड तथा दूसरे हाथमें मन्थनकी रस्सी थी। श्रीकृष्णके प्राप्त होनेपर उनके 'द्वादश स्तोत्र'के बचे हुए सात अध्याय उसी दिन ही रचित हुए। तीस बलवान व्यक्ति भी जब इस मूर्तिको नहीं उठा पाये, तब परव्योममें सर्वव्यापी वायुके, हनुमानके अथवा भीमसेनके अवतार श्रीमध्व स्वयं माधवको उठाकर उडुपीमें अपने मठमें ले गये। उनके आठ प्रधान संन्यासी-शिष्य उडुपीके आठ मठोंके अध्यक्ष थे। वृन्दावनकी आठ गोपियाँ जिस प्रकार श्रीकृष्णकी सेवा करती हैं, उसी प्रकार इन बालकृष्णकी सेवा श्रीमध्वाचार्य स्वयं और उनके बाद उत्तराढ़ी-मठोंके
378 ।
नौवाँ अध्याय 9/245 ] अध्यक्ष श्रीमध्वाचार्यगण आठ मठाधीश-संन्यासियोंकी सहायतासे क्रमानुसार कराते थे। आज भी वैसा ही चल रहा है। श्रीमध्वने दूसरी बार बदरिकाकी यात्रा की थी। जिस समय वे महाराष्ट्र उस समय वहाँके 'महादेव' नामक राजा अपने मजदूरोंके द्वारा जनताके उपकारके लिये तालाब खुदवा रहे थे। राजाने आदेश देकर श्रीमध्वको उनके शिष्योंके सहित मिट्टी खुदवानेके कार्यमें बलपूर्वक लगाया। किन्तु श्रीमन्मध्वाचार्य अपने प्रभावसे राजाको ही उस कार्यमें नियुक्त करके सहसा स्वयं अपने शिष्योंको लेकर आगे चल दिये। गाङ्गप्रदेशके एक ओर हिन्दु राज्य और दूसरी ओर मुसलमान राज्य था। जिस समय श्रीमन्मध्वाचार्य गाङ्गप्रदेशमें पहुँचे, उस समय इन दोनों राज्योंमें परस्पर भीषण विवाद चल रहा था, जिसके कारण नदी पार करनेके लिये नौका भी नहीं मिलती थी। नदी बहुत चौड़ी थी और विरोधी सैनिकोंने नदी पार करनेपर प्रतिबन्ध लगा रखा था। श्रीमन्मध्वाचार्य और उनके शिष्योंने उस विकट स्थितिमें एक दूसरेका हाथ पकड़कर नदीको तैरकर पार तो कर लिया, किन्तु उनके तटपर पहुँचते ही विरोधी सैनिकोंने उन्हें सताना आरम्भ कर दिया। श्रीमन्मध्वाचार्यने राजाकी अवज्ञा की थी, इसलिये वे स्वयं राजाके समक्ष उपस्थित हुए तथा उन्होंने अपनी परिस्थितिका वर्णन किया। मुसलमान राजा उनकी सौम्य मूर्तिका दर्शनकर और उनके मधुर वचनोंको सुनकर इतना मुग्ध हो गया कि उसने अपना आधा राज्य उन्हें देनेकी इच्छा प्रकट की। किन्तु श्रीमन्मध्वाचार्यने उसे स्वीकार नहीं किया। आगे चलते-चलते मार्गमें डकैतोंने उनपर आक्रमण किया, किन्तु महाबली श्रीमन्मध्वाचार्यने अनायास ही उन सभीका विनाश कर डाला। कुछ आगे जानेपर सत्यतीर्थपर एक बाघने आक्रमण कर दिया, किन्तु श्रीमन्मध्वाचार्यने बलपूर्वक उस बाघको मारकर दूर फेंक दिया। तत्पश्चात् श्रीबदरिकाश्रममें पहुँचकर उन्होंने श्रीव्यासदेवका साक्षात् दर्शन लाभ किया और उनसे अष्टमूर्ति (आठ) शालग्राम प्राप्त किये। उसके बाद ही श्रीमन्मध्वाचार्यने 'महाभारत-तात्पर्य' की रचना की। इस प्रकार श्रीमन्मध्वाचार्यके अलौकिक पाण्डित्य और भगवत्-आनुगत्यकी ख्याति भारतमें सर्वत्र फैल गयी। इसके कारण शृङ्गेरि मठाधीश शङ्कराचार्य बड़े उद्विग्न और चिन्तित हो गये। शाङ्कर-मतावलम्बी अपनी प्रतिष्ठाको नष्ट होते देखकर श्रीमध्वाचार्यके प्रति हिंसा करनेकी योजना बनाने लगे। वे मध्व-मतावलम्बियोंको समाजसे बहिष्कृत और मध्वमतको अवैदिक और शास्त्र-विरोधी सिद्ध करनेका प्रयास करने लगे। शृङ्गेरि मठके मठाधीश पद्मतीर्थने पुण्डरीकाक्ष-पुरी नामक एक शाङ्कर-मतावलम्बी पण्डितको लेकर श्रीमन्मध्वाचार्यके साथ शास्त्रार्थ कराया। श्रीमध्वाचार्यके द्वारा संगृहीत एवं रचित ग्रन्थोंको भी चोरी करवा लिया। इस घटनासे श्रीमध्व और उनके शिष्योंको बहुत कष्ट हुआ। परन्तु कुम्लाधि देशके राजा श्रीजयसिंहकी सहायतासे श्रीमध्वाचार्यको वे ग्रन्थ पुनः प्राप्त हो गये। विष्णुमङ्गल निवासी देश-प्रसिद्ध पण्डित त्रिविक्रमाचार्यको शास्त्रयुक्तिके द्वारा वाद-विवादमें पराजितकर श्रीमध्वाचार्यने उसे अपने शिष्यके रूपमें ग्रहण किया। पण्डित त्रिविक्रमाचार्यके पुत्र कविवर श्रीनारायणाचार्य ही 'श्रीमध्वविजय' ग्रन्थके रचयिता हैं। पिताके परलोक सिधारनेके बाद उनके छोटे भाईने भी संन्यास ग्रहण किया और उनका नाम 'विष्णुतीर्थ' हुआ। श्रीपूर्णप्रज्ञके शारीरिक बलकी भी कोई सीमा नहीं थी। 'कड़ञ्जरी' नामक एक बलवान् पुरुष अपनेको तीस व्यक्तियोंके समान बलशाली समझकर बहुत ही अभिमान करता था। श्रीमध्वाचार्यने अपने पैरके अङ्गुठेको भूमिमें लगाकर कड़ञ्जरीसे उसे हिलानेके लिए कहा, किन्तु वह अपने सम्पूर्ण बलका प्रयोग करनेपर भी उसे टससे मस नहीं कर सका। एक समय कादुर जिलेके मुदगेरी गाँवमें नदी अपने तटको तोड़कर बहुत-से भूभागको नष्ट कर रही थी। अतः नदीके । 379
[ 9/245 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला वेगको कम करनेके लिये हजारसे भी अधिक व्यक्ति एक साथमें मिलकर एक विशाल शिला लानेकी चेष्टा कर रहे थे। जब बहुत प्रयास करनेपर भी वे सफल नहीं हुए और उन्हें वह शिला बीच मार्गमें ही छोड़नी पड़ी। तब महाबली श्रीमध्वाचार्यने एक हाथसे अनायास ही उस शिलाको उठाकर ठीक स्थानपर ले जाकर स्थापित कर दिया। इसलिये आज भी वहाँ उस विशाल शिलापर लिखा है—'श्रीमध्वाचार्यके एक हाथसे लायी गयी स्थापित शिला।' किसी समय श्रीमध्वाचार्य एक बहुत ही कमजोर शरीरवाले बालकके कन्धेपर चढ़कर घूम रहे थे, उस समय उस बालकको उनके भारका बिल्कुल भी पता नहीं चला। अपने शिष्योंके सामने ऐतरेयोपनिषद्-भाष्यकी व्याख्या करते-करते उन्नासी वर्षकी आयुमें माघी-शुक्ला-नवमी तिथिमें श्रीमध्याचार्यने परलोकमें गमन किया। विशेष विवरण जाननेके लिये श्रीमध्व-शिष्य त्रिविक्रमाचार्यके पुत्र नारायण-पण्डितके द्वारा रचित 'मध्वविजय' ग्रन्थ देखें। उक्त ग्रन्थका एक संक्षिप्त विवरण (मञ्जुषा समाहृति-द्वितीय संख्यामें) देखें। श्रीमाध्व-तत्त्ववाद-सम्प्रदायके आचार्यगण उडुपि ग्रामके मूल माधवमठको 'उत्तरराढ़ी मठ' कहते हैं। उडूपीके आठ मठोंके मूल-आचार्यों और मठसमूहोंके नाम, जैसे-
- विष्णु-तीर्थ-शोद मठ,
- जनार्दन-तीर्थ-कृष्णपुर मठ,
- वामन-तीर्थ-कनुर मठ,
- नरसिंह-तीर्थ-अधमर मठ,
- उपेन्द्र-तीर्थ-पुत्तुगी मठ
- राम-तीर्थ-शिरुर मठ
- हृषीकेश-तीर्थ-पलिमर मठ,
- अक्षोभ्य-तीर्थ-पेजावर मठ। वहाँकी गुरु और काल परम्परा; जैसे-
- हंस परमात्मा, 2) चतुर्मुख ब्रह्मा, 3) सनकादि,
- दुर्वासा, 5) ज्ञाननिधि, 6) गरुड़वाहन, 7) कैवल्यतीर्थ,
- ज्ञानेशतीर्थ, 9) परतीर्थ, 10) सत्यप्रज्ञतीर्थ, 11) प्राज्ञतीर्थ, 12) अच्युतप्रेक्षाचार्य तीर्थ, 13) श्रीमध्वाचार्य-1040 शक, 14) पद्मनाभ-1120 शक, नरहरि-1127 शक, माधव-1136 शक और अक्षोभ्य-1159 शक, 15) जयतीर्थ-1167 शक, 16) विद्याधिराज-1190 शक,
- कवीन्द्र-1255 शक, 18) वागीश-1261 शक,
- रामचन्द्र-1269 शक, 20) विद्यानिधि-1298 शक,
- श्रीरघुनाथ-1366 शक, 22) रघुवर्य (महाप्रभुके साथ वाद करनेवाले)-1424 शक, 23) रघुत्तम-1471 शक, 24) वेदव्यास-1517 शक, 25) विद्याधीश-1541 शक, 26) वेदनिधि-1553 शक, 27) सत्यव्रत-1557 शक, 28) सत्यनिधि-1560 शक, 29) सत्यनाथ-1582 शक, 30) सत्याभिनव-1595 शक, 31) सत्यपूर्ण-1628 शक, 32) सत्यविजय-1648 शक, 33) सत्यप्रिय- 1659 शक, 34) सत्यबोध-1666 शक, 35) सत्यसन्ध-1705 शक, 36) सत्यवर-1716 शक, 37) सत्यधर्म-1719 शक, 38) सत्यसङ्कल्प-1752 शक,
- सत्यसन्तुष्ट-1763 शक, 40) सत्यपरायण-1763 शक, 41) सत्यकाम-1785 शक, 42) सत्येष्ट- 1793 शक, 43) सत्यपराक्रम-1794 शक, 44) सत्यधीर- 1801 शक, 45) सत्यधीर तीर्थ-1808 शक।
- संख्यावाले श्रीविद्याधिराज तीर्थसे और एक शिष्य धारा प्रारम्भ होती है, जो इस प्रकार है-17) राजेन्द्रतीर्थ-1254 शक, 18) विजयध्वज, 19) पुरुषोत्तम,
- सुब्रह्मण्य, 21) व्यासराय-1470-1520 शक। इस मठकी परम्पराक्रमसे वर्तमान समय तक और भी उन्नीस व्यक्ति श्रीमाधव-तीर्थ-संन्यासी हुए हैं।
- रामचन्द्र तीर्थकी एक और शिष्य धारा-20) विबुधेन्द्र-1218 शक, 21) जितामित्र-1348 शक, 22) रघुनन्दन, 23) सुरेन्द्र, 24) विजेन्द्र, 25) सुधीन्द्र, 26) राघवेन्द्रतीर्थ-1545 शक। इस 'पर-मठ'में आज तक और भी चौदह व्यक्ति श्रीमाधव-तीर्थ-संन्यासी हुए हैं। 380 ।
नौवाँ अध्याय 9/245–258 ] 'उडुपी'—दक्षिण कानाड़ा जिलेमें, म्याङ्गलोरसे छत्तीस मील उत्तरकी ओर समुद्रके तटपर अवस्थित है (दक्षिण कानाड़ा-म्यानुयेल एवं बोम्बाई गेजेटियार) ॥ 245 ॥ श्रीमध्वको गोपाल-प्राप्ति और तबसे शिष्य-परम्परामें सेवा :— 'नर्त्तक गोपाल देखे परम-मोहने। मध्वाचार्ये स्वप्न दिया आइला ताँर स्थाने॥ 246 ॥ गोपीचन्दन-तले आछिल डिङ्गाते। मध्वाचार्य-ठाञि कृष्ण आइला कोनमते॥ 247 ॥ मध्वाचार्य आनि' ताँरे करिला स्थापन। अद्यावधि सेवा करे तत्त्ववादिगण॥ 248 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने 'नर्तक गोपाल'के परम मनोहर रूपके दर्शन किये। ये विग्रह श्रीमध्वाचार्यके स्वप्नमें आये थे। जब ये नर्तक गोपाल गोपीचन्दनमें ढके हुए एक नौकामें आये थे, तब श्रीमध्वाचार्यने उन्हें किसी प्रकारसे प्राप्त किया था। श्रीमध्वाचार्यने उन्हें लाकर उडुपीमें स्थापित किया था। आज तक श्रीमध्वाचार्यकी शिष्य-परम्परामें तत्त्ववादिगण उन श्रीविग्रहकी सेवा करते आ रहे हैं॥ 246-248 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—दक्षिण भारतके एक प्रदेशमें उडुपी गाँवमें श्रीमध्वाचार्यकी गद्दी है, उस सम्प्रदायके आचार्योंको 'तत्त्ववादी' कहते हैं। वहाँपर नर्तक गोपालकी श्रीमूर्त्ति है। श्रीमध्वाचार्यने जलमग्न एक बड़ी नौकामें गोपीचन्दनके एक बड़े टुकड़ेके अन्दरसे श्रीगोपालको प्राप्त किया था॥ 245-247 ॥ श्रीमध्व-स्थापित श्रीकृष्ण-दर्शनसे महाप्रभुका नृत्य-गीत :— कृष्णमूर्त्ति देखि' प्रभु महासुख पाइल। प्रेमावेशे बहुत नृत्य-गीत कैल॥ 249 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-विग्रहके दर्शन करके महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ और प्रेमावेशमें उन्होंने बहुत समय तक नृत्य-गान किया॥ 249 ॥ प्रथम दर्शनमें भ्रमवशतः तत्त्ववादियोंका महाप्रभुको 'मायावादी' समझना :— तत्त्ववादिगण प्रभुके 'मायावादी'-ज्ञाने। प्रथम दर्शने प्रभुके ना कैल सम्भाषणे॥ 250 ॥ बादमें महाप्रभुके सात्त्विक विकारोंका दर्शनकर उनको वैष्णव समझना :— पाछे प्रेमावेश देखि' हैल चमत्कार। वैष्णव-ज्ञाने बहुत करिल सत्कार॥ 251 ॥ तत्त्ववादियोंका स्वयंको वैष्णव' माननेका जड़ाभिमान :— 'वैष्णवता' सबार अन्तरे गर्व जानि'। ईषत् हासिया किछु कहे गौरमणि॥ 252 ॥ महाप्रभुका उनके गर्व-खण्डनरूपी कृपाका सङ्कल्प :— ताँ-सबार अन्तरे गर्व जानि' गौरचन्द्र। ताँ-सबा-सङ्गे गोष्ठी करिला आरम्भ॥ 253 ॥ महापण्डित रघुवर्यतीर्थसे महाप्रभुका दीनतापूर्वक प्रश्न :— तत्त्ववादी-आचार्य-सब शास्त्रेते प्रवीण। ताँरे प्रश्न कैल प्रभु हञा येन दीन॥ 254 ॥ साध्य-साधनकी जिज्ञासा :— “साध्य-साधन आमि ना जानि भालमते। साध्य-साधन-श्रेष्ठ जानाह आमाते॥” 255 ॥ तत्त्वाचार्यका उत्तर—(1) वर्णाश्रम धर्म और श्रीकृष्णके प्रति समर्पणरूपी कर्ममिश्रा भक्ति ही 'साधन' :— आचार्य कहे,—“वर्णाश्रम-धर्म कृष्णे-समर्पण। एइ हय कृष्णभक्तेर श्रेष्ठ साधन॥ 256 ॥ (2) पाँच प्रकारकी मुक्ति ही 'साध्य' :— 'पञ्चविध मुक्ति' पाञा वैकुण्ठे गमन। 'साध्य-श्रेष्ठ' हय,—एइ शास्त्र-निरूपण॥” 257 ॥ महाप्रभुका उत्तर—(1) शरणागत भक्तोंके लिये नवधा भक्ति ही साधन :— प्रभु कहे,—“शास्त्रे कहे श्रवण-कीर्त्तन। कृष्णप्रेमसेवा-फलेर 'परम-साधन'॥ 258 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 250–258 ॥ । 381
[ 9/250-260 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य— महाप्रभुके शाङ्कर संन्यास-चिह्नोंको प्रह्लादको 'पुत्र' समझकर यह जिज्ञासा की, - 'तुमने देखकर शुद्धद्वैतवाद परायण तत्त्ववादियोंने पहले तो अपने (तथाकथित) गुरुसे किन-किन विषयोंका अध्ययन महाप्रभुके साथ बातचीत नहीं की, किन्तु बादमें उनका किया है', उसके उत्तरमें अधोक्षज-सेवक श्रीप्रह्लादने प्रेमावेश देखकर उनको वैष्णव समझकर उनका कहा- सत्कार अर्थात् सेवा की थी। तत्त्ववादियोंके अन्तःकरणमें विष्णोः श्रवणं (नामरूपगुणपरिकरलीलामय शब्दानां श्रोत्रस्पर्शः), वैष्णव होनेका अभिमान था, उसे देखकर महाप्रभुने [विष्णोः] कीर्त्तनं (नामरूपगुणपरिकरलीलामय शब्दानां उच्चारणं), थोड़ा हँसकर उनके साथ वार्त्तालाप किया था। महाप्रभुने [विष्णोः] स्मरणं (नामरूपगुणपरिकरलीलामयकृष्णस्य कहा,- 'मैं साध्य-साधन भली-भाँति नहीं जानता हूँ; यत्किञ्चिन्नमनुसानुसन्धानं), [विष्णोः] पादसेवनं (कालदेशा- आप लोग कृपा करके मुझे उसकी शिक्षा प्रदान करें।' द्युचितपरिचर्या), [विष्णोः] अर्चनं (पूजनं), [विष्णोः] वन्दनं तत्त्वाचार्यने उत्तर दिया,- 'वर्णाश्रमधर्म श्रीकृष्णमें समर्पित (नमस्कारः), [विष्णोः] दास्यं (तद्दासोऽस्मीत्यभिमानः) [विष्णोः] करना ही श्रीकृष्णभक्तका श्रेष्ठ साधन है एवं उस सख्यं (बन्धुभावेन तत्-हिताशंसनं), [विष्णौ] आत्मनिवेदनं साधन-बलसे श्रेष्ठ साध्यरूपी पाँच प्रकारकी मुक्ति प्राप्त (देहादि-शुद्धात्मपर्यन्तस्य सर्वतोभावेन तस्मै एवार्पणम्) इति करके सिद्धव्यक्ति वैकुण्ठमें जाता है।' यह सुनकर नवलक्षणा (नवलक्षणानि यस्याः सा) भक्तिः पुंसा (मानवेन) महाप्रभुने कहा, - शास्त्रके मतमें श्रवण-कीर्त्तन ही श्रेष्ठ-साधन [आदौ] अर्पिता [सती] भगवति विष्णो (श्रीहरौ) अद्धा है; उस साधनके बलसे श्रीकृष्णप्रेमसेवारूपी साध्यफलकी (साक्षादेव, न तु ज्ञानकर्माद्यव्यवधानेन) [पश्चात्] चेत् क्रियेत प्राप्ति होती है॥ 250-258 ॥ [न तु आदौ कृता सती, पश्चादर्प्येत, न तु कर्माद्यर्पणरूप-परम्परा अनुभाष्य— निर्विशेष-ब्रह्मवादी कैवलाद्वैतवादियों अथवा इयं भक्तिः; भगवत्तोषणार्थैवेयमिति भाव्यम्, न तु मायावादियोंके साथ शुद्धद्वैतवादियों अथवा तत्त्ववादियोंका धर्मार्थकाममोक्षार्थमिति, एवम्भूता चेत् क्रियेत, तदा तेन कर्त्रा बहुत समयसे विरोध प्रसिद्ध है॥ 250 ॥ शुद्धहरिभजनमेव सर्वशास्त्राध्ययनफलमिति मत्वा यत्] अधीतं, तत् [एव] उत्तमं मन्ये। श्रीमद्भागवत (7/5/23-24) :- श्लोक-भावानुवाद— श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुण- श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। परिकर-लीलामय शब्दोंका श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, श्रीकृष्णके अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ 259 ॥ चरणोंकी सेवा (देश-कालोचित परिचर्या), श्रीकृष्णका इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा। पूजन, वन्दन (नमस्कार), श्रीकृष्णके दास होनेका क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥ 260 ॥ अभिमान, श्रीकृष्णके प्रति सख्यभाव (बन्धुभावसे श्रीकृष्णके हिताभिलाषी) और श्रीकृष्णको आत्मनिवेदन (श्रीकृष्णको अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 259-260 ॥ देहादि, शुद्धात्मा तक सभी प्रकारसे समर्पण), -इन नौ अमृतप्रवाह भाष्य— श्रीकृष्णका श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, लक्षणोंसे सम्पन्न भक्ति मानवके द्वारा पहले श्रीकृष्णमें पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और साक्षात् (ज्ञान-कर्मादिके व्यवधानसे रहित) अर्पित आत्मनिवेदन, - इन नौ लक्षणोंसे सम्पन्न भक्ति ही होनेके बाद ही कर्मफलका अर्पण हो [ऐसा नहीं कि श्रीकृष्णमें अर्पित होकर साधित होनेसे सर्वसिद्धि होती पहले कर्म करके बादमें उसके फलको अर्पित करें; है, - यही शास्त्रोंका उत्तम तात्पर्य है॥ 259-260 ॥ और भक्ति भी श्रीकृष्णके सन्तोषके लिये हो, अनुभाष्य— प्राकृत सीमित ज्ञान ही जिसका एकमात्र धर्म-अर्थ-काम-मोक्षादिकी कामनासे नहीं; इस प्रकारके सहारा था, ऐसे दैत्यराज हिरण्यकशिपुने महाभागवत जिस कर्त्ताने यह जान लिया है कि शुद्धहरिभजन ही सभी शास्त्रोंके अध्ययनका फल है], उसने ही शास्त्रोंके अध्ययनको उत्तमरूपसे ग्रहण किया है॥ 259-260 ॥ 382 ।
नौवाँ अध्याय [right] 9/261-263 ] [बायाँ स्तम्भ] शुद्ध श्रवण-कीर्तनके फलसे ही श्रीकृष्णप्रेम :- श्रवण-कीर्त्तन हइते कृष्णे हय 'प्रेम'। सेइ पञ्चम पुरुषार्थ-पुरुषार्थेर सीमा ॥ 261 ॥ **अनुवाद—**श्रवण-कीर्तनादि नवधा भक्तिके अङ्गोंका पालन करनेसे श्रीकृष्णमें प्रेम होता है। यह प्रेम ही पाँचवाँ पुरुषार्थ है, जो सभी पुरुषार्थोंकी चरम सीमा है॥ 261 ॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**श्रवण-कीर्तनरूपी नौ प्रकारकी साधनभक्तिसे श्रीकृष्णमें जिस प्रेमभक्तिका उदय होता है, वही 'पाँचवाँ'-पुरुषार्थ है और वही पुरुषार्थोंकी सीमा है। तात्पर्य यह है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, -ये चारों 'सकैतव' (छलयुक्त) पुरुषार्थ हैं; प्रेमरूप पुरुषार्थ ही 'अकैतव' (छलरहित) पुरुषार्थ है॥ 261 ॥ **अनुभाष्य—**धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-ये चार पुरुषार्थ हैं। 'श्रीकृष्णप्रेम'—इन चारों पुरुषार्थोंसे परे 'पाँचवाँ'-पुरुषार्थ है और सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। श्रीकृष्णनाम-श्रवण-कीर्तनादिसे ही श्रीकृष्णप्रेम उदित होता है। अन्य प्रकारकी भक्तिका आचरण करनेपर भी कीर्तनके संयोगसे उनका करना ही कर्त्तव्य है, -यही श्रीमन्महाप्रभुका अभिप्राय है। मध्यलीला 22/105- “नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम 'साध्य' कभु नय। श्रवणादि-शुद्धचित्ते करये उदय। अर्थात् “शुद्ध श्रीकृष्णप्रेम जीवोंके हृदयमें नित्य स्थित है। यह कोई बाहरसे प्राप्त होनेवाली वस्तु नहीं है। श्रीकृष्ण नाम-रूप-गुण-लीलादिके श्रवण-कीर्तनसे शुद्ध हुए चित्तमें श्रीकृष्णप्रेम स्वाभाविक रूपमें उदित होता है॥" 261॥ जातरुचि व्यक्तिके श्रीकृष्णप्रेमका लक्षण :- श्रीमद्भागवत (11/2/40)— एवंव्रतः स्वप्रियनाम-कीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ 262 ॥ [दायाँ स्तम्भ] **अनुवाद—**श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है॥ 262 ॥ **अनुभाष्य—**आदिलीला 7/94 संख्या देखें॥ 262 ॥ फलभोगतात्पर्यकी निन्दा; काम प्रेमका जनक नहीं :- कर्मनिन्दा, कर्मत्याग, सर्वशास्त्रे कहे। कर्म हैते प्रेमभक्ति कृष्णे कभु नहे ॥ 263 ॥ **अनुवाद—**सभी शास्त्र कर्मकी निन्दा करते और कर्मका त्याग कहते हैं। कर्मसे श्रीकृष्णमें प्रेमभक्तिकी प्राप्ति कभी नहीं होती ॥ 263 ॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**कर्म-प्रतिपादक शास्त्रोंमें कर्मके उपदेश और प्रशंसा बहुत स्थानोंपर होनेपर भी अन्तमें कर्मकी निन्दा और कर्मके त्यागकी व्यवस्था ही सभी शास्त्रोंमें कही गयी है। कर्म अथवा कर्मार्पणके द्वारा श्रीकृष्णमें कभी भी प्रेमभक्ति नहीं हो सकती। तात्पर्य यह है कि, कर्मार्पणादिके द्वारा चित्त शुद्ध होता है; चित्त शुद्ध होनेपर सत्सङ्गके बलसे अनन्य-श्रीकृष्ण-भक्तिमें श्रद्धाका उदय होता है। श्रद्धाके उदय होनेपर श्रवण-कीर्तनादिरूप 'साधनभक्ति' होती है। श्रवण-कीर्तनादि भक्ति साधन करते-करते अनर्थोंकी जितनी निवृत्ति होती है, प्रेमका उतना ही आविर्भाव होता है। इसलिये कर्म अथवा कर्मार्पणसे निश्चितरूपसे श्रीकृष्णभक्तिके उदित होनेकी सर्वत्र (सर्वदा) सम्भावना नहीं है; क्योंकि (शुद्ध श्रीकृष्णभक्ति) सत्सङ्गजनित 'श्रवणोत्पत्ति'-लक्षणा श्रद्धाकी अपेक्षा रखती है॥ 263 ॥ **अनुभाष्य—**असत्कर्मकी अपेक्षा सत्कर्म श्रेष्ठ हैं; किन्तु सत्कर्मोंसे कभी भी श्रीकृष्णमें प्रेमभक्तिका उदय नहीं होता। कर्म-जीवोंके सुख और दुःखकी प्राप्तिका । 383
[ 9/263-268 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कारण है। जीवोंके सुख अथवा दुःखकी प्राप्तिके फलसे भक्तिके उदित होनेकी सम्भावना नहीं है। श्रीकृष्णकी सुख प्राप्तिके लिये सेवा ही—भक्ति है। अपने भोगके लिये किये गये कर्मोंकी निन्दा एवं उनको त्याग करनेका विधान सभी शास्त्रोंमें, यहाँ तक कि, ज्ञानशास्त्रोंमें भी कहा गया है। अमल-प्रमाण-शिरोमणि श्रीमद्भागवतमें शुद्धज्ञानविरागभक्ति-सहित नैष्कर्म्यकी बातका ही विचार हुआ है और इसीकी ही संस्थापना हुई है। इसलिये सभी शास्त्रोंमें श्रेष्ठ इस पुराणके आदि, मध्य और अन्तमें, सर्वत्र ही अत्यन्त तुच्छ फलभोगमें बाँधनेवाले कर्म और ज्ञानकी निन्दा की गयी है। ग्रन्थके आकारकी वृद्धिके भयसे इस स्थानपर कोई श्लोक-प्रमाण उद्धृत नहीं किया है॥ 263 ॥ स्वधर्म-त्यागपूर्वक हरिभजन :- श्रीमद्भागवत (11/11/32)- आज्ञायैवं गुणान् दोषान्मयादिष्टानपि स्वकान्। धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान्मां भजेत् स सत्तम् ॥ 264 ॥ अनुवाद-धर्मशास्त्रोंमें मुझ भगवान्ने जिनको 'धर्म' कहकर आदेश किया है, उनके गुण-दोषका विचार करके, उन सभी प्रकारके धर्मोंकी प्रवृत्तिको छोड़कर जो मेरा भजन करते हैं, वे ही सबसे श्रेष्ठ (साधु) हैं॥ 264 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/62 संख्या देखें॥ 264 ॥ श्रीमद्भगवद्गीता (18/66) :- सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ 265 ॥ अनुवाद-समस्त धर्मोंका परित्याग करके एकमात्र, मैं जो भगवान् हूँ, मेरे शरणागत होओ। ऐसा करनेपर मैं तुम्हें समस्त पापोंसे मुक्त करूँगा। तुम शोक मत करो॥ 265 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/63 संख्या देखें ॥ 265 ॥ हरिकथामें श्रद्धावान् लोगोंका कर्ममें अधिकार नहीं :- श्रीमद्भागवत (11/20/9)- तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथा श्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥ 266 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 266 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जब तक कर्ममार्गमें निर्वेद (वैराग्य) उदित न हो, अथवा मेरी कथा-श्रवणादिमें श्रद्धा उत्पन्न न हो, तब तक नित्य-नैमित्तिकादि कर्म करने चाहिये ॥ 266 ॥ अनुभाष्य-कर्मानुष्ठान और कर्मत्यागके अधिकारके सम्बन्धमें संशय होनेपर उद्धवजीके प्रश्नके उत्तरमें श्रीभगवान्ने कहा- यावता पुमान् न निर्विद्येत (यावन्निर्वेदः कृष्णेतर-कथासु वैराग्यो न जायते), यावत् मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा न जायते, तावत् कर्माणि (नित्यनैमित्तिकानि पुण्यकर्माणि) कुर्वीत। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 266 ॥ पञ्चविध मुक्ति त्याग करे भक्तगण। फल्गु करि' 'मुक्ति' देखे नरकेर सम ॥ 267 ॥ अनुवाद-भक्त लोग 'मुक्ति'को तुच्छ मानकर उसे नरकके समान देखते हैं, इसलिये वे पाँच प्रकारकी मुक्तियोंका त्याग करते हैं॥ 267 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भक्तिमें बाधक-कर्मके सम्बन्धमें (आपने) शास्त्रके सिद्धान्त सुने। अब देखिये, भक्त लोग पाँच प्रकारकी मुक्तिकी पिपासाका अवश्य त्याग करेंगे, क्योंकि वे मुक्तिको नरकके समान तुच्छ मानते हैं॥ 267 ॥ शुद्धसेवक श्रीकृष्णकी शुद्धसेवा चाहता है, मुक्ति नहीं :- श्रीमद्भागवत (3/29/13)- सालोक्य-सार्ष्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥ 268 ॥ अनुवाद-(मेरे द्वारा) सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्ष्टि 384 ।
नौवाँ अध्याय 9/268-270 ] (ऐश्वर्यसम्पत्ति), सारूप्य (चतुर्भुजाकार), सामीप्य (निकटवास) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति) प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते, क्योंकि मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी अभिलाषा नहीं है ॥ 268 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/207 संख्या देखें ॥ 268 ॥ येषां तेषां) महतां अभवः (अपौनर्भवः मोक्षः) अपि फल्गुः (तुच्छः एव)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 269 ॥ शुद्धवैष्णवके लिये दुष्कर्मका फल नरक, सुकर्म या स्वधर्मका फल स्वर्ग एवं ज्ञानका फल मोक्ष—सभी एक समान :- श्रीमद्भागवत (6/17/28)— नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति। स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिनः ॥ 270 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 270 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वर्ग, अपवर्ग (मुक्ति) और नरकको एक समान देखनेवाले नारायण-भक्त किसीसे भी भयभीत नहीं होते ॥ 270 ॥ शुद्धभक्तके लिये मोक्ष भी तुच्छ :— श्रीमद्भागवत (5/14/44)— यो दुस्त्यजान् क्षितिसुतस्वजनार्थदारान् प्रार्थ्यां श्रियं सुरवरैः सदयावलोकाम्। नैच्छन्नृपस्तदुचितं महतां मधुद्विट्- सेवानुरक्तमनसामभवोऽपि फल्गुः ॥ 269 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 269 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अपरित्यज्य (बहुत कठिनाईसे परित्याग किये जा सकनेवाले) सम्पत्ति, पुत्र, स्वजन, अर्थ और पत्नी एवं [यहाँ तक कि] प्रधान-प्रधान देवता भी जिसके लिये प्रार्थना करते हैं, ऐसी दया-दृष्टिसे युक्त राज्यलक्ष्मी तककी भी भरत-महाराजने अभिलाषा नहीं की, वह उनके लिये उचित ही था; क्योंकि उनके जैसे श्रीकृष्णसेवामें अनुरक्त चित्तवाले साधुओंके लिये जब निर्वाणमुक्ति भी तुच्छ है, तब पार्थिव (जड़ीय) सुखकी तो बात ही नहीं है ॥ 269 ॥ अनुभाष्य—परमहंस शम्भुकी अवज्ञा करनेवाले चित्रकेतुको पार्वतीका 'वृत्रासुरके रूपमें जन्म ग्रहण करो' ऐसा कहकर अभिशाप देनेपर साधु चित्रकेतुने मस्तक झुकाकर उस शापको ग्रहण किया। फिर पार्वती-शम्भु, दोनोंको प्रसन्न करके उन्होंने अपने स्थानके लिये प्रस्थान किया। इसे देखकर परमवैष्णव शम्भु पार्वतीको विष्णुभक्तोंके आचरण और स्वभावका वर्णन कर रहे हैं— सर्वे नारायणपराः (विष्णुभक्ताः) कुतश्चन न बिभ्यति (अकुतोभयाः इत्यर्थः); (यतः ते) स्वर्गापवर्गनरकेषु (सुखधामस्वर्गमोक्षेषु क्लेशधामनरकादिषु) अपि तुल्यार्थदर्शिनः (तुल्यः अर्थः प्रयोजनमिति द्रष्टुं शीलं येषां ते तथा तुल्यफलद्रष्टार इत्यर्थः)। अनुभाष्य—श्रीशुकदेवके द्वारा महाराज परीक्षितके समक्ष महाभागवत भरतके शुद्ध भगवद्भक्तजनरूप गुण-महिमाका कीर्तन— यः नृपः (राजर्षिः भरतः) दुस्त्यजान् (दुष्परिहरान्) क्षितिसुतस्वजनार्थदारान् (भूमिपुत्रबन्धुद्रविणकलत्रादीन्) सुरवरैः (देवश्रेष्ठैरपि) प्रार्थ्यां (प्रार्थनीयां) श्रियं (लक्ष्मीं) सदयावलोकां (भरतस्य दया यथा भवत्येवमवलोको यस्या इति, यद्वा, भरतो वैराग्यात्यर्थं शारीरकष्टं मा स्वीकरोतु, मया लाल्यमानो गृहे एव तिष्ठतु, इति सद्योऽवलोको यस्यास्तां) न ऐच्छत् इति यत्, तत् (श्रियाम् औदासीन्यं) उचितमेव; [यतः] मधुद्विट्-सेवानुरक्तमनसां (मधुद्विषः सेवायाम् अनुरक्तं मनो श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इस श्लोकमें “कुतश्चन न बिभ्यति” अर्थात् ‘अकुतोभय’ शब्दमें जिस ‘भय’का उल्लेख किया गया है, वह द्वितीयाभिनिवेश (‘द्वितीय’ अर्थात् अद्वयज्ञान-श्रीकृष्ण अथवा सेव्य-चैतन्य वस्तुके अतिरिक्त अन्य प्रतीत होनेवाली जो माया है, उसमें अभिनिवेश, इन्द्रिय-सुखकर भोग) से उत्पन्न है—(भाः 11/2/37, वृःआःउः 1/4/2)। यह भोग ही 'काम' अर्थात् स्वार्थ कहलानेवाली अपनी । 385
[ 9/270-275 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला इन्द्रियोंको सुखी करनेकी इच्छा है। इस इच्छापूर्तिके लिये की जाने वाली चेष्टा ही 'मत्सरता' अथवा 'ईर्ष्या' है। केवलमात्र नारायणपरायण अर्थात् शुद्धभक्त ही 'अभय' प्राप्त करके कह सकते हैं,- 'नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति' (छाःउः 8/9/1); इसलिये स्वर्ग, नरक अथवा मोक्ष, सभी उनके लिये 'द्वितीय' अथवा अनात्म-विषय है, इसलिये अप्रिय है॥270॥ कर्म और ज्ञान-शुद्धभक्तिके प्रतिकूल, इसलिये 'साधन' और 'साध्य' नहीं :- मुक्ति, कर्म-दुइ वस्तु त्यजे भक्तगण। सेइ दुइ स्थाप' तुमि 'साध्य', 'साधन'॥ 271॥ अनुवाद-मुक्ति और कर्म-दोनोंको ही भक्तगण त्याग देते हैं और उन्हींको आप 'साध्य' एवं 'साधन'के रूपमें स्थापित कर रहे हैं॥ 271॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे तत्त्ववादाचार्य, शुद्धभक्तमात्र ही 'मुक्ति' और 'कर्म'-इन दोनोंका परित्याग कर देते हैं। दुःखकी बात यह है कि आपने उसी मुक्तिको 'साध्य' और कर्मको 'साधन' कहकर स्थापित किया है॥ 271॥ अनुभाष्य-श्रीकुलशेखर द्वारा रचित 'मुकुन्द माला' स्तोत्रमें- “नाहं वन्दे पदकमलयोर्द्वन्द्वमद्वन्द्वहेतोः, कुम्भीपाकं गुरुमपि हरे नारकं नापनेतुम्। रम्या-रामा-मृदुतनुलता-नन्दने नाभिरन्तुं, भावे भावे हृदय भवने भावयेयं भवन्तम्॥” “नास्था धर्मे न वसुनिचये नैव कामोपभोगे, यद्यद्भव्यं भवतु भगवन् पूर्वकर्मानुरूपम्। एतत् प्रार्थ्यं मम बहुमतं जन्मजन्मान्तरेऽपि, त्वत्पादाम्भोरुहयुगगता निश्चला भक्तिरस्तु॥” अर्थात् “हे कृष्ण! मैं मुक्तिके लिये आपके चरणयुगलकी वन्दना नहीं कर रहा हूँ, अथवा कुम्भीपाक नरक या उससे भी भयङ्कर नरकसे छुटकारा पानेके लिये वन्दना नहीं कर रहा हूँ, अथवा स्वर्गमें नन्दनकाननमें देव-रमणियोँकी सुकोमल देहलताके साथ रमण करनेके लिये स्तुति नहीं कर रहा हूँ, केवल भावके प्रत्येक स्तरमें विलास करनेके लिये ही हृदयमन्दिरमें आपके चरणकमलोंकी चिन्ता करता हूँ। हे भगवन्, पाप-पुण्यात्मक धर्म अथवा धन-रत्नोंमें, यहाँ तक कि कामके उपभोगमें मेरी कुछ भी आकाङ्क्षा नहीं है। पूर्व कर्मानुसार मेरा जो कुछ भी होना है, वह हो। केवलमात्र मेरी यही विनम्र प्रार्थना है, आपके चरणकमलयुगलकी भक्ति मेरे हृदयमें जन्मजन्मान्तरमें अचल होकर अवस्थान करे॥”271॥ तत्त्वाचार्यके भ्रमके लिये मानद महाप्रभुका आक्षेप :- संन्यासी देखिया मोरे करह वञ्चन। ना कहिला तेजि साध्य-साधन-लक्षण॥"272॥ अनुवाद-मुझे संन्यासी देखकर आप मेरी वञ्चना कर रहे हैं, इसलिये आपने साध्य-साधनका वास्तविक लक्षण मुझे नहीं बतलाया॥"272॥ तत्त्वाचार्यको लज्जा और महाप्रभुकी महिमा-उपलब्धि :- शुनि' तत्त्वाचार्य हैला अन्तरे लज्जित। प्रभुर वैष्णवता देखि' हइला विस्मित॥ 273॥ अनुवाद-महाप्रभुके वचनोंको सुनकर तत्त्वाचार्य हृदयमें बहुत लज्जित हुए और साथ ही महाप्रभुकी वैष्णवताको देखकर बहुत विस्मित हुए॥ 273॥ अनुभाष्य- 'तत्त्वाचार्य'-उत्तरराढ़ी मठकी गुरुपरम्परा (247 संख्याका अनुभाष्य देखें) से जाना जाता है कि श्रीमहाप्रभुके समयमें वहाँ श्रीरघुवर्यतीर्थ मध्वाचार्य थे॥ 273॥ तत्त्वाचार्यके द्वारा महाप्रभुके मतको स्वीकार करना :- आचार्य कहे,-"तुमि येइ कह, सेइ सत्य हय। सर्वशास्त्रे वैष्णवेर एइ सुनिश्चय॥ 274॥ आनन्दतीर्थकी आज्ञाके अनुसार तत्त्ववाद-सम्प्रदायमें कर्ममिश्रा-भक्तिका प्रचलन :- तथापि मध्वाचार्य ऐछे करियाछे निर्बन्ध। सेइ आचरिये सबे सम्प्रदाय-सम्बन्ध॥"275॥ 386 ।
नौवाँ अध्याय 9/274-277 ] अनुवाद—तत्त्वाचार्यने कहा,–“यद्यपि आप जो कह रहे हैं, वही सत्य है और वैष्णवोंके सभी शास्त्रोंने यही सुनिश्चित किया है, तथापि श्रीमध्वाचार्यने जो शिक्षा-निर्देश किया है, हम सम्प्रदायके सम्बन्धसे उसीका ही आचरण करते हैं॥ 274-275॥ अनुभाष्य—सदाचार स्मृतिमें— “धर्मेणेज्यासाधनानि साधयित्वा विधानतः। सर्ववर्णाश्रमैर्विष्णुरेक एवेज्यते सदा॥ आनन्दतीर्थमुनिना व्यासवाक्य-समुद्गताः। सदाचारस्य विषये कृताः संक्षेपतः शुभा॥” अर्थात् “सभी वर्ण ओर सभी आश्रम पूजा-साधनोंको धर्मके साथ यथाविधि सम्पादन करके एकमात्र विष्णुकी ही आराधना करते थे। श्रीमत् आनन्दतीर्थ-मुनिने सदाचार विषयक व्यासवाक्यसमूह संग्रह करके संक्षिप्तरूपमें मङ्गलकारिणी स्मृतिको लिखा॥ 275॥ महाप्रभुके द्वारा कर्मी और ज्ञानीका अनादर :- प्रभु कहे,—“कर्मी, ज्ञानी,—दुइ भक्तिहीन। तोमार सम्प्रदाये देखि सेइ दुइ चिह्न ॥ 276 ॥ उपास्यके सविशेषत्व अथवा चिद्विलासको स्वीकार करनेके फलस्वरूप तत्त्ववादीकी वैष्णवता :- सबे, एक गुण देखि तोमार सम्प्रदाये। 'सत्यविग्रह ईश्वरे', करह निश्चये ॥” 277 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“कर्मी और ज्ञानी,– दोनों ही भक्तिहीन हैं। और आपके सम्प्रदायमें मैं ये दोनों चिह्न देख रहा हूँ। तो भी, आपके सम्प्रदायमें एक गुण देखता हूँ,—आप ईश्वरके श्रीविग्रहको सत्य मानते हैं॥” 276-277 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा,—“ओहे तत्त्ववादी आचार्य, तुम्हारे सम्प्रदायके सभी सिद्धान्त प्रायः शुद्धभक्तिके विरुद्ध हैं, तथापि ईश्वरके सत्य और नित्य विग्रहको स्वीकार करनेवाला एक महान गुण मैं तुम्हारे सम्प्रदायमें देख रहा हूँ। तात्पर्य यह है कि मेरे परमगुरु श्रीमाधवेन्द्रपुरीने इस प्रधान सिद्धान्तके आधारपर माध्व-सम्प्रदायको स्वीकार किया था॥ 277 ॥ अमृतानुकणा—श्रीचैतन्य महाप्रभुने उडुपी ग्राममें स्थित मूल माध्वमठके तत्कालीन तत्त्ववादी आचार्य श्रीरघुवर्यतीर्थके द्वारा कहे गये साध्य-साधन-विचारका खण्डन किया था। इसलिये और विशेषतः, महाप्रभुने उन आचार्यको 'तुम्हारे सम्प्रदाय' शब्द जो कहा था, इसके द्वारा कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि, श्रीमन्महाप्रभु श्रीमध्व-सम्प्रदायमें नहीं है। वे लोग श्रीमन्महाप्रभु और रघुवर्यतीर्थकी वार्त्तालापसे इस प्रकार विचार निकालते हैं,—“श्रीमध्वाचार्यके मतसे कर्मार्पण 'साधन' है और ज्ञानमार्गके द्वारा मुक्ति 'साध्य' है। इसलिये उसमें भक्तिहीन कर्म और ज्ञानके चिह्न रहनेसे वह श्रीमन्महाप्रभुके द्वारा प्रदर्शित शुद्धभक्तिरूप 'साधन' और कृष्णप्रेम-रूप 'साध्य'के विचारसे सम्पूर्ण रूपसे पृथक् है। इसलिये श्रीमहाप्रभु स्वयं ही पृथक् साध्य-साधन-विचारसम्पन्न एक पाँचवें सम्प्रदायके प्रवर्त्तक हैं।” सम्प्रदाय-विज्ञान- वैभव-सम्बन्धमें अनभिज्ञ व्यक्तिकी इस प्रकारकी भावना अस्वाभाविक नहीं है। श्रीमध्व-मतके कनिष्ठ अधिकारी साधकके लिये प्रारम्भिक अवस्थामें श्रीकृष्णमें अपने कर्म अर्पण करनेकी बात स्वीकृत होनेपर भी निर्मल भक्ति ही प्रधान साधन रूपमें स्थापित हुई है। देहधर्ममें आसक्त फलभोगकी आकाङ्क्षा करनेवाले जीव 'कर्मी' होते हैं। उन्हें श्रीकृष्णके प्रति उन्मुख करनेके लिये प्रारम्भिक अवस्थामें श्रीकृष्णको कर्म अर्पण करनेके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। इसलिये श्रीमध्वाचार्यने भक्तिके अधीन और शुद्ध-भगवद्-ज्ञानके अनुकूल कर्मको सामान्यभावसे स्वीकार किया था। “ॐ सहकारित्वेन चॐ” (ब्रह्मसूत्र 3/4/33)— इसके भाष्यमें उन्होंने लिखा है,—“यथा राज्ञः सहकार्ये मन्त्री तथा ऋतेऽत्र क्षितिपः कार्यमृच्छेत्। एवं ज्ञानं कर्म बिनापि कार्यं सहायभूतं न विचारः कुतश्चिदिति कमठश्रुतौ सहकारित्वोक्तेश्च।” तात्पर्य यह है कि, जिस प्रकार राजाके कर्मसचिव-रूपमें मन्त्री वर्तमान रहते हैं, किन्तु राजा मन्त्रीके अतिरिक्त भी स्वयं कार्य-सम्पादन करनेमें समर्थ है, उसी प्रकार । 387
[ 9/276 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ] शुद्ध-भगवद्-ज्ञान भी कर्मके बिना मोक्ष प्रदान करनेमें समर्थ होनेपर भी किसी-किसी स्थानमें कर्म-ज्ञानके कर्मसचिव रूपमें स्वीकृत हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि श्रीमध्वपादने कर्मको मुख्य रूपमें मुक्तिका उपाय या ‘साधन' कहकर स्वीकार नहीं किया गया है। उसे गौण कर्म-निर्वाहक मन्त्रीका आसन मात्र दिया है। श्रीमद्भागवतके मतके साथ इस मतका कोई विरोध नहीं है, इसे भागवतके (10/47/24) श्लोककी आलोचनाके द्वारा यह समझा जा सकता है-“दान-व्रत-तपो-होम-जप- स्वाध्याय-संयमैः। श्रेयोभिर्विविधैश्चान्यैः कृष्णे भक्तिर्हि साध्यते॥” अर्थात् “जीव इस जगत्में दान, व्रत, तपस्या, होम, जप, वेद अध्ययन, संयम और अन्यान्य अनेक प्रकारके मङ्गल-अनुष्ठानके द्वारा श्रीकृष्णभक्तिकी साधना करते हैं।” तथापि अपनी इन्द्रियोंके सुखके लिये विष्णुके उद्देश्यसे अनुष्ठित जो याज्ञ, यज्ञादि हैं, उस प्रकारके कर्म गौणरूपमें भी भक्तिके सचिव नहीं हो सकते। कर्म साधारणतः ही अपनी इन्द्रियोंके सुखके लिये किये जाते हैं, इसलिये श्रीमन्महाप्रभुने कहा है,—“कर्मनिन्दा, कर्मत्याग-सर्वशास्त्रे कहे॥” किन्तु, जो कर्म धर्मके उद्देश्यसे किये जाते हैं और जिस धर्मका पालन वैराग्यके उद्देश्यसे किया जाता है और जो वैराग्य भगवान्के चरणकमलोंकी सेवाके लिये ही होता है, वह गौणरूपमें अभिधेय हो सकता है। श्रीमध्वाचार्यने इस प्रकारके कर्मको ही मात्र भक्तिके सचिवका आसन प्रदान किया है। जो परमार्थके उद्देश्यसे नहीं किया जाता, ऐसे कर्म निन्दनीय और वर्जनीय हैं। इस बातको उन्होंने ब्रह्मसूत्र (3/3/50)के भाष्यमें स्पष्ट रूपसे निर्देश किया है,—“कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते। तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥” अर्थात् “कर्मसे जीव बँधता है और विद्याके द्वारा मुक्त होता है, इसलिये पारदर्शी यतिगण कर्म नहीं करते।” श्रीमध्वाचार्यके मतमें अमला भक्तिही एकमात्र ‘साधन' रूपमें विवेचित हुई है। मध्व-सम्प्रदायमें सुप्रचलित, संक्षिप्त मध्वमत-प्रकाशक एक श्लोकमें यह व्यक्त हुआ
[दायाँ स्तम्भ] है। जैसे-“श्रीमध्वमते हरिः परतरः सत्यं जगत् तत्त्वतो, भेदो जीवगणा हरेरनुचरा नीचोच्चभावं गताः। मुक्तिर्नैजसुखानुभूतिरमला भक्तिश्च तत्साधनं, ह्यक्षादि त्रितयं प्रमाणमखिलाम्नायैकवेद्यो हरिः ॥” अर्थात् “श्रीमध्वके मतसे हरि ही सर्वश्रेष्ठ तत्त्व हैं, वस्तुतः जगत् सत्य है, जीवका भगवान्से नित्य भेद है और वह उनका नित्य दास है तथा जीव संसारमें उच्च-नीच गतिको प्राप्त करता रहता है। निज आनन्द (हरिदास्य)की अनुभूति ही मुक्ति है और अमला भक्ति ही उसका साधन है। प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द-ये तीन ही प्रमाण हैं और समस्त आम्नाय धाराके (गुरु-परम्पराके) द्वारा श्रीहरि ही जानने योग्य हैं।” इस श्लोकके ही अनुरूप एक श्लोक-“श्रीमध्वः प्राह विष्णुं परतमम्” अर्थात् “श्रीमध्वने कहा विष्णु ही परम तत्त्व हैं।” श्रीप्रमेय-रत्नावली-ग्रन्थमें श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभुने प्रकाश करके श्रीमध्वमत और श्रीचैतन्यमतका अभेद दिखलाया है। श्रीमन्मध्वने अपने विभिन्न भाष्योंमें श्रवण- कीर्त्तन-लक्षणा भक्तिको ही मुख्य साधनरूपमें बार-बार घोषित किया है। जैसे (मुण्डकोपनिषद्-भाष्यमें उद्धृत नारायणसंहिता-वचन)—द्वापरीयैर्जनैर्विष्णुः पञ्चरात्रैस्तु केवलैः। कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः॥” अर्थात् “द्वापरमें पञ्चरात्र विधिके अनुसार विष्णुकी आराधना होती है, किन्तु कलियुगमें केवल नामके द्वारा ही भगवान्की पूजा होती है।"; (3/3/53 सूत्रभाष्य)—“भक्तिरेवैनं दर्शयति, भक्तिवशः पुरुषो, भक्तिरेव भूयसीति माठर श्रुतेः।” (माठर श्रुतिमें कहा है-भक्ति ही भगवान्के दर्शन कराती है, भगवान् भक्तिके द्वारा ही वशीभूत होते हैं और शास्त्रोंमें सर्वत्र ही भक्तिकी महिमाका गान किया गया है)।; (महाभारत-तात्पर्य 1/118)—“भक्त्यैव तुष्टिमभ्येति विष्णुर्नान्येन केनचित्। स एव मुक्तिदाता च भक्तिस्तत्रैव कारणम्॥” अर्थात् “भक्तिसे ही विष्णु सन्तुष्ट होते हैं, उनके सन्तोष अन्य कोई कारण नहीं है। वे ही मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं और भक्ति ही मुक्तिका कारण है।”
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नौवाँ अध्याय 9/276 ]
इस प्रकारसे उन्होंने बार-बार विभिन्न शास्त्रवचनोंको उद्धृत करके यह बतलाया कि 'भक्ति'के अतिरिक्त साध्य-मुक्ति प्राप्त करनेका अन्य कोई उपाय नहीं है।
श्रीमध्वमतमें जिस मुक्तिको 'साध्य'रूपमें निर्णीत किया गया है, वह पाँच प्रकारकी मुक्तियोंके अन्तर्गत जीव-परमात्मैक्य-रूपा सायुज्य मुक्ति नहीं है। यदि वे जीव और परमात्माका ऐक्य ही स्वीकार करेंगे, तब उन्हें शुद्धद्वैतवादी या नित्य पञ्चभेदवादी कहनेके बदले भास्कर-भट्टादिके जैसे औपचारिक भेदवादी कहना होगा। श्रीमध्वाचार्यने जीवोंको श्रीहरिका नित्य सेवक कहा है। मुक्तावस्थामें भी जीव और ईश्वरके भेद और जीवकी ईश्वर-उपासनाकी बात उन्होंने उच्चस्वरसे घोषित की है।
“न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिता इत्यादि श्रुति-स्मृतिषु तात्पर्यं मुक्तानां भेदस्यैवोक्तेः।” (छान्दोग्य-भाष्य छठे अः)—अर्थात् जिस स्थानमें दूसरोंकी बात तो दूर रहे, स्वयं माया भी जहाँ प्रवेश नहीं कर सकती, वहाँ देवासुरादि समस्त जीवोंके पूजनीय हरिसेवकगण अवस्थान करते हैं, इत्यादि श्रुति-स्मृतिका तात्पर्य यह है कि सर्वत्र ही मुक्तजीव भगवान्से भिन्न हैं। “कृष्णोमुक्तैरिज्यते वीतमोहैः” (महाभारत तात्पर्य 2/62)—अर्थात् मोहरहित मुक्तगणोंके द्वारा श्रीकृष्ण पूजित होते हैं। “मुक्ता अपि हि कुर्वन्ति स्वेच्छयोपासनं हरे ॥” (सूत्रभाष्य 3/3/27); “मुक्तानामपि भक्तिर्हि नित्यानन्द-स्वरूपिणी” (मः भाः 1/105) आदि वाक्योंमें मुक्तगणोंकी भी श्रीहरि-उपासना और भक्ति, जो मुक्तगणोंकी नित्य आनन्दस्वरूपिणी है, वह प्रकाशित हुई है। “भेद व्यपदेशाच्च” ब्रह्मसूत्र (1/1/17)के भाष्यमें भी उन्होंने श्रीमद्भागवत-सिद्धान्तसे ही मुक्तिका (आत्माके) स्वरूप-रूपमें वर्णन किया है,—“मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः” (भाः 2/10/6) अर्थात् मायिक, स्थूल-सूक्ष्मरूप दोनोंका परित्याग करके शुद्धजीव-स्वरूपमें अर्थात् भगवद्-पार्षदरूपमें अवस्थानका नाम ही मुक्ति है। यहाँ तक कि, उक्त मतमें मुक्ति और मुक्तजीवोंके मध्यमें भी तारतम्य और आनन्दका तारतम्य स्वीकृत हुआ है; (संक्षिप्त मध्वमत)—“जीवगणा हरेरनुचरा नीचोच्चभावं गताः” अर्थात् “जीव हरिका नित्य दास है तथा जीव संसारमें उच्च-नीच गतिको प्राप्त करता रहता है।"; (सूत्रभाष्य 3/3/33)—“मुक्तावानन्दो विशिष्यते” अर्थात् “मुक्तिमें आनन्द एक विशेष वस्तु है।”
इसलिये मायावाद-दलन चिह्न उठानेवाले श्रीमध्वपादने जिस मुक्तिको साध्य कहकर निर्णीत किया है, वह नितान्त ही भक्तिपरक और श्रीमद्भागवत-विचारपरक है, उसमें कोई ज्ञान-दोष नहीं है। श्रील बलदेव विद्याभूषण प्रभुने श्रीमध्वाचार्यके द्वारा कही गयी उक्त मुक्तिको “मोक्षं विष्ण्वङ्घ्रिलाभं।” अर्थात् श्रीविष्णुके चरणकमलोंकी प्राप्ति कहकर वर्णित किया है। घीमें जिस प्रकार दूधकी मौलिकता होती है अर्थात् दूध जैसे घीका मूल है, उसी प्रकार श्रीगौरसुन्दरके द्वारा प्रचारित साध्य-सार प्रेमके मध्यमें भी श्रीमध्व-प्रतिपाद्य 'साध्य' श्रीविष्णुके चरणकमल प्राप्तिरूपा मुक्ति भी ग्रथित है।
श्रीमध्वाचार्यकी परम्परामें तत्त्ववादी-आचार्य रघुवर्यतीर्थकी या उनके अनुगत शिष्यवर्गकी अथवा परवर्ती तत्त्ववादियोंकी विचारधारामें कालक्रमसे श्रीमध्वाचार्यके वास्तविक मतसे अनेक भेद आ गये हैं, यह श्रीमध्वाचार्यकी लेखनी और आधुनिक तत्त्ववादियोंकी आचार-प्रचार लेखनीपर विचार करके अच्छी तरहसे समझा जा सकता है। इसलिये परवर्त्ती विकृत मतको मूल-आचार्यका सिद्धान्त कहकर स्थापित नहीं किया जा सकता। श्रीमन्महाप्रभुने मध्व-सम्प्रदायको स्वीकार करके भी उक्त तत्त्ववादि-आचार्यको “तुम्हारे सम्प्रदाय” कहकर जो कहा, उससे उक्त तत्त्ववादि-महाशय मूल 'मध्व-सम्प्रदाय'की धारासे बहुत दूर होकर स्वतन्त्र हो गये हैं, वही सूचित हुआ है।
उन्होंने उक्त वाक्यके द्वारा उस तत्त्ववादि-आचार्यको इस प्रकार समझाया,—“मेरा अभिप्रेत और स्वीकृत जो मध्व-सम्प्रदाय है, तुमने उसके वास्तविक तात्पर्यको न समझकर केवल बाहरी-मतजालमें आबद्ध होकर एक
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[ 9/276–280 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पृथक् सम्प्रदायकी सृष्टि की है, —उसमें एक भगवद्- विग्रहकी सत्यताको स्वीकार करना छोड़कर और कोई भी शुद्ध वैष्णव-सिद्धान्त नहीं देखा जाता। इसलिये तुम्हारे कल्पित इस सम्प्रदायके साथ व्यास-शिष्य श्रीमद्धका और मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है।” ‘आउल’, ‘बाउल’, ‘प्राकृतिक सहजिया’ आदि गोष्ठी अपना परिचय महाप्रभुके अनुगत और गौड़ीय वैष्णव-सम्प्रदायके रूपमें देते हैं। किन्तु ऐसा कहनेसे उनके अपसिद्धान्तको महाप्रभुके द्वारा प्रचारित मत नहीं कहा जा सकता। बल्कि कोई उक्त अपसिद्धान्तोंका खण्डन करके यह कहे कि उसने महाप्रभुके मतका खण्डन किया है, तो इस प्रकारका विचार नितान्त अयुक्तिपूर्ण है। इसी प्रकार तथाकथित तत्त्ववादियोंके अपसिद्धान्तका महाप्रभुके द्वारा शास्त्रयुक्तिसे खण्डन करनेकी बात कहकर कि महाप्रभुने चार-सात्वत- सम्प्रदायोंके एक मुख्य पूर्वाचार्य श्रीमद्धके प्रवर्त्तित श्रौतमतका खण्डन किया है, इसलिये उन्होंने कभी भी श्रीमध्व सम्प्रदायको स्वीकार नहीं किया—इस प्रकारकी युक्ति नितान्त बालभाष्य है अर्थात् बालककी वाणी है॥ 276 ॥ फल्गुतीर्थमें आगमन :— एइमत ताँर घरे गर्व चूर्ण करि’। फल्गुतीर्थे तबे आइला श्रीगौरहरि ॥ 278 ॥ अनुवाद—इस प्रकार उनके गर्वको चूर्ण करके तब श्रीगौरहरि फल्गुतीर्थमें आये॥ 278 ॥ अनुभाष्य—‘ताँर घरे’—अर्थात् ‘उनके’; आज तक भी हावड़ा-आमता लाईन पर ‘माजु’ आदि स्थानों पर एवं वर्द्धमान-काटोयाकी ओर ‘तत्’ ‘युष्मद्’ और ‘अस्मद्’ शब्दके कर्मकारकमें द्वितीया विभक्तिके एक वचनमें और बहुवचनमें चलित भाषामें सम्बन्ध-विभक्ति ‘र’के साथ ‘घरे’ शब्दका व्यवहार प्रसिद्ध है। जैसे—‘तादेर घरे’, ‘तोमादेर घरे’ एवं ‘आमादेर घरे’ आदि शब्दोंका अर्थ क्रमशः ‘उनके’, ‘तुम्हारे’ एवं ‘हमारे’ होता है। पूर्वी बङ्गालमें इन सभी शब्दोंके कर्मकारकमें द्वितीया-विभक्तिमें केवलमात्र बहुवचनमें ‘गोरे’ शब्द इस ‘घरे’ शब्दके अपभ्रंशके रूपमें प्रचलित है; किन्तु सम्बन्ध विभक्त ‘र’ आगम नहीं होता; जैसे-‘तुम्हें बुला रहे हैं’ को बङ्गला भाषामें ‘तोमादिगके डाकिय़ाछें’ कहनेके स्थानपर पूर्वबङ्गालमें चलती भाषामें ‘तोमागौरे डाकछें’ ही प्रचलित है॥ 278 ॥ त्रितकूपमें विशालाका दर्शन और पञ्चाप्सरा तीर्थमें आगमन :— त्रितकूपे विशाला करिल दरशन। पञ्चाप्सरा-तीर्थे आइला शचीर नन्दन ॥ 279 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने त्रितकूपमें विशालाके दर्शन किये। उसके बाद श्रीशचीनन्दन पञ्चाप्सरा-तीर्थमें गये॥ 279 ॥ अनुभाष्य—‘पञ्चाप्सरा तीर्थ’—शातकर्णिकी, अन्य मतमें माण्डकर्णिकी, और एक अन्य मतमें अच्युत-ऋषिकी तपस्याको भङ्ग करनेके उद्देश्यसे इन्द्रने लता, बुदबुदा, समीची, सौरभेयी और वर्णा—इन पाँच अप्सराओंको भेजा। परन्तु वे ऋषिके द्वारा श्रापग्रस्त होकर मगरमच्छके रूपमें सरोवरमें वास करने लगीं। बादमें श्रीरामचन्द्रने इस सरोवरको देखा था। नारदजीके वचनोंसे पता चलता है कि अर्जुनने तीर्थयात्रा करते हुए यहाँ आकर मगरमच्छकी योनिसे इन पाँच अप्सराओंका उद्धार किया। तबसे यह सरोवर तीर्थके रूपमें परिणत हो गया है॥ 279 ॥ गोकर्णमें शिवका दर्शन और द्वैपायनि और सूपारक-तीर्थमें आगमन :— गोकर्णे शिव देखि’ आइला द्वैपायनि। सूपारक-तीर्थे आइला न्यासि-शिरोमणि ॥ 280 ॥ अनुवाद—उसके बाद महाप्रभुने गोकर्णमें आकर शिवजीका दर्शन किया और वहाँसे वे द्वैपायनि आये। संन्यासी शिरोमणि महाप्रभु तब सूपारक तीर्थमें गये॥ 280 ॥ अनुभाष्य—‘गोकर्ण’—बम्बई प्रदेश (वर्तमान महाराष्ट्र 390 ।