श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1235, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय 9/274-277 ] अनुवाद—तत्त्वाचार्यने कहा,–“यद्यपि आप जो कह रहे हैं, वही सत्य है और वैष्णवोंके सभी शास्त्रोंने यही सुनिश्चित किया है, तथापि श्रीमध्वाचार्यने जो शिक्षा-निर्देश किया है, हम सम्प्रदायके सम्बन्धसे उसीका ही आचरण करते हैं॥ 274-275॥ अनुभाष्य—सदाचार स्मृतिमें— “धर्मेणेज्यासाधनानि साधयित्वा विधानतः। सर्ववर्णाश्रमैर्विष्णुरेक एवेज्यते सदा॥ आनन्दतीर्थमुनिना व्यासवाक्य-समुद्गताः। सदाचारस्य विषये कृताः संक्षेपतः शुभा॥” अर्थात् “सभी वर्ण ओर सभी आश्रम पूजा-साधनोंको धर्मके साथ यथाविधि सम्पादन करके एकमात्र विष्णुकी ही आराधना करते थे। श्रीमत् आनन्दतीर्थ-मुनिने सदाचार विषयक व्यासवाक्यसमूह संग्रह करके संक्षिप्तरूपमें मङ्गलकारिणी स्मृतिको लिखा॥ 275॥ महाप्रभुके द्वारा कर्मी और ज्ञानीका अनादर :- प्रभु कहे,—“कर्मी, ज्ञानी,—दुइ भक्तिहीन। तोमार सम्प्रदाये देखि सेइ दुइ चिह्न ॥ 276 ॥ उपास्यके सविशेषत्व अथवा चिद्विलासको स्वीकार करनेके फलस्वरूप तत्त्ववादीकी वैष्णवता :- सबे, एक गुण देखि तोमार सम्प्रदाये। 'सत्यविग्रह ईश्वरे', करह निश्चये ॥” 277 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“कर्मी और ज्ञानी,– दोनों ही भक्तिहीन हैं। और आपके सम्प्रदायमें मैं ये दोनों चिह्न देख रहा हूँ। तो भी, आपके सम्प्रदायमें एक गुण देखता हूँ,—आप ईश्वरके श्रीविग्रहको सत्य मानते हैं॥” 276-277 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा,—“ओहे तत्त्ववादी आचार्य, तुम्हारे सम्प्रदायके सभी सिद्धान्त प्रायः शुद्धभक्तिके विरुद्ध हैं, तथापि ईश्वरके सत्य और नित्य विग्रहको स्वीकार करनेवाला एक महान गुण मैं तुम्हारे सम्प्रदायमें देख रहा हूँ। तात्पर्य यह है कि मेरे परमगुरु श्रीमाधवेन्द्रपुरीने इस प्रधान सिद्धान्तके आधारपर माध्व-सम्प्रदायको स्वीकार किया था॥ 277 ॥ अमृतानुकणा—श्रीचैतन्य महाप्रभुने उडुपी ग्राममें स्थित मूल माध्वमठके तत्कालीन तत्त्ववादी आचार्य श्रीरघुवर्यतीर्थके द्वारा कहे गये साध्य-साधन-विचारका खण्डन किया था। इसलिये और विशेषतः, महाप्रभुने उन आचार्यको 'तुम्हारे सम्प्रदाय' शब्द जो कहा था, इसके द्वारा कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि, श्रीमन्महाप्रभु श्रीमध्व-सम्प्रदायमें नहीं है। वे लोग श्रीमन्महाप्रभु और रघुवर्यतीर्थकी वार्त्तालापसे इस प्रकार विचार निकालते हैं,—“श्रीमध्वाचार्यके मतसे कर्मार्पण 'साधन' है और ज्ञानमार्गके द्वारा मुक्ति 'साध्य' है। इसलिये उसमें भक्तिहीन कर्म और ज्ञानके चिह्न रहनेसे वह श्रीमन्महाप्रभुके द्वारा प्रदर्शित शुद्धभक्तिरूप 'साधन' और कृष्णप्रेम-रूप 'साध्य'के विचारसे सम्पूर्ण रूपसे पृथक् है। इसलिये श्रीमहाप्रभु स्वयं ही पृथक् साध्य-साधन-विचारसम्पन्न एक पाँचवें सम्प्रदायके प्रवर्त्तक हैं।” सम्प्रदाय-विज्ञान- वैभव-सम्बन्धमें अनभिज्ञ व्यक्तिकी इस प्रकारकी भावना अस्वाभाविक नहीं है। श्रीमध्व-मतके कनिष्ठ अधिकारी साधकके लिये प्रारम्भिक अवस्थामें श्रीकृष्णमें अपने कर्म अर्पण करनेकी बात स्वीकृत होनेपर भी निर्मल भक्ति ही प्रधान साधन रूपमें स्थापित हुई है। देहधर्ममें आसक्त फलभोगकी आकाङ्क्षा करनेवाले जीव 'कर्मी' होते हैं। उन्हें श्रीकृष्णके प्रति उन्मुख करनेके लिये प्रारम्भिक अवस्थामें श्रीकृष्णको कर्म अर्पण करनेके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। इसलिये श्रीमध्वाचार्यने भक्तिके अधीन और शुद्ध-भगवद्-ज्ञानके अनुकूल कर्मको सामान्यभावसे स्वीकार किया था। “ॐ सहकारित्वेन चॐ” (ब्रह्मसूत्र 3/4/33)— इसके भाष्यमें उन्होंने लिखा है,—“यथा राज्ञः सहकार्ये मन्त्री तथा ऋतेऽत्र क्षितिपः कार्यमृच्छेत्। एवं ज्ञानं कर्म बिनापि कार्यं सहायभूतं न विचारः कुतश्चिदिति कमठश्रुतौ सहकारित्वोक्तेश्च।” तात्पर्य यह है कि, जिस प्रकार राजाके कर्मसचिव-रूपमें मन्त्री वर्तमान रहते हैं, किन्तु राजा मन्त्रीके अतिरिक्त भी स्वयं कार्य-सम्पादन करनेमें समर्थ है, उसी प्रकार । 387