भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1241

नौवाँ अध्याय 9/290–303 ] श्रीकृष्णकथा कहने लगे। इस प्रकार उन्होंने पाँच-सात दिन वहाँ बिताये ॥ 290-293 ॥ पुरीके पूछनेपर महाप्रभुका 'जन्मस्थान-नवद्वीप' बताना :- कौतुके पुरी ताँरे पुछिल जन्मस्थान। गोसाञि कौतुके कहेन 'नवद्वीप' नाम ॥ 294 ॥ अनुवाद—तब उत्सुकतावश श्रीरङ्गपुरीने महाप्रभुसे उनके जन्मस्थानके विषयमें पूछा। महाप्रभुने कौतुकवश अपने जन्मस्थानका नाम 'नवद्वीप' बतलाया ॥ 294 ॥ पहले शचीमाताके घरपर रङ्गपुरीके द्वारा उनके हाथोंसे बने हुए भोजनको ग्रहण करनेका सुयोग :- श्रीमाधवपुरीर सङ्गे श्रीरङ्गपुरी। पूर्वे आसियाछिला तेंहो नदीया-नगरी ॥ 295 ॥ जगन्नाथमिश्र-घरे भिक्षा ये करिल। अपूर्व मोचार घण्ट ताँहा ये खाइल ॥ 296 ॥ जगन्नाथेर ब्राह्मणी, तेंह—महा-पतिव्रता। वात्सल्ये हयेन तेंह येन जगन्माता ॥ 297 ॥ रन्धने निपुणा ताँ-सम नाहि त्रिभुवने। पुत्रसम स्नेह करेन संन्यासि-भोजने ॥ 298 ॥ ताँर एक योग्य पुत्र करियाछे संन्यास। 'शङ्करारण्य' नाम ताँर अल्प वयस ॥ 299 ॥ रङ्गपुरीके मुखसे विश्वरूपके संन्यासके बाद उनकी सिद्धि प्राप्तिका संवाद श्रवण :- एइ तीर्थे शङ्करारण्येरे सिद्धिप्राप्ति हैल। प्रस्तावे श्रीरङ्गपुरी एतेक कहिल ॥ 300 ॥ अनुवाद—श्रीरङ्गपुरीको नदिया नाम सुनते ही वहाँकी बातें स्मरण हो आयीं जब वे श्रीमाधवेन्द्र पुरीके साथ पहले एक बार नदीया-नगरी आये थे। उन दोनोंने श्रीजगन्नाथ मिश्रके घरमें भोजन किया था और भोजनमें अपूर्व स्वादिष्ट केलेके फूलकी सूखी सब्जी खाई थी। श्रीजगन्नाथ मिश्रकी पत्नी महान पतिव्रता थीं और जिनका वात्सल्य ऐसा था, मानो वे सामस्त जगत्की माता हों। भोजन बनानेमें त्रिभुवनमें उनके समान कोई भी निपुण नहीं था। पुत्रकी भाँति स्नेह करते हुए उन्होंने संन्यासियोंको भोजन कराया था। उनका एक योग्य पुत्र था, उसने छोटी आयुमें ही संन्यास ग्रहण किया था। उनका संन्यासका नाम 'शङ्करारण्य' था। इसी पाण्डरपुर तीर्थमें आकर शङ्करारण्यने सिद्धि प्राप्त की अर्थात् यहीं वे अप्रकट हुए। प्रसङ्गवशतः श्रीरङ्गपुरीने महाप्रभुसे यह सब वृत्तान्त कहा ॥ 295–300 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुके ज्येष्ठ भ्राता श्रीमद्विश्वरूपको संन्यास ग्रहण करके 'शङ्करारण्य स्वामी' नाम प्राप्त हुआ था। उन्होंने देश भ्रमण करते-करते 'पाण्डरपुर'-तीर्थमें सिद्धि प्राप्त की थी, अर्थात् चिन्मय-धाममें प्रवेश किया था। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य और श्रीईश्वरपुरीके गुरुभाई श्रीरङ्गपुरीने यह संवाद महाप्रभुको दिया ॥ 300 ॥ महाप्रभुके द्वारा अपने पूर्वाश्रमका परिचय देना :- प्रभु कहे,—'पूर्वाश्रमे तेंहो मोर भ्राता। जगन्नाथ मिश्र—पूर्वाश्रमे मोर पिता ॥' 301 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,—'पूर्वाश्रममें 'शङ्करारण्य' मेरे भाई थे। श्रीजगन्नाथ मिश्र मेरे पूर्वाश्रममें पिता थे ॥' 301 ॥ श्रीरङ्गपुरीकी द्वारका यात्रा :- एइमत दुइजने इष्टगोष्ठी करि'। द्वारका देखिते चलिला श्रीरङ्गपुरी ॥ 302 ॥ अनुवाद—इस प्रकार दोनोंने इष्टगोष्ठी की और उसके बाद श्रीरङ्गपुरी द्वारका दर्शनके लिये चले गये ॥ 302 ॥ वैष्णव ब्राह्मणके घरपर महाप्रभुका चार दिन वास और विठ्ठलदेव दर्शन :- दिन-चारि तथा प्रभुके राखिल ब्राह्मण। भीमानदी स्नान करि' करेन विठ्ठल-दर्शन ॥ 303 ॥ । 393