भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1224

[ 9/243-244 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पयस्विनीके तटपर शङ्कर नारायण-दर्शनः- दिन दुइ ताँहा करि' कीर्त्तन-नर्त्तन। पयस्विनी आसिया देखे शङ्कर नारायण ॥ 243 ॥ अनुवाद-दो दिन तक वहाँ रहकर महाप्रभुने नृत्य-कीर्तन किया और वहाँसे पयस्विनी नदीके तटपर आकर शङ्कर नारायणके दर्शन किये ॥ 243 ॥ शृङ्गेरि-मठमें आगमन और बादमें मत्स्यतीर्थ दर्शन :- शृङ्गेरि-मठे आइला शङ्कराचार्य-स्थाने। मत्स्य-तीर्थ देखि' कैल तुङ्गभद्राय स्नाने ॥ 244 ॥ अनुवाद-उसके बाद महाप्रभु शङ्कराचार्यके स्थान शृङ्गेरि-मठमें आये। फिर मत्स्यतीर्थका दर्शन करके उन्होंने तुङ्गभद्रा नदीमें स्नान किया ॥ 244 ॥ अनुभाष्य- 'शृङ्गेरि-मठ'-महीशूरके अन्तर्गत शिमोगा जिलेमें शृङ्गेरि-मठ है। यह स्थान तुङ्गभद्रा नदीके बाँये तटपर और हरिहरपुरके सात मील दक्षिणमें अवस्थित है। इसका वास्तविक नाम- (ऋष्य) शृङ्गगिरि अथवा शृङ्गवेर पुरी है। इस स्थानपर दक्षिण भारतमें स्थित शङ्कराचार्यका प्रधान मठ है। श्रीशङ्कराचार्यने अपने चार शिष्योंके द्वारा भारतके (1) उत्तरमें-बदरिकामें ज्योतिर्मठ; (2) पूर्वमें-पुरुषोत्तममें भोगवर्द्धन अथवा गोवर्धन मठ; (3) पश्चिममें-द्वारकामें शारदा मठ और (4) दक्षिणमें-'शृङ्गेरि' मठ स्थापित किये। शृङ्गेरि मठमें 'सरस्वती', 'भारती', 'पुरी'-इन तीन प्रकारका एक-दण्ड संन्यास ग्रहण करते हैं। “चतुर्थो दक्षिणाम्नायः शृङ्गेर्यां वर्त्तते मठः। सम्प्रदायो भूरिवारः भूर्भुवः गोत्र उच्यते ॥ पदानि त्रीणि ख्यातानि सरस्वती भारती पुरी। वराहो देवता यत्र क्षेत्रं रामेश्वरं वदेत् ॥ तीर्थञ्च तुङ्गाभद्राख्यं शक्तिः कामाक्षिका स्मृता। चैतन्य-ब्रह्मचारीति हस्तामलकदेशिकः ॥ आन्ध्र-द्राविड़-कर्णाट-केरलादि-प्रभेदतः। शृङ्गेर्यधीना देशास्ते ह्यावाचीदिगवस्थिताः ॥ स्वरज्ञानरतो नित्यं स्वरवादी कवीश्वरः। संसार-सागरासार-हन्तासौ हि 'सरस्वती' ॥ विद्याभारेण सम्पूर्णः सर्वभावं परित्यजन्। दुःखभारं न जानाति 'भारती' परिकीर्त्यते ॥ ज्ञानतत्त्वेन सम्पूर्णः पूर्णतत्त्वपदे स्थितः। परब्रह्मरतो नित्यं 'पुरी'नामा स उच्यते ॥” (मठाम्नाय) अर्थात् मठका नाम-शृङ्गेरि, दिशा-दक्षिण; देश-आन्ध्र, द्रविड़, कर्णाटक और केरलादि; सम्प्रदाय-भूरिवार, गोत्र-भूर्भुवः, क्षेत्र-रामेश्वर; महावाक्य अथवा बोध-'अहं ब्रह्मास्मि'; देव-वराह; शक्ति-कामाक्षी; आचार्य-हस्तामलक; संन्यास-पदवी-'सरस्वती', 'भारती', और 'पुरी'; ब्रह्मचारी-चैतन्य; तीर्थ-तुङ्गभद्रा; वेद-यजुः। शृङ्गेरि मठके गुरु और संन्यास ग्रहण-काल-परम्परा जैसे-

  1. शङ्कराचार्य-22 शक।
  2. सुरेश्वराचार्य-30 शक।
  3. बोधनाचार्य-680 शक।
  4. ज्ञानधनाचार्य-768 शक।
  5. ज्ञानोत्तम शिवाचार्य-827 शक।
  6. ज्ञानगिरि आचार्य-871 शक।
  7. सिंहगिरि आचार्य-958 शक।
  8. ईश्वर तीर्थ-1019 शक।
  9. नारसिंह तीर्थ-1067 शक।
  10. विद्यातीर्थ विद्याशङ्कर-1150 शक।
  11. भारतीकृष्ण तीर्थ-1250 शक।
  12. विद्यारण्य भारती-1253 शक।
  13. चन्द्रशेखर भारती-1290 शक।
  14. नरसिंह भारती-1309 शक।
  15. पुरुषोत्तम भारती-1328 शक।
  16. शङ्करानन्द-1350 शक।
  17. चन्द्रशेखर भारती-1371 शक।
  18. नरसिंह भारती-1386 शक।
  19. पुरुषोत्तम भारती-1394 शक।
  20. रामचन्द्र भारती-1430 शक।
  21. नरसिंह भारती-1479 शक।
  22. नरसिंह भारती-1485 शक।
  23. धनमड़ि नरसिंह भारती-1498 शक। 376 ।