श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1243, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय 9/310-316 ] यह मध्य-भारतके मूलताइ-गिरिसे निकलकर सौराष्ट्र उत्तर अंशमें पश्चिम-सागरमें जाकर मिलती है। ‘माहिष्मतीपुर’—‘चुलिमहेश्वर’; महाभारत सभापर्वमें सहदेवकी दिग्विजयपर 31/21 श्लोक— “ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ। तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभः॥” अर्थात् “तदन्तर वे नरश्रेष्ठ (सहदेव) वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर माहिष्मती पुरीको गये और वहाँ राजा नीलके साथ घोर युद्ध किया।” पहले गुजरातका ब्रोच जिला कार्त्तवीर्यार्जुनका स्थान था॥310॥ सबसे सङ्कीर्ण पर्वतपथके बगलमें जो पर्वत निजाम-राज्यमें पड़ता है, वही ऋष्यमूक पर्वत है। किसी औरके मतसे, यह मध्यप्रदेशमें अवस्थित है और इसका वर्तमान नाम ‘राम्य’ है; किसी अन्यके मतानुसार, त्रिवाङ्कुर-राज्यमें ‘अनमलय’ और फिर किसीके मतानुसार ऋष्यमूक पर्वतसे ही पम्पा नदी बाहर निकलकर अनागुण्डिरके निकट तुङ्गभद्रामें आकर मिलती है। ‘दण्डकारण्य’—उत्तरमें ‘खानदेश’से दक्षिणमें अहमदनगर एवं बीचमें ‘नासिक’ और ‘औरङ्गाबाद’ तक गोदावरी-नदीके तटपर स्थित विस्तृत भूभागपर ‘दण्डकारण्य’ नामक विशाल वन था। ‘सप्तताल’—वानरराज सुग्रीवको बालीका वध करनेमें अपने सामर्थ्यमें विश्वास दिलानेके लिये श्रीरामचन्द्रका एक ही बाणसे सप्ततालको बींधनेका प्रसङ्ग रामायणके किष्किन्धाकाण्डमें ग्यारहवें और बारहवें सर्गमें वर्णित है॥311-312॥ धनुस्तीर्थ-दर्शन और निर्विन्ध्या-नदीमें स्नान, उसके बाद ऋष्यमूक पर्वतसे दण्डकारण्यमें आगमन और ‘सप्तताल’का उद्धार :— धनुस्तीर्थ देखि’ करिला निर्विन्ध्ये स्नाने। ऋष्यमूक-गिरि आइला दण्डकारण्ये॥311॥ ‘सप्तताल-वृक्ष’ देखे कानन-भितर। अति वृद्ध, अति स्थूल, अति उच्चतर॥312॥ सप्तताल देखि’ प्रभु आलिङ्गन कैल। सशरीरे सप्तताल अन्तर्धान हैल॥313॥ लोगोंके द्वारा महाप्रभुको श्रीरामका अवतार समझना :— शून्यस्थल देखि’ लोकेर हैल चमत्कार। लोके कहे,—“ए संन्यासी-राम-अवतार॥314॥ सशरीरे ताल गेल श्रीवैकुण्ठ-धाम। ऐछे शक्ति कार हय, बिना एक राम?”॥315॥ अनुवाद—धनुस्तीर्थका दर्शन करके महाप्रभुने निर्विन्ध्या नदीमें स्नान किया। फिर ऋष्यमूक पर्वतसे दण्डकारण्यमें आये। दण्डकारण्यमें महाप्रभुने ‘सप्तताल वृक्ष’ देखे। ये सात तालके वृक्ष बड़े पुराने, बहुत मोटे और बहुत ऊँचे थे। सप्तताल वृक्षोंको देखकर महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया और साथ-ही-साथ वे वृक्ष सशरीर अन्तर्धान हो गये॥311-313॥ अनुवाद—जिस स्थानपर ताल वृक्ष थे, उस स्थानको रिक्त देखकर लोग बहुत आश्चर्यचकित हुए। वे कहने लगे,—“ये संन्यासी तो भगवान् श्रीरामचन्द्रके अवतार हैं। तालवृक्ष सशरीर श्रीवैकुण्ठ-धाममें चले गये। ऐसी शक्ति तो एकमात्र भगवान् श्रीरामचन्द्रके अतिरिक्त और किसमें हो सकती है?”॥314-315॥ पम्पा-सरोवरमें स्नान और पञ्चवटीपर विश्राम :— प्रभु आसि’ कैल पम्पा-सरोवरे स्नान। पञ्चवटी आसि ताँहा करिल विश्राम॥316॥ अनुभाष्य—‘निर्विन्ध्या नदी’—उज्जयनीके निकट पूर्वोत्तरमें अवस्थित पारा-नदीके पश्चिममें और पावनी नदीके दक्षिणमें है। ‘ऋष्यमूक’—कोई कोई कहते हैं कि बेलारि-जिलेमें हाम्पि-ग्रामके निकट तुङ्गभद्रा-नदीके तटपर स्थित अनुवाद—सप्ततालका उद्धार करके महाप्रभुने पम्पा सरोवर आकर उसमें स्नान किया और फिर पञ्चवटी नामक स्थानपर आकर विश्राम किया॥316॥ । 395