भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1225

नौवाँ अध्याय 9/244-245 ] 24) अभिनव नरसिंह भारती-1521 शक। 25) सच्चिदानन्द भारती-1544 शक। 26) नरसिंह भारती-1585 शक। 27) सच्चिदानन्द भारती-1627 शक। 28) अभिनव सच्चिदानन्द भारती-1663 शक। 29) नृसिंह भारती-1689 शक। 30) सच्चिदानन्द भरती-1692 शक। 31) अभिनव सच्चिदानन्द भारती-1730 शक, 32) नरसिंह भारती-1739 शक, इनकी समाधिके विषयमें जाननेके लिये 'वैष्णव-मञ्जूषा-समाहृति' (चतुर्थ संख्या) देखें। 33) सच्चिदानन्द शिवाभिनव विद्या नरसिंह भारती-1788 शक। 'शङ्कराचार्य'–इन्होंने दक्षिण भारतके केरल-देशके अन्तर्गत 'कालाडि' नामक ग्राममें 608 शकमें वैशाखी शुक्ला-तृतीयाके दिवसमें जन्म ग्रहण किया। इनके पिताके नाम 'शिवगुरु' था। बचपनमें ही इनके पिता परलोक सिधार गये। आठ वर्षकी आयुके पार होते-न-होते ही इन्होंने शास्त्र-अध्ययन समाप्त करके नर्मदाके तटपर 'गोविन्द'से संन्यास ग्रहण किया। संन्यास ग्रहण करनेके बाद कुछ दिनों तक वे गोविन्दके पास रहे। तब उनकी अनुमतिसे वाराणसी गये और वहाँसे बदरिकाश्रममें जाकर बारह वर्षकी आयुमें ब्रह्मसूत्रके एक भाष्यका प्रणयन किया। बादमें दस उपनिषदों, गीता, सनत्सुजातीय और नृसिंह-तापनी आदि ग्रन्थोंके भाष्यकी भी रचनाकी। शङ्कराचार्यके शिष्योंमेंसे 'पद्मनाभ', 'सुरेश्वर', 'हस्तामलक' और 'त्रोटक'-ये चार व्यक्ति प्रधान है। शङ्कराचार्यने वाराणसीसे होकर प्रयागमें आकर कुमारिल भट्टके साथ भेंट की। कुमारिल मरणासन्न थे, इसलिये उस समय उन्होंने उनके साथ स्वयं विचार (शास्त्रार्थ) न करके अपने प्रधान शिष्य 'मण्डन'के पास माहिष्मती-नगरमें भेज दिया। वहाँ शङ्कराचार्यने मण्डनको विचारमें पराजित कर दिया। मण्डनकी सहधर्मिणी (पत्नी) 'सरस्वती' अथवा 'उभयभारती' उनके विचारके समय मध्यस्था थी; ऐसा कहा जाता है कि उसने शङ्कराचार्यके साथ कामशास्त्रके विषयमें विचार करनेकी इच्छा प्रकाशित की। शङ्कर नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे, अतएव कामशास्त्रके विषयमें कुछ नहीं जानते थे। उन्होंने 'उभयभारती'से एक महीनेका समय माँगकर योगबलसे एक क्षणभर पहले मरे हुए एक राजाके शरीरमें प्रवेश किया। इस प्रकार उन्होंने कामशास्त्रका अनुभव प्राप्त किया। ज्ञान अर्जन करके 'उभयभारती'से विचार-विमर्श करनेकी प्रार्थना की, परन्तु उन्होंने विचार ना करके शङ्करकी प्रार्थनाके अनुसार उनके शृङ्गेरि मठमें वे अचला रहेंगी अर्थात् सदा वहाँ वास करेंगी, यह वर देकर संसारसे विदा हो गयीं। मण्डनने शङ्कराचार्यसे संन्यास ग्रहण किया और उनका नाम 'सुरेश्वर' हुआ। शङ्कराचार्यने एक-एक करके भारतमें प्रायः सर्वत्र भ्रमण करके नाना मतावलम्बियोंको विचारमें पराजित करके उन्हें अपने मतमें ले आये। उन्होंने तैंतीस वर्षकी आयुमें देहत्याग किया। 'मत्स्यतीर्थ'-सम्भवतः मालाबर-जिलामें समुद्रके तटपर स्थित वर्तमान 'माहे' नगर है। कोई-कोई कहते हैं कि भिजागापटनमके अन्तर्गत पद्म-तालुकाके बीचमें 'पादेरु'से छह मील उत्तरकी ओर मटम-ग्रामके निकट माचेरु-नदीका एक अद्भुत टापु ही मत्स्यतीर्थ है (भिजागापटम् गेजेटियार); किन्तु वह स्थान यहाँपर लक्षित नहीं हुआ है, ऐसा ही बोध होता है॥ 244 ॥ उडुपीमें मध्वाचार्य-स्थानमें नर्त्तक-गोपाल-दर्शन :- मध्वाचार्य-स्थाने आइला याँहा 'तत्त्ववादी'। उडुपीते 'कृष्ण' देखि' ताँहा हैल प्रेमोन्मादी ॥ 245 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीमध्वाचार्यके स्थान उडुपीमें आये, जहाँ तत्त्ववादी रहते थे। उडुपीमें महाप्रभु श्रीकृष्णके दर्शन करके प्रेममें उन्मत्त हो गये॥ 245 ॥ अनुभाष्य- 'श्रीमध्वाचार्य'-दक्षिण भारतमें सह्याद्रिके पश्चिममें 'कानाड़ा' जिला है; 'दक्षिण कानाड़ा' जिलेमें I 377