भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1228

[ 9/245 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला वेगको कम करनेके लिये हजारसे भी अधिक व्यक्ति एक साथमें मिलकर एक विशाल शिला लानेकी चेष्टा कर रहे थे। जब बहुत प्रयास करनेपर भी वे सफल नहीं हुए और उन्हें वह शिला बीच मार्गमें ही छोड़नी पड़ी। तब महाबली श्रीमध्वाचार्यने एक हाथसे अनायास ही उस शिलाको उठाकर ठीक स्थानपर ले जाकर स्थापित कर दिया। इसलिये आज भी वहाँ उस विशाल शिलापर लिखा है—'श्रीमध्वाचार्यके एक हाथसे लायी गयी स्थापित शिला।' किसी समय श्रीमध्वाचार्य एक बहुत ही कमजोर शरीरवाले बालकके कन्धेपर चढ़कर घूम रहे थे, उस समय उस बालकको उनके भारका बिल्कुल भी पता नहीं चला। अपने शिष्योंके सामने ऐतरेयोपनिषद्-भाष्यकी व्याख्या करते-करते उन्नासी वर्षकी आयुमें माघी-शुक्ला-नवमी तिथिमें श्रीमध्याचार्यने परलोकमें गमन किया। विशेष विवरण जाननेके लिये श्रीमध्व-शिष्य त्रिविक्रमाचार्यके पुत्र नारायण-पण्डितके द्वारा रचित 'मध्वविजय' ग्रन्थ देखें। उक्त ग्रन्थका एक संक्षिप्त विवरण (मञ्जुषा समाहृति-द्वितीय संख्यामें) देखें। श्रीमाध्व-तत्त्ववाद-सम्प्रदायके आचार्यगण उडुपि ग्रामके मूल माधवमठको 'उत्तरराढ़ी मठ' कहते हैं। उडूपीके आठ मठोंके मूल-आचार्यों और मठसमूहोंके नाम, जैसे-

  1. विष्णु-तीर्थ-शोद मठ,
  2. जनार्दन-तीर्थ-कृष्णपुर मठ,
  3. वामन-तीर्थ-कनुर मठ,
  4. नरसिंह-तीर्थ-अधमर मठ,
  5. उपेन्द्र-तीर्थ-पुत्तुगी मठ
  6. राम-तीर्थ-शिरुर मठ
  7. हृषीकेश-तीर्थ-पलिमर मठ,
  8. अक्षोभ्य-तीर्थ-पेजावर मठ। वहाँकी गुरु और काल परम्परा; जैसे-
  9. हंस परमात्मा, 2) चतुर्मुख ब्रह्मा, 3) सनकादि,
  10. दुर्वासा, 5) ज्ञाननिधि, 6) गरुड़वाहन, 7) कैवल्यतीर्थ,
  11. ज्ञानेशतीर्थ, 9) परतीर्थ, 10) सत्यप्रज्ञतीर्थ, 11) प्राज्ञतीर्थ, 12) अच्युतप्रेक्षाचार्य तीर्थ, 13) श्रीमध्वाचार्य-1040 शक, 14) पद्मनाभ-1120 शक, नरहरि-1127 शक, माधव-1136 शक और अक्षोभ्य-1159 शक, 15) जयतीर्थ-1167 शक, 16) विद्याधिराज-1190 शक,
  12. कवीन्द्र-1255 शक, 18) वागीश-1261 शक,
  13. रामचन्द्र-1269 शक, 20) विद्यानिधि-1298 शक,
  14. श्रीरघुनाथ-1366 शक, 22) रघुवर्य (महाप्रभुके साथ वाद करनेवाले)-1424 शक, 23) रघुत्तम-1471 शक, 24) वेदव्यास-1517 शक, 25) विद्याधीश-1541 शक, 26) वेदनिधि-1553 शक, 27) सत्यव्रत-1557 शक, 28) सत्यनिधि-1560 शक, 29) सत्यनाथ-1582 शक, 30) सत्याभिनव-1595 शक, 31) सत्यपूर्ण-1628 शक, 32) सत्यविजय-1648 शक, 33) सत्यप्रिय- 1659 शक, 34) सत्यबोध-1666 शक, 35) सत्यसन्ध-1705 शक, 36) सत्यवर-1716 शक, 37) सत्यधर्म-1719 शक, 38) सत्यसङ्कल्प-1752 शक,
  15. सत्यसन्तुष्ट-1763 शक, 40) सत्यपरायण-1763 शक, 41) सत्यकाम-1785 शक, 42) सत्येष्ट- 1793 शक, 43) सत्यपराक्रम-1794 शक, 44) सत्यधीर- 1801 शक, 45) सत्यधीर तीर्थ-1808 शक।
  16. संख्यावाले श्रीविद्याधिराज तीर्थसे और एक शिष्य धारा प्रारम्भ होती है, जो इस प्रकार है-17) राजेन्द्रतीर्थ-1254 शक, 18) विजयध्वज, 19) पुरुषोत्तम,
  17. सुब्रह्मण्य, 21) व्यासराय-1470-1520 शक। इस मठकी परम्पराक्रमसे वर्तमान समय तक और भी उन्नीस व्यक्ति श्रीमाधव-तीर्थ-संन्यासी हुए हैं।
  18. रामचन्द्र तीर्थकी एक और शिष्य धारा-20) विबुधेन्द्र-1218 शक, 21) जितामित्र-1348 शक, 22) रघुनन्दन, 23) सुरेन्द्र, 24) विजेन्द्र, 25) सुधीन्द्र, 26) राघवेन्द्रतीर्थ-1545 शक। इस 'पर-मठ'में आज तक और भी चौदह व्यक्ति श्रीमाधव-तीर्थ-संन्यासी हुए हैं। 380 ।