भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1238, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1238

[ 9/276–280 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पृथक् सम्प्रदायकी सृष्टि की है, —उसमें एक भगवद्- विग्रहकी सत्यताको स्वीकार करना छोड़कर और कोई भी शुद्ध वैष्णव-सिद्धान्त नहीं देखा जाता। इसलिये तुम्हारे कल्पित इस सम्प्रदायके साथ व्यास-शिष्य श्रीमद्धका और मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है।” ‘आउल’, ‘बाउल’, ‘प्राकृतिक सहजिया’ आदि गोष्ठी अपना परिचय महाप्रभुके अनुगत और गौड़ीय वैष्णव-सम्प्रदायके रूपमें देते हैं। किन्तु ऐसा कहनेसे उनके अपसिद्धान्तको महाप्रभुके द्वारा प्रचारित मत नहीं कहा जा सकता। बल्कि कोई उक्त अपसिद्धान्तोंका खण्डन करके यह कहे कि उसने महाप्रभुके मतका खण्डन किया है, तो इस प्रकारका विचार नितान्त अयुक्तिपूर्ण है। इसी प्रकार तथाकथित तत्त्ववादियोंके अपसिद्धान्तका महाप्रभुके द्वारा शास्त्रयुक्तिसे खण्डन करनेकी बात कहकर कि महाप्रभुने चार-सात्वत- सम्प्रदायोंके एक मुख्य पूर्वाचार्य श्रीमद्धके प्रवर्त्तित श्रौतमतका खण्डन किया है, इसलिये उन्होंने कभी भी श्रीमध्व सम्प्रदायको स्वीकार नहीं किया—इस प्रकारकी युक्ति नितान्त बालभाष्य है अर्थात् बालककी वाणी है॥ 276 ॥ फल्गुतीर्थमें आगमन :— एइमत ताँर घरे गर्व चूर्ण करि’। फल्गुतीर्थे तबे आइला श्रीगौरहरि ॥ 278 ॥ अनुवाद—इस प्रकार उनके गर्वको चूर्ण करके तब श्रीगौरहरि फल्गुतीर्थमें आये॥ 278 ॥ अनुभाष्य—‘ताँर घरे’—अर्थात् ‘उनके’; आज तक भी हावड़ा-आमता लाईन पर ‘माजु’ आदि स्थानों पर एवं वर्द्धमान-काटोयाकी ओर ‘तत्’ ‘युष्मद्’ और ‘अस्मद्’ शब्दके कर्मकारकमें द्वितीया विभक्तिके एक वचनमें और बहुवचनमें चलित भाषामें सम्बन्ध-विभक्ति ‘र’के साथ ‘घरे’ शब्दका व्यवहार प्रसिद्ध है। जैसे—‘तादेर घरे’, ‘तोमादेर घरे’ एवं ‘आमादेर घरे’ आदि शब्दोंका अर्थ क्रमशः ‘उनके’, ‘तुम्हारे’ एवं ‘हमारे’ होता है। पूर्वी बङ्गालमें इन सभी शब्दोंके कर्मकारकमें द्वितीया-विभक्तिमें केवलमात्र बहुवचनमें ‘गोरे’ शब्द इस ‘घरे’ शब्दके अपभ्रंशके रूपमें प्रचलित है; किन्तु सम्बन्ध विभक्त ‘र’ आगम नहीं होता; जैसे-‘तुम्हें बुला रहे हैं’ को बङ्गला भाषामें ‘तोमादिगके डाकिय़ाछें’ कहनेके स्थानपर पूर्वबङ्गालमें चलती भाषामें ‘तोमागौरे डाकछें’ ही प्रचलित है॥ 278 ॥ त्रितकूपमें विशालाका दर्शन और पञ्चाप्सरा तीर्थमें आगमन :— त्रितकूपे विशाला करिल दरशन। पञ्चाप्सरा-तीर्थे आइला शचीर नन्दन ॥ 279 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने त्रितकूपमें विशालाके दर्शन किये। उसके बाद श्रीशचीनन्दन पञ्चाप्सरा-तीर्थमें गये॥ 279 ॥ अनुभाष्य—‘पञ्चाप्सरा तीर्थ’—शातकर्णिकी, अन्य मतमें माण्डकर्णिकी, और एक अन्य मतमें अच्युत-ऋषिकी तपस्याको भङ्ग करनेके उद्देश्यसे इन्द्रने लता, बुदबुदा, समीची, सौरभेयी और वर्णा—इन पाँच अप्सराओंको भेजा। परन्तु वे ऋषिके द्वारा श्रापग्रस्त होकर मगरमच्छके रूपमें सरोवरमें वास करने लगीं। बादमें श्रीरामचन्द्रने इस सरोवरको देखा था। नारदजीके वचनोंसे पता चलता है कि अर्जुनने तीर्थयात्रा करते हुए यहाँ आकर मगरमच्छकी योनिसे इन पाँच अप्सराओंका उद्धार किया। तबसे यह सरोवर तीर्थके रूपमें परिणत हो गया है॥ 279 ॥ गोकर्णमें शिवका दर्शन और द्वैपायनि और सूपारक-तीर्थमें आगमन :— गोकर्णे शिव देखि’ आइला द्वैपायनि। सूपारक-तीर्थे आइला न्यासि-शिरोमणि ॥ 280 ॥ अनुवाद—उसके बाद महाप्रभुने गोकर्णमें आकर शिवजीका दर्शन किया और वहाँसे वे द्वैपायनि आये। संन्यासी शिरोमणि महाप्रभु तब सूपारक तीर्थमें गये॥ 280 ॥ अनुभाष्य—‘गोकर्ण’—बम्बई प्रदेश (वर्तमान महाराष्ट्र 390 ।