भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1227

नौवाँ अध्याय 9/245 ] अध्यक्ष श्रीमध्वाचार्यगण आठ मठाधीश-संन्यासियोंकी सहायतासे क्रमानुसार कराते थे। आज भी वैसा ही चल रहा है। श्रीमध्वने दूसरी बार बदरिकाकी यात्रा की थी। जिस समय वे महाराष्ट्र उस समय वहाँके 'महादेव' नामक राजा अपने मजदूरोंके द्वारा जनताके उपकारके लिये तालाब खुदवा रहे थे। राजाने आदेश देकर श्रीमध्वको उनके शिष्योंके सहित मिट्टी खुदवानेके कार्यमें बलपूर्वक लगाया। किन्तु श्रीमन्मध्वाचार्य अपने प्रभावसे राजाको ही उस कार्यमें नियुक्त करके सहसा स्वयं अपने शिष्योंको लेकर आगे चल दिये। गाङ्गप्रदेशके एक ओर हिन्दु राज्य और दूसरी ओर मुसलमान राज्य था। जिस समय श्रीमन्मध्वाचार्य गाङ्गप्रदेशमें पहुँचे, उस समय इन दोनों राज्योंमें परस्पर भीषण विवाद चल रहा था, जिसके कारण नदी पार करनेके लिये नौका भी नहीं मिलती थी। नदी बहुत चौड़ी थी और विरोधी सैनिकोंने नदी पार करनेपर प्रतिबन्ध लगा रखा था। श्रीमन्मध्वाचार्य और उनके शिष्योंने उस विकट स्थितिमें एक दूसरेका हाथ पकड़कर नदीको तैरकर पार तो कर लिया, किन्तु उनके तटपर पहुँचते ही विरोधी सैनिकोंने उन्हें सताना आरम्भ कर दिया। श्रीमन्मध्वाचार्यने राजाकी अवज्ञा की थी, इसलिये वे स्वयं राजाके समक्ष उपस्थित हुए तथा उन्होंने अपनी परिस्थितिका वर्णन किया। मुसलमान राजा उनकी सौम्य मूर्तिका दर्शनकर और उनके मधुर वचनोंको सुनकर इतना मुग्ध हो गया कि उसने अपना आधा राज्य उन्हें देनेकी इच्छा प्रकट की। किन्तु श्रीमन्मध्वाचार्यने उसे स्वीकार नहीं किया। आगे चलते-चलते मार्गमें डकैतोंने उनपर आक्रमण किया, किन्तु महाबली श्रीमन्मध्वाचार्यने अनायास ही उन सभीका विनाश कर डाला। कुछ आगे जानेपर सत्यतीर्थपर एक बाघने आक्रमण कर दिया, किन्तु श्रीमन्मध्वाचार्यने बलपूर्वक उस बाघको मारकर दूर फेंक दिया। तत्पश्चात् श्रीबदरिकाश्रममें पहुँचकर उन्होंने श्रीव्यासदेवका साक्षात् दर्शन लाभ किया और उनसे अष्टमूर्ति (आठ) शालग्राम प्राप्त किये। उसके बाद ही श्रीमन्मध्वाचार्यने 'महाभारत-तात्पर्य' की रचना की। इस प्रकार श्रीमन्मध्वाचार्यके अलौकिक पाण्डित्य और भगवत्-आनुगत्यकी ख्याति भारतमें सर्वत्र फैल गयी। इसके कारण शृङ्गेरि मठाधीश शङ्कराचार्य बड़े उद्विग्न और चिन्तित हो गये। शाङ्कर-मतावलम्बी अपनी प्रतिष्ठाको नष्ट होते देखकर श्रीमध्वाचार्यके प्रति हिंसा करनेकी योजना बनाने लगे। वे मध्व-मतावलम्बियोंको समाजसे बहिष्कृत और मध्वमतको अवैदिक और शास्त्र-विरोधी सिद्ध करनेका प्रयास करने लगे। शृङ्गेरि मठके मठाधीश पद्मतीर्थने पुण्डरीकाक्ष-पुरी नामक एक शाङ्कर-मतावलम्बी पण्डितको लेकर श्रीमन्मध्वाचार्यके साथ शास्त्रार्थ कराया। श्रीमध्वाचार्यके द्वारा संगृहीत एवं रचित ग्रन्थोंको भी चोरी करवा लिया। इस घटनासे श्रीमध्व और उनके शिष्योंको बहुत कष्ट हुआ। परन्तु कुम्लाधि देशके राजा श्रीजयसिंहकी सहायतासे श्रीमध्वाचार्यको वे ग्रन्थ पुनः प्राप्त हो गये। विष्णुमङ्गल निवासी देश-प्रसिद्ध पण्डित त्रिविक्रमाचार्यको शास्त्रयुक्तिके द्वारा वाद-विवादमें पराजितकर श्रीमध्वाचार्यने उसे अपने शिष्यके रूपमें ग्रहण किया। पण्डित त्रिविक्रमाचार्यके पुत्र कविवर श्रीनारायणाचार्य ही 'श्रीमध्वविजय' ग्रन्थके रचयिता हैं। पिताके परलोक सिधारनेके बाद उनके छोटे भाईने भी संन्यास ग्रहण किया और उनका नाम 'विष्णुतीर्थ' हुआ। श्रीपूर्णप्रज्ञके शारीरिक बलकी भी कोई सीमा नहीं थी। 'कड़ञ्जरी' नामक एक बलवान् पुरुष अपनेको तीस व्यक्तियोंके समान बलशाली समझकर बहुत ही अभिमान करता था। श्रीमध्वाचार्यने अपने पैरके अङ्गुठेको भूमिमें लगाकर कड़ञ्जरीसे उसे हिलानेके लिए कहा, किन्तु वह अपने सम्पूर्ण बलका प्रयोग करनेपर भी उसे टससे मस नहीं कर सका। एक समय कादुर जिलेके मुदगेरी गाँवमें नदी अपने तटको तोड़कर बहुत-से भूभागको नष्ट कर रही थी। अतः नदीके । 379