श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1240, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 9/286–293 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीरङ्गपुरीके पास जाना और उनको प्रणाम करना :- शुनिया चलिला प्रभु ताँरे देखिबारे। विप्रगृहे बसि' आछेन, देखिला ताँहारे ॥ 286 ॥ प्रेमावेशे करे ताँरे दण्ड-परणाम। अश्रु, पुलक, कम्प, सर्वाङ्गे पड़े घाम ॥ 287 ॥ महाप्रभुके भावोंको देखकर रङ्गपुरीका महाप्रभुका माधवेन्द्रपुरीके साथ सम्बन्ध मानना :- देखिया विस्मित हैला श्रीरङ्ग-पुरीर मन। 'उठह श्रीपाद' बलि' बलिला वचन ॥ 288 ॥ “श्रीपाद, धर मोर गोसाञिर सम्बन्ध। ताहा बिना अन्यत्र नाहि एइ प्रेमार गन्ध ॥ ”289 ॥ अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभु श्रीरङ्गपुरीके दर्शनके लिये चल पड़े और ब्राह्मणके घरमें जाकर उन्होंने देखा कि श्रीरङ्गपुरी बैठे हुए है। महाप्रभुने प्रेमावेशमें उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। उनके शरीरमें अश्रु, पुलक, कम्प एवं सभी अङ्गोंमें पसीना आदि अष्ट-सात्त्विक विकार प्रकाशित होने लगे। महाप्रभुके सात्त्विक विकारोंको देखकर श्रीरङ्गपुरी मन-ही-मन विस्मित हो गये और कहा,-'उठो श्रीपाद, अवश्य ही आपका मेरे गुरुदेवसे कुछ सम्बन्ध है, क्योंकि उनसे सम्बन्धके बिना इस प्रकारके प्रेमकी गन्ध भी नहीं देखी जाती ॥ ”286-289 ॥ अनुभाष्य-श्रीपाद माधवेन्द्रपुरीसे पहले श्रीपाद लक्ष्मीपति तीर्थ तक मध्व-सम्प्रदायमें अकेले श्रीकृष्णकी पूजा ही प्रचलित थी। श्रील माधवेन्द्रपुरीसे ही जगत्में ऐकान्तिक- श्रीराधादास्यके भावसे विप्रलम्भ-रससे कृष्णप्रेम अवतरित हुआ है। क्योंकि “भक्तिकल्पतरुर तैँ ह प्रथम अङ्कुर” (आदिलीला 9/10 संख्या)। श्रील माधवेन्द्रपुरीके साथ प्रिय सम्बन्धवाले जातरुचि भक्तोंका ही इस श्रीकृष्णप्रेममें अधिकार है। मध्यलीला 2/83 संख्या भी देखें। 'गोसाञिर'–गोस्वामी। निष्किञ्चन (संसारकी किसी भी वस्तु अपना नहीं माननेवाले) परमहंसकुल-शिरोमणि (त्यागियोंमें सर्वश्रेष्ठ) कृष्णैकशरण (ऐकान्तिक श्रीकृष्ण-शरणागत) श्रीगुरुदेव, जिन्होंने छह (वाणी, मन, क्रोध, जिह्वा, उदर और जननेन्द्रियोंके) वेगोंको विजय किया है, वे ही 'गोस्वामी' कहलाने योग्य हैं। इसलिये गृहका त्याग करनेवाले श्रीमाधवेन्द्रपुरी पादको 'गोस्वामी' शब्दके द्वारा सम्बोधित किया गया है। इसके द्वारा यह समझना चाहिये कि 'गोस्वामी'-शब्द रक्त अथवा शुक्र अथवा शौक्रवंशमें आबद्ध नहीं है, अर्थात् किसी विशेष परिवारमें जन्मके द्वारा स्वयंको गोस्वामी नहीं कहा जा सकता। किन्तु वैष्णवोंसे विरोधकी स्पृहाके कारण अवैधरूपसे 'गोस्वामी' शब्द वर्तमानकालमें पारिवारिक उपाधिमें परिवर्तित हो गया है। इसलिये वह 'गोस्वामी' पदवी अनधिकारी व्यक्तियोंके द्वारा व्यवहार किये जानेपर उनकी व्याधिका कारण बन गयी है ॥ 289 ॥ महाप्रभुको आलिङ्गन और दोनोंका प्रेम-क्रन्दन :- एत बलि' प्रभुके उठाञा कैल आलिङ्गन। गलागलि करि' दुँहे करेन क्रन्दन ॥ 290 ॥ दोनोंका धैर्य; परस्परके परिचयकी प्राप्ति एवं प्रेम :- क्षणेके आवेश छाड़ि' दुँहे धैर्य हैला। ईश्वरपुरीर सम्बन्ध गोसाञि जानाइला ॥ 291 ॥ अद्भुत प्रेमेर वन्या दुँहार उथलिल। दुँहे मान्य करि' दुँहे आनन्दे बसिल ॥ 292 ॥ दोनोंके द्वारा सात दिन तक श्रीकृष्णकथा-आलोचना :- दुइजने कृष्णकथा कहे रात्रि-दिने। एइमते गोडाइल पाँच-सात दिने ॥ 293 ॥ अनुवाद-इतना कहकर श्रीरङ्गपुरीने महाप्रभुको उठाकर उनका आलिङ्गन किया। दोनों एक-दूसरेको गले लगाकर रोने लगे। कुछ समयके बाद प्रेमावेश कम हुआ और दोनोंने धैर्य धारण किया। तब महाप्रभुने श्रीरङ्गपुरीको श्रीईश्वरपुरीके साथ अपने सम्बन्धके विषयमें बतलाया। दोनोंमें एक अद्भुत प्रेमकी बाढ़ उमड़ पड़ी। अन्ततः दोनों एक-दूसरोंको सम्मान देते हुए आनन्दपूर्वक बैठकर बातचीत करने लगे। दोनों ही रात-दिन 392 ।