श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1223, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय [ 9/234-242 ] स्तव-स्तुति की। तब बहुत देर तक महाप्रभुने नृत्य-गान किया। महाप्रभुके प्रेमको देखकर लोगोंको बहुत आश्चर्य हुआ और सभी लोगोंने महाप्रभुका परम सत्कार किया ॥ 234-236 ॥ शुद्धभक्त-सङ्गसे ब्रह्मसंहिताके पाँचवें अध्यायकी प्राप्ति :- महाभक्तगणसह ताँहा गोष्ठी कैल। 'ब्रह्मसंहिताध्याय'-पुँथि ताँहा पाइल ॥ 237 ॥ अनुवाद-आदिकेशव मन्दिरमें महाप्रभुने वहाँ एकत्रित महान्-भक्तोंके साथ इष्टगोष्ठी की। वहाँ उन्हें 'ब्रह्मसंहिता' ग्रन्थके एक अध्यायकी (पाँचवें अध्यायकी) एक पोथी प्राप्त हुई ॥ 237 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'ब्रह्मसंहिताध्याय'-ब्रह्मसंहिताका पाँचवाँ अध्याय, जो अब बङ्गालमें श्रीजीवगोस्वामीकी टीकाके साथ मिलता है ॥ 237 ॥ ग्रन्थ-दर्शनसे महाप्रभुको आनन्द :- पुँथि पाञा प्रभुर हैल आनन्द अपार। कम्पाश्रु-पुलक-स्वेद-स्तम्भ विकार ॥ 238 ॥ अनुवाद-इस पोथीको प्राप्त करके महाप्रभुको अपार प्रसन्नता हुई और कम्प, अश्रु, पुलक, स्वेद और स्तम्भादि अष्ट-सात्त्विक विकार उनकी देहमें प्रकाशित हो आये ॥ 238 ॥ ब्रह्मसंहिताका माहात्म्य :- सिद्धान्त-शास्त्र नाहि 'ब्रह्मसंहिता'र सम। गोविन्दमहिमा-तत्त्व परम कारण ॥ 239 ॥ अल्पाक्षरे कहे सिद्धान्त अपार। सकल-वैष्णवशास्त्र-मध्ये अति सार ॥ 240 ॥ अनुवाद-ब्रह्मसंहिताके समान और कोई भी सिद्धान्त-शास्त्र नहीं है। यह ग्रन्थ श्रीगोविन्दकी महिमाको सर्वाधिक प्रकाशित करनेवाला है, क्योंकि इसमें उनका सर्वोत्तम तत्त्व प्रकाशित हुआ है। समस्त सिद्धान्त इस ग्रन्थमें संक्षेपमें वर्णन किये गये हैं। यह ग्रन्थ सभी वैष्णव-शास्त्रोंका परमसार स्वरूप है ॥ 239-240 ॥ अनुभाष्य- 'ब्रह्मसंहिताध्याय'-'ब्रह्मसंहिता'-ग्रन्थका पाँचवाँ अध्याय। इसमें अचिन्त्यभेदाभेदस्थिति, अभ्यास, अष्टादशाक्षर मन्त्र, आत्मा, आत्माराम, कर्म, कामगायत्री, कामबीज, कारणब्धिशायी, कृष्णधामका चिद्-विशेष, गणेश, गर्भोदकशायी, गायत्री-उत्पत्ति, गोकुल, 'गोविन्द-रूप, स्वरूप-तत्त्व और धाम', जीवतत्त्व, जीवका प्राप्य स्वरूप, दुर्गा, तप, पञ्चभूत, प्रेम, ब्रह्म, ब्रह्माजीकी दीक्षा, भक्तिनेत्र, भक्तिके सोपान (सीढ़ियाँ), मन, महाविष्णु, योगनिद्रा, रमा, रागमार्गीय भक्ति, श्रीरामादि अवतार, लिङ्गादि शब्दका तात्पर्य, बद्धजीव, उसका साधन, विष्णुतत्त्व, वेदसार-स्तव, शम्भु, श्रुत, स्वकीय, परकीय, सदाचार, सूर्य और हैमाण्ड आदि विषय वर्णित हुए हैं ॥ 237-240 ॥ श्रीअनन्त पद्मनाभ-दर्शन :- बहु यत्ने सेइ पुँथि लइला लिखिया। 'अनन्त-पद्मनाभ' आइला हरषित हञा ॥ 241 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने बड़े यत्नसे ब्रह्म-संहिता ग्रन्थ लेकर उसकी नकल करवाकर अपने पास रख ली। फिर महाप्रभु हर्षित होकर 'अनन्त-पद्मनाभ' आये ॥ 241 ॥ अनुभाष्य- 'अनन्त-पद्मनाभ'-मध्यलीला 1/115 संख्या देखें ॥ 241 ॥ दो दिन वहाँ वास और बादमें श्रीजनार्दनका दर्शन :- दिन-दुइ पद्मनाभेर कैल दरशन। आनन्दे देखिते आइला श्रीजनार्दन ॥ 242 ॥ अनुवाद-दो दिन तक वहाँ रहकर महाप्रभुने भगवान् पद्मनाभके दर्शन किये और फिर आनन्दपूर्वक श्रीजनार्दनके दर्शनके लिये आये ॥ 242 ॥ अनुभाष्य- 'श्रीजनार्दन'-त्रिवेन्द्रमके छब्बीस मील उत्तरमें वर्काला-रेलवे स्टेशनके निकट विराजमान हैं ॥ 242 ॥ । 375