श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 9/303-310 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीरङ्गपुरीके जानेके बाद चार दिन तक महाप्रभु उस ब्राह्मणके घरमें रहे। महाप्रभु प्रतिदिन भीमा नदीमें स्नान करते और श्रीविठ्ठलदेवका दर्शन किया करते॥ ३०३॥ कृष्णवेण्वाके तटपर आगमन :— तबे महाप्रभु आइला कृष्णवेण्वा-तीरे। नाना तीर्थ देखि' ताँहा देवता-मन्दिरे॥ ३०४॥ अनुवाद—तब महाप्रभु कृष्णवेण्वा नदीके तटपर आये। वहाँ उन्होंने अनेक तीर्थों और बहुतसे देवताओंके मन्दिरोंका दर्शन किये॥ ३०४॥ अनुभाष्य—'कृष्णवेण्वा'—सह्याद्रि-पर्वतपर स्थित महाबलेश्वरसे कृष्णा नदीकी दो धाराओंकी उत्पत्ति हुई है। इसी नदीके तटपर ही बिल्वमङ्गल ठाकुरका वासस्थान था। 'वेण्वा'के स्थान पर कोई-कोई 'वीणा', कोई-कोई 'वेणी', 'सिना' और कोई 'भीमा' कहते हैं॥ ३०४॥ वहाँके ब्राह्मणगण-वैष्णव और कर्णामृत-पाठक :— ब्राह्मण-समाज सब—वैष्णव-चरित्र। वैष्णव सकल पड़े 'कृष्णकर्णामृत'॥ ३०५॥ अनुवाद—वहाँके ब्राह्मण-समाजमें सब शुद्ध वैष्णव थे जो नियमित रूपसे बिल्वमङ्गल ठाकुर-कृत 'कृष्णकर्णामृत'का पाठ किया करते थे॥ ३०५॥ अनुभाष्य—'कृष्णकर्णामृत'—श्रीठाकुर बिल्वमङ्गलके द्वारा रचित एक सौ बारह श्लोकोंवाला ग्रन्थ है। इस नामके ही दो-तीन और भी गीतिग्रन्थ पाये जाते हैं। 'कृष्णकर्णामृत'की श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी और श्रीचैतन्यदास गोस्वामीके द्वारा लिखीं दो गौड़ीय वैष्णवोंके लिये पढ़ने योग्य टीकाएँ हैं॥ ३०५॥ कर्णामृत-श्रवणसे महाप्रभुको हर्ष और ग्रन्थकी नकलका संग्रह :— कृष्णकर्णामृत शुनि' प्रभुर आनन्द हैल। आग्रह करिया पुँथि लेखाञा लैल॥ ३०६॥ 'कर्णामृत'की महिमा :— 'कर्णामृत'-सम वस्तु नाहि त्रिभुवने। याहा हैते हय कृष्णे शुद्धप्रेमज्ञाने॥ ३०७॥ सौन्दर्य-माधुर्य-कृष्णलीलार अवधि। सेइ जाने, ये 'कर्णामृत' पड़े निरवधि॥ ३०८॥ अनुवाद—कृष्णकर्णामृतको सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने आग्रह करके उस ग्रन्थकी नकल करवाके अपने पास रख ली। त्रिभुवनमें 'कृष्णकर्णामृत'के समान कोई भी ग्रन्थ नहीं है जिसको पढ़नेसे श्रीकृष्णमें शुद्धप्रेमका ज्ञान प्राप्त होता है। जो 'कर्णामृत'का नित्य पाठ करता है, वह श्रीकृष्णके सौन्दर्य, माधुर्य और उनकी लीलाओंको पूर्णरूपसे जान सकता है॥ ३०६-३०८॥ महाप्रभुके द्वारा दो ग्रन्थोंका संग्रह— (१) सिद्धान्त और (२) रसशास्त्र :— 'ब्रह्मसंहिता', 'कर्णामृत' दुइ पुँथि पाञा। महा यत्न करि' पुँथि आइला लञा॥ ३०९॥ अनुवाद—महाप्रभुने 'ब्रह्मसंहिता' और 'कर्णामृत', ये दो ग्रन्थ-रत्न प्राप्त किये। अति सावधानीके साथ उन दोनों ग्रन्थोंको वे अपने साथ लेकर आये॥ ३०९॥ अनुभाष्य—'ब्रह्म संहिता'—इसी अध्यायकी 237 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ ३०९॥ ताप्ती और नर्मदाके तटपर तीर्थ-दर्शन और माहिष्मतीपुरमें आगमन :— तापी स्नान करि' आइला माहिष्मतीपुरे। नाना तीर्थ देखि' ताँहा नर्मदार तीरे॥ ३१०॥ अनुवाद—वहाँसे महाप्रभु तापी नदीके तटपर आये और नदीमें स्नान करके माहिष्मतीपुरमें आये। वहाँ उन्होंने नर्मदा नदीके तटपर स्थित अनेक तीर्थोंका दर्शन किया॥ ३१०॥ अनुभाष्य—'तापी'—इसका वर्तमान नाम 'ताप्ती' है। 394 ।