भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1234

[ 9/270-275 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला इन्द्रियोंको सुखी करनेकी इच्छा है। इस इच्छापूर्तिके लिये की जाने वाली चेष्टा ही 'मत्सरता' अथवा 'ईर्ष्या' है। केवलमात्र नारायणपरायण अर्थात् शुद्धभक्त ही 'अभय' प्राप्त करके कह सकते हैं,- 'नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति' (छाःउः 8/9/1); इसलिये स्वर्ग, नरक अथवा मोक्ष, सभी उनके लिये 'द्वितीय' अथवा अनात्म-विषय है, इसलिये अप्रिय है॥270॥ कर्म और ज्ञान-शुद्धभक्तिके प्रतिकूल, इसलिये 'साधन' और 'साध्य' नहीं :- मुक्ति, कर्म-दुइ वस्तु त्यजे भक्तगण। सेइ दुइ स्थाप' तुमि 'साध्य', 'साधन'॥ 271॥ अनुवाद-मुक्ति और कर्म-दोनोंको ही भक्तगण त्याग देते हैं और उन्हींको आप 'साध्य' एवं 'साधन'के रूपमें स्थापित कर रहे हैं॥ 271॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे तत्त्ववादाचार्य, शुद्धभक्तमात्र ही 'मुक्ति' और 'कर्म'-इन दोनोंका परित्याग कर देते हैं। दुःखकी बात यह है कि आपने उसी मुक्तिको 'साध्य' और कर्मको 'साधन' कहकर स्थापित किया है॥ 271॥ अनुभाष्य-श्रीकुलशेखर द्वारा रचित 'मुकुन्द माला' स्तोत्रमें- “नाहं वन्दे पदकमलयोर्द्वन्द्वमद्वन्द्वहेतोः, कुम्भीपाकं गुरुमपि हरे नारकं नापनेतुम्। रम्या-रामा-मृदुतनुलता-नन्दने नाभिरन्तुं, भावे भावे हृदय भवने भावयेयं भवन्तम्॥” “नास्था धर्मे न वसुनिचये नैव कामोपभोगे, यद्यद्भव्यं भवतु भगवन् पूर्वकर्मानुरूपम्। एतत् प्रार्थ्यं मम बहुमतं जन्मजन्मान्तरेऽपि, त्वत्पादाम्भोरुहयुगगता निश्चला भक्तिरस्तु॥” अर्थात् “हे कृष्ण! मैं मुक्तिके लिये आपके चरणयुगलकी वन्दना नहीं कर रहा हूँ, अथवा कुम्भीपाक नरक या उससे भी भयङ्कर नरकसे छुटकारा पानेके लिये वन्दना नहीं कर रहा हूँ, अथवा स्वर्गमें नन्दनकाननमें देव-रमणियोँकी सुकोमल देहलताके साथ रमण करनेके लिये स्तुति नहीं कर रहा हूँ, केवल भावके प्रत्येक स्तरमें विलास करनेके लिये ही हृदयमन्दिरमें आपके चरणकमलोंकी चिन्ता करता हूँ। हे भगवन्, पाप-पुण्यात्मक धर्म अथवा धन-रत्नोंमें, यहाँ तक कि कामके उपभोगमें मेरी कुछ भी आकाङ्क्षा नहीं है। पूर्व कर्मानुसार मेरा जो कुछ भी होना है, वह हो। केवलमात्र मेरी यही विनम्र प्रार्थना है, आपके चरणकमलयुगलकी भक्ति मेरे हृदयमें जन्मजन्मान्तरमें अचल होकर अवस्थान करे॥”271॥ तत्त्वाचार्यके भ्रमके लिये मानद महाप्रभुका आक्षेप :- संन्यासी देखिया मोरे करह वञ्चन। ना कहिला तेजि साध्य-साधन-लक्षण॥"272॥ अनुवाद-मुझे संन्यासी देखकर आप मेरी वञ्चना कर रहे हैं, इसलिये आपने साध्य-साधनका वास्तविक लक्षण मुझे नहीं बतलाया॥"272॥ तत्त्वाचार्यको लज्जा और महाप्रभुकी महिमा-उपलब्धि :- शुनि' तत्त्वाचार्य हैला अन्तरे लज्जित। प्रभुर वैष्णवता देखि' हइला विस्मित॥ 273॥ अनुवाद-महाप्रभुके वचनोंको सुनकर तत्त्वाचार्य हृदयमें बहुत लज्जित हुए और साथ ही महाप्रभुकी वैष्णवताको देखकर बहुत विस्मित हुए॥ 273॥ अनुभाष्य- 'तत्त्वाचार्य'-उत्तरराढ़ी मठकी गुरुपरम्परा (247 संख्याका अनुभाष्य देखें) से जाना जाता है कि श्रीमहाप्रभुके समयमें वहाँ श्रीरघुवर्यतीर्थ मध्वाचार्य थे॥ 273॥ तत्त्वाचार्यके द्वारा महाप्रभुके मतको स्वीकार करना :- आचार्य कहे,-"तुमि येइ कह, सेइ सत्य हय। सर्वशास्त्रे वैष्णवेर एइ सुनिश्चय॥ 274॥ आनन्दतीर्थकी आज्ञाके अनुसार तत्त्ववाद-सम्प्रदायमें कर्ममिश्रा-भक्तिका प्रचलन :- तथापि मध्वाचार्य ऐछे करियाछे निर्बन्ध। सेइ आचरिये सबे सम्प्रदाय-सम्बन्ध॥"275॥ 386 ।