भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1233, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1233

नौवाँ अध्याय 9/268-270 ] (ऐश्वर्यसम्पत्ति), सारूप्य (चतुर्भुजाकार), सामीप्य (निकटवास) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति) प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते, क्योंकि मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी अभिलाषा नहीं है ॥ 268 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/207 संख्या देखें ॥ 268 ॥ येषां तेषां) महतां अभवः (अपौनर्भवः मोक्षः) अपि फल्गुः (तुच्छः एव)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 269 ॥ शुद्धवैष्णवके लिये दुष्कर्मका फल नरक, सुकर्म या स्वधर्मका फल स्वर्ग एवं ज्ञानका फल मोक्ष—सभी एक समान :- श्रीमद्भागवत (6/17/28)— नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति। स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिनः ॥ 270 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 270 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वर्ग, अपवर्ग (मुक्ति) और नरकको एक समान देखनेवाले नारायण-भक्त किसीसे भी भयभीत नहीं होते ॥ 270 ॥ शुद्धभक्तके लिये मोक्ष भी तुच्छ :— श्रीमद्भागवत (5/14/44)— यो दुस्त्यजान् क्षितिसुतस्वजनार्थदारान् प्रार्थ्यां श्रियं सुरवरैः सदयावलोकाम्। नैच्छन्नृपस्तदुचितं महतां मधुद्विट्- सेवानुरक्तमनसामभवोऽपि फल्गुः ॥ 269 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 269 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अपरित्यज्य (बहुत कठिनाईसे परित्याग किये जा सकनेवाले) सम्पत्ति, पुत्र, स्वजन, अर्थ और पत्नी एवं [यहाँ तक कि] प्रधान-प्रधान देवता भी जिसके लिये प्रार्थना करते हैं, ऐसी दया-दृष्टिसे युक्त राज्यलक्ष्मी तककी भी भरत-महाराजने अभिलाषा नहीं की, वह उनके लिये उचित ही था; क्योंकि उनके जैसे श्रीकृष्णसेवामें अनुरक्त चित्तवाले साधुओंके लिये जब निर्वाणमुक्ति भी तुच्छ है, तब पार्थिव (जड़ीय) सुखकी तो बात ही नहीं है ॥ 269 ॥ अनुभाष्य—परमहंस शम्भुकी अवज्ञा करनेवाले चित्रकेतुको पार्वतीका 'वृत्रासुरके रूपमें जन्म ग्रहण करो' ऐसा कहकर अभिशाप देनेपर साधु चित्रकेतुने मस्तक झुकाकर उस शापको ग्रहण किया। फिर पार्वती-शम्भु, दोनोंको प्रसन्न करके उन्होंने अपने स्थानके लिये प्रस्थान किया। इसे देखकर परमवैष्णव शम्भु पार्वतीको विष्णुभक्तोंके आचरण और स्वभावका वर्णन कर रहे हैं— सर्वे नारायणपराः (विष्णुभक्ताः) कुतश्चन न बिभ्यति (अकुतोभयाः इत्यर्थः); (यतः ते) स्वर्गापवर्गनरकेषु (सुखधामस्वर्गमोक्षेषु क्लेशधामनरकादिषु) अपि तुल्यार्थदर्शिनः (तुल्यः अर्थः प्रयोजनमिति द्रष्टुं शीलं येषां ते तथा तुल्यफलद्रष्टार इत्यर्थः)। अनुभाष्य—श्रीशुकदेवके द्वारा महाराज परीक्षितके समक्ष महाभागवत भरतके शुद्ध भगवद्भक्तजनरूप गुण-महिमाका कीर्तन— यः नृपः (राजर्षिः भरतः) दुस्त्यजान् (दुष्परिहरान्) क्षितिसुतस्वजनार्थदारान् (भूमिपुत्रबन्धुद्रविणकलत्रादीन्) सुरवरैः (देवश्रेष्ठैरपि) प्रार्थ्यां (प्रार्थनीयां) श्रियं (लक्ष्मीं) सदयावलोकां (भरतस्य दया यथा भवत्येवमवलोको यस्या इति, यद्वा, भरतो वैराग्यात्यर्थं शारीरकष्टं मा स्वीकरोतु, मया लाल्यमानो गृहे एव तिष्ठतु, इति सद्योऽवलोको यस्यास्तां) न ऐच्छत् इति यत्, तत् (श्रियाम् औदासीन्यं) उचितमेव; [यतः] मधुद्विट्-सेवानुरक्तमनसां (मधुद्विषः सेवायाम् अनुरक्तं मनो श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इस श्लोकमें “कुतश्चन न बिभ्यति” अर्थात् ‘अकुतोभय’ शब्दमें जिस ‘भय’का उल्लेख किया गया है, वह द्वितीयाभिनिवेश (‘द्वितीय’ अर्थात् अद्वयज्ञान-श्रीकृष्ण अथवा सेव्य-चैतन्य वस्तुके अतिरिक्त अन्य प्रतीत होनेवाली जो माया है, उसमें अभिनिवेश, इन्द्रिय-सुखकर भोग) से उत्पन्न है—(भाः 11/2/37, वृःआःउः 1/4/2)। यह भोग ही 'काम' अर्थात् स्वार्थ कहलानेवाली अपनी । 385

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