श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय 9/276 ]
इस प्रकारसे उन्होंने बार-बार विभिन्न शास्त्रवचनोंको उद्धृत करके यह बतलाया कि 'भक्ति'के अतिरिक्त साध्य-मुक्ति प्राप्त करनेका अन्य कोई उपाय नहीं है।
श्रीमध्वमतमें जिस मुक्तिको 'साध्य'रूपमें निर्णीत किया गया है, वह पाँच प्रकारकी मुक्तियोंके अन्तर्गत जीव-परमात्मैक्य-रूपा सायुज्य मुक्ति नहीं है। यदि वे जीव और परमात्माका ऐक्य ही स्वीकार करेंगे, तब उन्हें शुद्धद्वैतवादी या नित्य पञ्चभेदवादी कहनेके बदले भास्कर-भट्टादिके जैसे औपचारिक भेदवादी कहना होगा। श्रीमध्वाचार्यने जीवोंको श्रीहरिका नित्य सेवक कहा है। मुक्तावस्थामें भी जीव और ईश्वरके भेद और जीवकी ईश्वर-उपासनाकी बात उन्होंने उच्चस्वरसे घोषित की है।
“न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिता इत्यादि श्रुति-स्मृतिषु तात्पर्यं मुक्तानां भेदस्यैवोक्तेः।” (छान्दोग्य-भाष्य छठे अः)—अर्थात् जिस स्थानमें दूसरोंकी बात तो दूर रहे, स्वयं माया भी जहाँ प्रवेश नहीं कर सकती, वहाँ देवासुरादि समस्त जीवोंके पूजनीय हरिसेवकगण अवस्थान करते हैं, इत्यादि श्रुति-स्मृतिका तात्पर्य यह है कि सर्वत्र ही मुक्तजीव भगवान्से भिन्न हैं। “कृष्णोमुक्तैरिज्यते वीतमोहैः” (महाभारत तात्पर्य 2/62)—अर्थात् मोहरहित मुक्तगणोंके द्वारा श्रीकृष्ण पूजित होते हैं। “मुक्ता अपि हि कुर्वन्ति स्वेच्छयोपासनं हरे ॥” (सूत्रभाष्य 3/3/27); “मुक्तानामपि भक्तिर्हि नित्यानन्द-स्वरूपिणी” (मः भाः 1/105) आदि वाक्योंमें मुक्तगणोंकी भी श्रीहरि-उपासना और भक्ति, जो मुक्तगणोंकी नित्य आनन्दस्वरूपिणी है, वह प्रकाशित हुई है। “भेद व्यपदेशाच्च” ब्रह्मसूत्र (1/1/17)के भाष्यमें भी उन्होंने श्रीमद्भागवत-सिद्धान्तसे ही मुक्तिका (आत्माके) स्वरूप-रूपमें वर्णन किया है,—“मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः” (भाः 2/10/6) अर्थात् मायिक, स्थूल-सूक्ष्मरूप दोनोंका परित्याग करके शुद्धजीव-स्वरूपमें अर्थात् भगवद्-पार्षदरूपमें अवस्थानका नाम ही मुक्ति है। यहाँ तक कि, उक्त मतमें मुक्ति और मुक्तजीवोंके मध्यमें भी तारतम्य और आनन्दका तारतम्य स्वीकृत हुआ है; (संक्षिप्त मध्वमत)—“जीवगणा हरेरनुचरा नीचोच्चभावं गताः” अर्थात् “जीव हरिका नित्य दास है तथा जीव संसारमें उच्च-नीच गतिको प्राप्त करता रहता है।"; (सूत्रभाष्य 3/3/33)—“मुक्तावानन्दो विशिष्यते” अर्थात् “मुक्तिमें आनन्द एक विशेष वस्तु है।”
इसलिये मायावाद-दलन चिह्न उठानेवाले श्रीमध्वपादने जिस मुक्तिको साध्य कहकर निर्णीत किया है, वह नितान्त ही भक्तिपरक और श्रीमद्भागवत-विचारपरक है, उसमें कोई ज्ञान-दोष नहीं है। श्रील बलदेव विद्याभूषण प्रभुने श्रीमध्वाचार्यके द्वारा कही गयी उक्त मुक्तिको “मोक्षं विष्ण्वङ्घ्रिलाभं।” अर्थात् श्रीविष्णुके चरणकमलोंकी प्राप्ति कहकर वर्णित किया है। घीमें जिस प्रकार दूधकी मौलिकता होती है अर्थात् दूध जैसे घीका मूल है, उसी प्रकार श्रीगौरसुन्दरके द्वारा प्रचारित साध्य-सार प्रेमके मध्यमें भी श्रीमध्व-प्रतिपाद्य 'साध्य' श्रीविष्णुके चरणकमल प्राप्तिरूपा मुक्ति भी ग्रथित है।
श्रीमध्वाचार्यकी परम्परामें तत्त्ववादी-आचार्य रघुवर्यतीर्थकी या उनके अनुगत शिष्यवर्गकी अथवा परवर्ती तत्त्ववादियोंकी विचारधारामें कालक्रमसे श्रीमध्वाचार्यके वास्तविक मतसे अनेक भेद आ गये हैं, यह श्रीमध्वाचार्यकी लेखनी और आधुनिक तत्त्ववादियोंकी आचार-प्रचार लेखनीपर विचार करके अच्छी तरहसे समझा जा सकता है। इसलिये परवर्त्ती विकृत मतको मूल-आचार्यका सिद्धान्त कहकर स्थापित नहीं किया जा सकता। श्रीमन्महाप्रभुने मध्व-सम्प्रदायको स्वीकार करके भी उक्त तत्त्ववादि-आचार्यको “तुम्हारे सम्प्रदाय” कहकर जो कहा, उससे उक्त तत्त्ववादि-महाशय मूल 'मध्व-सम्प्रदाय'की धारासे बहुत दूर होकर स्वतन्त्र हो गये हैं, वही सूचित हुआ है।
उन्होंने उक्त वाक्यके द्वारा उस तत्त्ववादि-आचार्यको इस प्रकार समझाया,—“मेरा अभिप्रेत और स्वीकृत जो मध्व-सम्प्रदाय है, तुमने उसके वास्तविक तात्पर्यको न समझकर केवल बाहरी-मतजालमें आबद्ध होकर एक
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