श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 9/276 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ] शुद्ध-भगवद्-ज्ञान भी कर्मके बिना मोक्ष प्रदान करनेमें समर्थ होनेपर भी किसी-किसी स्थानमें कर्म-ज्ञानके कर्मसचिव रूपमें स्वीकृत हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि श्रीमध्वपादने कर्मको मुख्य रूपमें मुक्तिका उपाय या ‘साधन' कहकर स्वीकार नहीं किया गया है। उसे गौण कर्म-निर्वाहक मन्त्रीका आसन मात्र दिया है। श्रीमद्भागवतके मतके साथ इस मतका कोई विरोध नहीं है, इसे भागवतके (10/47/24) श्लोककी आलोचनाके द्वारा यह समझा जा सकता है-“दान-व्रत-तपो-होम-जप- स्वाध्याय-संयमैः। श्रेयोभिर्विविधैश्चान्यैः कृष्णे भक्तिर्हि साध्यते॥” अर्थात् “जीव इस जगत्में दान, व्रत, तपस्या, होम, जप, वेद अध्ययन, संयम और अन्यान्य अनेक प्रकारके मङ्गल-अनुष्ठानके द्वारा श्रीकृष्णभक्तिकी साधना करते हैं।” तथापि अपनी इन्द्रियोंके सुखके लिये विष्णुके उद्देश्यसे अनुष्ठित जो याज्ञ, यज्ञादि हैं, उस प्रकारके कर्म गौणरूपमें भी भक्तिके सचिव नहीं हो सकते। कर्म साधारणतः ही अपनी इन्द्रियोंके सुखके लिये किये जाते हैं, इसलिये श्रीमन्महाप्रभुने कहा है,—“कर्मनिन्दा, कर्मत्याग-सर्वशास्त्रे कहे॥” किन्तु, जो कर्म धर्मके उद्देश्यसे किये जाते हैं और जिस धर्मका पालन वैराग्यके उद्देश्यसे किया जाता है और जो वैराग्य भगवान्के चरणकमलोंकी सेवाके लिये ही होता है, वह गौणरूपमें अभिधेय हो सकता है। श्रीमध्वाचार्यने इस प्रकारके कर्मको ही मात्र भक्तिके सचिवका आसन प्रदान किया है। जो परमार्थके उद्देश्यसे नहीं किया जाता, ऐसे कर्म निन्दनीय और वर्जनीय हैं। इस बातको उन्होंने ब्रह्मसूत्र (3/3/50)के भाष्यमें स्पष्ट रूपसे निर्देश किया है,—“कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते। तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥” अर्थात् “कर्मसे जीव बँधता है और विद्याके द्वारा मुक्त होता है, इसलिये पारदर्शी यतिगण कर्म नहीं करते।” श्रीमध्वाचार्यके मतमें अमला भक्तिही एकमात्र ‘साधन' रूपमें विवेचित हुई है। मध्व-सम्प्रदायमें सुप्रचलित, संक्षिप्त मध्वमत-प्रकाशक एक श्लोकमें यह व्यक्त हुआ
[दायाँ स्तम्भ] है। जैसे-“श्रीमध्वमते हरिः परतरः सत्यं जगत् तत्त्वतो, भेदो जीवगणा हरेरनुचरा नीचोच्चभावं गताः। मुक्तिर्नैजसुखानुभूतिरमला भक्तिश्च तत्साधनं, ह्यक्षादि त्रितयं प्रमाणमखिलाम्नायैकवेद्यो हरिः ॥” अर्थात् “श्रीमध्वके मतसे हरि ही सर्वश्रेष्ठ तत्त्व हैं, वस्तुतः जगत् सत्य है, जीवका भगवान्से नित्य भेद है और वह उनका नित्य दास है तथा जीव संसारमें उच्च-नीच गतिको प्राप्त करता रहता है। निज आनन्द (हरिदास्य)की अनुभूति ही मुक्ति है और अमला भक्ति ही उसका साधन है। प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द-ये तीन ही प्रमाण हैं और समस्त आम्नाय धाराके (गुरु-परम्पराके) द्वारा श्रीहरि ही जानने योग्य हैं।” इस श्लोकके ही अनुरूप एक श्लोक-“श्रीमध्वः प्राह विष्णुं परतमम्” अर्थात् “श्रीमध्वने कहा विष्णु ही परम तत्त्व हैं।” श्रीप्रमेय-रत्नावली-ग्रन्थमें श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभुने प्रकाश करके श्रीमध्वमत और श्रीचैतन्यमतका अभेद दिखलाया है। श्रीमन्मध्वने अपने विभिन्न भाष्योंमें श्रवण- कीर्त्तन-लक्षणा भक्तिको ही मुख्य साधनरूपमें बार-बार घोषित किया है। जैसे (मुण्डकोपनिषद्-भाष्यमें उद्धृत नारायणसंहिता-वचन)—द्वापरीयैर्जनैर्विष्णुः पञ्चरात्रैस्तु केवलैः। कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः॥” अर्थात् “द्वापरमें पञ्चरात्र विधिके अनुसार विष्णुकी आराधना होती है, किन्तु कलियुगमें केवल नामके द्वारा ही भगवान्की पूजा होती है।"; (3/3/53 सूत्रभाष्य)—“भक्तिरेवैनं दर्शयति, भक्तिवशः पुरुषो, भक्तिरेव भूयसीति माठर श्रुतेः।” (माठर श्रुतिमें कहा है-भक्ति ही भगवान्के दर्शन कराती है, भगवान् भक्तिके द्वारा ही वशीभूत होते हैं और शास्त्रोंमें सर्वत्र ही भक्तिकी महिमाका गान किया गया है)।; (महाभारत-तात्पर्य 1/118)—“भक्त्यैव तुष्टिमभ्येति विष्णुर्नान्येन केनचित्। स एव मुक्तिदाता च भक्तिस्तत्रैव कारणम्॥” अर्थात् “भक्तिसे ही विष्णु सन्तुष्ट होते हैं, उनके सन्तोष अन्य कोई कारण नहीं है। वे ही मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं और भक्ति ही मुक्तिका कारण है।”
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