भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1239

नौवाँ अध्याय 9/280-285 ] में उत्तर कानाड़ामें कारवारके बीस मील दक्षिण-पूर्वकी ओर अवस्थित है और महाबलेश्वर शिवलिङ्गके मन्दिरके लिये विख्यात है। इस स्थानपर तीर्थ करनेके उद्देश्यसे बहुत यात्री आते हैं (बोम्बाई गेजेटियार)। 'सूपारक'-मुम्बईसे छब्बीस मील उत्तरकी ओर थाना जिलेमें 'सोपारा' नामक स्थान है। अति प्राचीन कालसे मध्ययुग तक यह 'कोङ्कण'की राजधानी थी (बोम्बाई गेजेटियार)। मःभाः शाःपः 49/66-67 देखें॥ 280 ॥ कोलापुरमें लक्ष्मी, भगवती, गणेश और पार्वती-दर्शन :- कोलापुरे लक्ष्मी देखि' देखे क्षीर-भगवती। लाङ्ग-गणेश देखि' देखे चोर-पार्वती ॥ 281 ॥ अनुवाद-महाप्रभु तब कोलापुर आये और वहाँ क्षीर-भगवती मन्दिरमें उन्होंने लक्ष्मीजीके दर्शन किये। उसके बाद चोर-पार्वती मन्दिरमें उन्होंने लाङ्ग-गणेशके दर्शन किये ॥ 281 ॥ अनुभाष्य- 'कोलापुर'-महाराष्ट्र एक जिला है। इसके उत्तरमें-साँतारा, पूर्व और दक्षिणमें-बेलग्राम, पश्चिममें-रत्नगिरि है। यहाँपर 'उर्णा' नदी है। कोलापुरमें पहले लगभग ढाई सौ मन्दिर थे; उनमेंसे अब ये छह मन्दिर प्रसिद्ध हैं-

  1. अम्बाबाई अथवा महालक्ष्मीका मन्दिर,
  2. विठोवाका मन्दिर,
  3. टेम्बालाईका मन्दिर,
  4. महाकालीका मन्दिर,
  5. फिराङ्गर्ई अथवा प्रत्यङ्गिराका मन्दिर और
  6. याल्लाम्मार मन्दिर। (बोम्बाई गेजेटियार) ॥ 281 ॥ भीमा-नदीके तटपर स्थित पाण्डरपुरमें आगमन और विट्ठलदेवका दर्शन :- तथा हैते पाण्डरपुरे आइला गौरचन्द्र। विठ्ठल-ठाकुर देखि' पाइला आनन्द ॥ 282 ॥ अनुवाद-वहाँसे श्रीगौरचन्द्र पाण्डरपुरमें आ गये और वहाँ ठाकुर श्रीविट्ठल देवका दर्शन करके बहुत आनन्दित हुए ॥ 282 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पाण्डरपुर'-भीमा नदीके तटपर 'पाण्डुपुर' अथवा 'पाण्डरपुर' नगर है। अनुसन्धान करनेपर यह जाना जाता है कि इस स्थानपर महाप्रभुने तुकारामाचार्यको हरिनाम् देकर कृपाकी थी-इसे तुकारामकृत 'अभङ्ग'में उन्होंने स्वयं ही स्वीकार किया है। तुकारामसे ही उस प्रदेशमें मृदङ्गादि वाद्यके साथ कीर्तनका प्रचार हुआ है ॥ 282 ॥ अनुभाष्य- 'पाण्डरपुर अथवा पण्डरपुर'-महाराष्ट्र प्रदेशमें शोलापुर जिलेके अन्तर्गत एक छोटा शहर है। पाण्डरपुर शोलापुर नगरसे अड़तीस मील सीधे पश्चिम दिशामें है। यहाँपर विठ्ठल अथवा विठोवा-देव ठाकुर हैं; वे-चतुर्भुज श्रीनारायण-मूर्ति हैं। यह नगर भीमा नदीके तटपर अवस्थित है। पन्द्रह सौ शक-शताब्दीमें यहाँ 'तुकाराम' नामक प्रसिद्ध वैष्णव-साधु रहते थे॥ 282 ॥ महाप्रभुका नृत्य-गीत और एक वैष्णव ब्राह्मणके घर भिक्षा :- प्रेमावेश कैल बहुत कीर्त्तन-नर्त्तन। ताँहा एक विप्र ताँरे कैल निमन्त्रण ॥ 283 ॥ वहाँ श्रीरङ्गपुरीके होनेका समाचार मिलना :- बहुत आदरे प्रभुके भिक्षा कराइल। भिक्षा करि' तथा एक शुभवार्त्ता पाइल ॥ 284 ॥ माधवपुरीर शिष्य 'श्रीरङ्गपुरी' नाम। सेइग्रामे विप्रगृहे करिला विश्राम ॥ 285 ॥ अनुवाद-श्रीविट्ठलदेवके मन्दिरमें महाप्रभुने प्रेमावेशमें बहुत देर तक कीर्त्तन-नृत्य किया। वहाँ एक ब्राह्मणने आकर महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। उस ब्राह्मणने महाप्रभुको बहुत आदरपूर्वक भोजन कराया। भोजन करके महाप्रभुको एक शुभ समाचार मिला कि श्रीमाधवेन्द्रपुरीके एक शिष्य जिनका नाम 'श्रीरङ्गपुरी' है, वे उसी ग्राममें एक ब्राह्मणके घरमें कुछ समयसे रह रहे हैं ॥ 283-285 ॥ । 391
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