श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 9/245 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ] एक प्रधान नगर है—'म्याङ्गलोर', उसके उत्तरमें 'उडुपी' (उडिपी) है। उडुपी ग्रामके पाजका-क्षेत्रमें शिवाल्ली ब्राह्मणकुलके 'मध्यगेह' भट्ट और वेदविद्याके पुत्रके रूपमें 1040 शकाब्दमें, (मतान्तरमें 1160 शकाब्दमें) श्रीमध्वाचार्यने जन्म ग्रहण किया। बाल्यकालमें श्रीमध्वाचार्यका नाम 'वासुदेव' था। उनके विषयमें कुछ अलौकिक बातें कही जाती हैं— बाल्यकालमें—उडुपीसे पाजकाक्षेत्रमें लौटते समय बिना किसी विघ्नके आना, माताकी अनुपस्थितिमें बड़ी बहनके सामने रोना बन्द करनेके छलसे गैयाओंके द्वारा खाये जानेवाले एक नाद भर भूसेको खाना, एक विशाल साँड़की पूँछ पकड़कर झूलना और इमलीके बीजोंको ही वास्तविक धनके रूपमें बदलकर उससे पिताके द्वारा साहुकारसे लिये ऋणको चुकाना आदि। पौगण्ड अवस्थामें—नेडिउरुग्रामके उत्सवमें मध्वका खोना और बादमें उडुपीमें अनन्तेश्वर मन्दिरमें मिलना, नेयाम्पल्लि-ग्राममें 'शिव' नामक ब्राह्मणके भ्रमका प्रदर्शन आदि। पाँच वर्षकी आयुमें उनका उपनयन संस्कार हुआ था। महाभारतमें वर्णित 'मणिमान्' नामक असुर सर्पका आकार धारण करके वहाँ वास करता था। उपनयनके बाद ही 'वासुदेव'ने अपने पैरके अगूँठे द्वारा उस सर्पका संहार किया। माताके चिन्ता करनेपर वे एक छलाँग लगाकर माताके सामने उपस्थित हो गये। इस छोटी अवस्थामें ही उन्होंने पढ़ाईमें बहुत निपुणता दिखलायी। पिताकी सब प्रकारसे असहमति होनेपर भी उन्होंने 'अच्युतप्रेक्ष'से बारह वर्षकी आयुमें संन्यास ग्रहणकर 'पूर्णप्रज्ञ तीर्थ' नाम प्राप्त किया। दक्षिण भारतके अनेक प्रदेशोंमें भ्रमण करनेके बाद शृङ्गेरि मठके मठाधीश विद्याशङ्करके साथ उनका बहुत शास्त्रार्थ हुआ। विद्याशङ्कर अति उच्च पदपर थे, परन्तु उन्हें मध्वाचार्यके सामने झुकना पड़ा। 'सत्यतीर्थ' नामक संन्यासीके साथ श्रीमध्व बदरिका गये। वहाँ श्रीव्यासको अपने द्वारा रचित 'गीता-भाष्य' सुनाया और श्रीव्यासने उनके भाष्यको
[दायाँ स्तम्भ] सम्मति प्रदान की। श्रीव्याससे थोड़े ही समयमें उन्होंने अनेक विषयोंकी शिक्षा प्राप्त की। बदरिकासे आनन्दमठमें लौटनेके समय ही श्रीमध्वकी ब्रह्मसूत्र-भाष्य रचना पूर्ण हुई; सत्यतीर्थने उसे लिख दिया। श्रीमध्व बदरीसे गञ्जाममें गोदावरी-प्रदेशमें गये। वहाँ 'शोभन भट्ट' और 'स्वामी शास्त्री' नामक दो पण्डित उन्हें मिले। वे दोनों श्रीमध्वके शिष्य हुए और उनका नाम 'पद्मनाभ तीर्थ' और 'नरहरि तीर्थ' हुआ। उडुपीमें लौटकर एक दिन समुद्र स्नानके लिये जाते-जाते उन्होंने पाँच अध्यायोंमें 'श्रीकृष्ण' स्तोत्रकी रचना की। श्रीकृष्णके चिन्तनमें विभोर होकर वे एक दिन समुद्रके तटपर बालूके ऊपर बैठे थे। तभी उन्होंने देखा कि एक नौका जिसमें द्वारकामें व्यापारके लिये सामान जा रहा था, वह समुद्रमें फँस गयी है। नौकाको बालूमें धँसते देखकर नौकाको ऊपर उठानेके उद्देश्यसे उन्होंने वहींसे ही हाथोंसे कुछ इशारे किये और वह नौका बालूसे निकलकर तटपर आ गयी। इस सहायताके बदलेमें नाविकोंने जब उन्हें कुछ देनेकी इच्छा जतलायी, तब उन्होंने केवल नौकामें रखे हुए कुछ गोपीचन्दनको लेना स्वीकार किया। परन्तु नाविकोंने उन्हें एक बड़ा गोपीचन्दनका टुकड़ा दिया। रास्तेमें लाते-लाते 'बड़व-न्डेश्वर' नामक स्थानपर वह टूट गया और उसमेंसे एक बहुत सुन्दर 'बालकृष्णमूर्ति' उन्हें प्राप्त हुई। मूर्तिके एक हाथमें एक दही मन्थन करनेवाला दण्ड तथा दूसरे हाथमें मन्थनकी रस्सी थी। श्रीकृष्णके प्राप्त होनेपर उनके 'द्वादश स्तोत्र'के बचे हुए सात अध्याय उसी दिन ही रचित हुए। तीस बलवान व्यक्ति भी जब इस मूर्तिको नहीं उठा पाये, तब परव्योममें सर्वव्यापी वायुके, हनुमानके अथवा भीमसेनके अवतार श्रीमध्व स्वयं माधवको उठाकर उडुपीमें अपने मठमें ले गये। उनके आठ प्रधान संन्यासी-शिष्य उडुपीके आठ मठोंके अध्यक्ष थे। वृन्दावनकी आठ गोपियाँ जिस प्रकार श्रीकृष्णकी सेवा करती हैं, उसी प्रकार इन बालकृष्णकी सेवा श्रीमध्वाचार्य स्वयं और उनके बाद उत्तराढ़ी-मठोंके
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