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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

नौवाँ अध्याय 9/310-316 ] यह मध्य-भारतके मूलताइ-गिरिसे निकलकर सौराष्ट्र उत्तर अंशमें पश्चिम-सागरमें जाकर मिलती है। ‘माहिष्मतीपुर’—‘चुलिमहेश्वर’; महाभारत सभापर्वमें सहदेवकी दिग्विजयपर 31/21 श्लोक— “ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ। तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभः॥” अर्थात् “तदन्तर वे नरश्रेष्ठ (सहदेव) वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर माहिष्मती पुरीको गये और वहाँ राजा नीलके साथ घोर युद्ध किया।” पहले गुजरातका ब्रोच जिला कार्त्तवीर्यार्जुनका स्थान था॥310॥ सबसे सङ्कीर्ण पर्वतपथके बगलमें जो पर्वत निजाम-राज्यमें पड़ता है, वही ऋष्यमूक पर्वत है। किसी औरके मतसे, यह मध्यप्रदेशमें अवस्थित है और इसका वर्तमान नाम ‘राम्य’ है; किसी अन्यके मतानुसार, त्रिवाङ्कुर-राज्यमें ‘अनमलय’ और फिर किसीके मतानुसार ऋष्यमूक पर्वतसे ही पम्पा नदी बाहर निकलकर अनागुण्डिरके निकट तुङ्गभद्रामें आकर मिलती है। ‘दण्डकारण्य’—उत्तरमें ‘खानदेश’से दक्षिणमें अहमदनगर एवं बीचमें ‘नासिक’ और ‘औरङ्गाबाद’ तक गोदावरी-नदीके तटपर स्थित विस्तृत भूभागपर ‘दण्डकारण्य’ नामक विशाल वन था। ‘सप्तताल’—वानरराज सुग्रीवको बालीका वध करनेमें अपने सामर्थ्यमें विश्वास दिलानेके लिये श्रीरामचन्द्रका एक ही बाणसे सप्ततालको बींधनेका प्रसङ्ग रामायणके किष्किन्धाकाण्डमें ग्यारहवें और बारहवें सर्गमें वर्णित है॥311-312॥ धनुस्तीर्थ-दर्शन और निर्विन्ध्या-नदीमें स्नान, उसके बाद ऋष्यमूक पर्वतसे दण्डकारण्यमें आगमन और ‘सप्तताल’का उद्धार :— धनुस्तीर्थ देखि’ करिला निर्विन्ध्ये स्नाने। ऋष्यमूक-गिरि आइला दण्डकारण्ये॥311॥ ‘सप्तताल-वृक्ष’ देखे कानन-भितर। अति वृद्ध, अति स्थूल, अति उच्चतर॥312॥ सप्तताल देखि’ प्रभु आलिङ्गन कैल। सशरीरे सप्तताल अन्तर्धान हैल॥313॥ लोगोंके द्वारा महाप्रभुको श्रीरामका अवतार समझना :— शून्यस्थल देखि’ लोकेर हैल चमत्कार। लोके कहे,—“ए संन्यासी-राम-अवतार॥314॥ सशरीरे ताल गेल श्रीवैकुण्ठ-धाम। ऐछे शक्ति कार हय, बिना एक राम?”॥315॥ अनुवाद—धनुस्तीर्थका दर्शन करके महाप्रभुने निर्विन्ध्या नदीमें स्नान किया। फिर ऋष्यमूक पर्वतसे दण्डकारण्यमें आये। दण्डकारण्यमें महाप्रभुने ‘सप्तताल वृक्ष’ देखे। ये सात तालके वृक्ष बड़े पुराने, बहुत मोटे और बहुत ऊँचे थे। सप्तताल वृक्षोंको देखकर महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया और साथ-ही-साथ वे वृक्ष सशरीर अन्तर्धान हो गये॥311-313॥ अनुवाद—जिस स्थानपर ताल वृक्ष थे, उस स्थानको रिक्त देखकर लोग बहुत आश्चर्यचकित हुए। वे कहने लगे,—“ये संन्यासी तो भगवान् श्रीरामचन्द्रके अवतार हैं। तालवृक्ष सशरीर श्रीवैकुण्ठ-धाममें चले गये। ऐसी शक्ति तो एकमात्र भगवान् श्रीरामचन्द्रके अतिरिक्त और किसमें हो सकती है?”॥314-315॥ पम्पा-सरोवरमें स्नान और पञ्चवटीपर विश्राम :— प्रभु आसि’ कैल पम्पा-सरोवरे स्नान। पञ्चवटी आसि ताँहा करिल विश्राम॥316॥ अनुभाष्य—‘निर्विन्ध्या नदी’—उज्जयनीके निकट पूर्वोत्तरमें अवस्थित पारा-नदीके पश्चिममें और पावनी नदीके दक्षिणमें है। ‘ऋष्यमूक’—कोई कोई कहते हैं कि बेलारि-जिलेमें हाम्पि-ग्रामके निकट तुङ्गभद्रा-नदीके तटपर स्थित अनुवाद—सप्ततालका उद्धार करके महाप्रभुने पम्पा सरोवर आकर उसमें स्नान किया और फिर पञ्चवटी नामक स्थानपर आकर विश्राम किया॥316॥ । 395

[ 9/316-323 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—'पम्पा'—"ऋष्यमूकस्तु पम्पायां पुरस्तात् पुष्पितद्रुमः” अर्थात् "पम्पा नगरीमें ऋष्यमूक पर्वत है जिसके आगे पुष्पित वृक्ष हैं।"; कोई-कोई कहते हैं, —तुङ्गाभद्रा-नदीका ही प्राचीन नाम 'पम्बा' है। मतान्तरमें—विजयनगरकी प्राचीन प्रसिद्ध राजधानी हाम्पि-ग्राम ही पहले पम्पा-तीर्थके नामसे प्रसिद्ध था। मतान्तरमें—हैदराबादकी ओर, अनागुण्डिरके निकट तुङ्गाभद्राके तटपर स्थित एक सरोवर ही 'पम्पा सरोवर'के नामसे जाना जाता है; मतान्तरमें—पम्पा-सरोवर ही त्रिवाङ्कुरकी पम्वै-नदी है; मतान्तरमें—जल स्थिर होनेके कारण नदीको ही सरोवर कहा जाता है। 'पञ्चवटी'—दण्डकारण्यके अन्तर्गत एक वन है; यह वर्तमान 'नासिक' शहरमें अवस्थित है। यहाँपर श्रीलक्ष्मणने शूर्पणखाके नाकको काटा था। नासिक शहरमें 'त्र्यम्बक' नामक महादेव हैं (बोम्बाई गेजेटियार) ॥ 316 ॥ नासिकमें शिवका दर्शन करनेके बाद ब्रह्मगिरि एवं उसके बाद कुशावर्त्तमें आगमन :— नासिके त्र्यम्बक देखि' गेला ब्रह्मगिरि। कुशावर्त्ते आइला याँहा जन्मिला गोदावरी ॥ 317 ॥ अनुवाद—महाप्रभु नासिकमें त्र्यम्बकके दर्शन करके ब्रह्मगिरि गये। और फिर वे कुशावर्त्त आये जो गोदावरी नदीका उद्गम-स्थल है॥ 317 ॥ अनुभाष्य—'कुशावर्त्त'—पश्चिम घाट अथवा सह्याद्रिके कुशट्ट-नामक प्रदेशसे गोदावरीकी मूल धाराएँ उत्पन्न होती हैं। कुशावर्त्त नासिकके निकट स्थित है; किसी- किसीके मतानुसार यह विन्ध्याकी तलहटीमें अवस्थित है॥ 317 ॥ गोदावरीके सप्तशाखाओंके तटोंपर बहुत तीर्थोंका उद्धारकर विद्यानगरमें आगमन :— सप्त गोदावरी आइला करि' तीर्थ बहुतर। पुनरपि आइला प्रभु विद्यानगर ॥ 318 ॥ अनुवाद—बहुतसे तीर्थोंका दर्शन करनेके बाद महाप्रभु सप्त गोदावरी आये। और अन्तमें फिर वे विद्यानगर लौट आये ॥ 318 ॥ अनुभाष्य—गोदावरीके उत्पत्ति-स्थानसे वर्तमान हैदराबादके उत्तर-अंशसे होते हुए 'वस्तार' होकर उत्तर-सर्कार्समें कलिङ्गदेशमें पहुँचे ॥ 318 ॥ महाप्रभुके साथ श्रीरामानन्द रायका मिलन :— रामानन्द राय शुनि' प्रभुर आगमन। आनन्दे आसिया कैल प्रभुसह मिलन ॥ 319 ॥ दण्डवत् हञा पड़े चरणे धरिया। आलिङ्गन कैल प्रभु ताँरे उठाञा ॥ 320 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायको महाप्रभुका विद्यानगरमें आगमनका समाचार मिला, तो वे बड़े आनन्दित होकर महाप्रभुसे मिलनेके लिये आये। आकर श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुके चरणकमलोंमें दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया ॥ 319-320 ॥ दोनोंका प्रेमानन्द और इष्टगोष्ठी :— दुइजने प्रेमावेशे करेन क्रन्दन। प्रेमानन्दे शिथिल हैल दुँहाकार मन ॥ 321 ॥ कतक्षणे दुइ जना सुस्थिर हञा। नाना इष्टगोष्ठी करे एकत्र बसिया ॥ 322 ॥ अनुवाद—दोनों एक-दूसरेको मिलकर प्रेमावेशमें रोने लगे और प्रेमानन्दमें दोनोंका मन शिथिल हो गया। कुछ समयके बाद सुस्थिर होकर दोनों एक साथ बैठे। तब उन्होंने अनेक विषयोंपर चर्चा की ॥ 321-322 ॥ महाप्रभुके द्वारा अपनी तीर्थयात्राके वृत्तान्तका वर्णन और संगृहीत दोनों ग्रन्थ प्रदान :— तीर्थयात्रा-कथा प्रभु सकल कहिला। कर्णामृत, ब्रह्मसंहिता, —दुइ पुँथि दिला ॥ 323 ॥ 396 ।

नौवाँ अध्याय 9/323-333 ] अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायको अपनी तीर्थ यात्राका पूर्ण वृत्तान्त सुनाया और अपने साथ लायी हुई कर्णामृत एवं ब्रह्मसंहिता—नामक दो पुस्तकें उन्हें प्रदान कीं॥ 323 ॥ प्रभु कहे,—“तुमि ये 'प्रेम-सिद्धान्त' कहिले। एइ दुइ पुस्तके सेइ रसेर साक्षी दिले॥" 324 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “तुमने जिस 'प्रेम-सिद्धान्त' का वर्णन किया था, ये दोनों ग्रन्थ उस रसके साक्षी हैं॥" 324 ॥ रायेर आनन्द हैल पुस्तक पाइया। प्रभु-सह आस्वादिल, राखिल लिखिया ॥ 325 ॥ अनुवाद—उन दोनों ग्रन्थोंको प्राप्त करके श्रीरामानन्द रायको बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने महाप्रभुके साथ उन दोनों ग्रन्थोंका आस्वादन किया तथा उनकी नकल करके रख ली॥ 325 ॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये लोगोंका समागम :— 'गोसाञि' आइला', ग्रामे हैल कोलाहल। प्रभुके देखिते लोक आइल सकल ॥ 326 ॥ अनुवाद— 'गोसाईं आये हैं'—यह समाचार सुनकर विद्यानगर ग्राममें कोलाहल हो गया। सभी लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आने लगे॥ 326 ॥ अनुभाष्य— 'गोसाञि'—श्रीचैतन्य गोसाईं ॥ 326 ॥ बहिरङ्ग-लोगोंको देखकर श्रीरामानन्द राय और महाप्रभुका अपने-अपने कार्यके लिये प्रस्थान :— लोक देखि' रामानन्द गेला निजघरे। मध्याह्न उठिला प्रभु भिक्षा करिबारे ॥ 327 ॥ अनुवाद—लोगोंकी भीड़को देखकर श्रीरामानन्द राय अपने घर लौट गये और महाप्रभु भी मध्याह्न भोजन करनेके लिये उठ खड़े हुए ॥ 327 ॥ महाप्रभु और श्रीरायका कृष्णकथा-प्रसङ्गमें एक सप्ताह व्यतीत :— रात्रिकाले राय पुनः कैल आगमन। दुइजने कृष्णकथाय कैल जागरण ॥ 328 ॥ दुइजने कृष्णकथा कहे रात्रि-दिने। परम-आनन्दे गेल पाँच-सात दिने ॥ 329 ॥ अनुवाद—रातके समय श्रीरामानन्द राय पुनः महाप्रभुके पास आये। दोनोंने श्रीकृष्णकथामें सारी रात बितायी। इस प्रकार दोनों रात-दिन कृष्णकथा कहते-सुनते रहे और पाँच-सात दिन परमानन्दमें बीते ॥ 328-329 ॥ महाप्रभुकी आज्ञानुसार श्रीरायका पुरीमें जानेके विषयमें बतलाना :— रामानन्द कहे,—“प्रभु, तोमार आज्ञा पाञा। राजाके लिखिलुँ आमि विनय करिया ॥ 330 ॥ राजा मोरे आज्ञा दिल नीलाचले याइते। चलिबार उद्योग आमि लागियाछि करिते ॥" 331 ॥ अनुवाद—तब श्रीरामानन्द रायने कहा, — “प्रभो ! आपकी आज्ञा पाकर मैंने राजाको पत्र लिखा था जिसमें मैंने उनसे राजकार्य छोड़कर नीलाचल जानेकी अनुमतिके लिये विनती की थी। अब राजाने मुझे नीलाचल जानेकी अनुमति प्रदान कर दी है। इसलिये अब मैं नीलाचल जानेकी तैयारी कर रहा हूँ॥" 330-331 ॥ महाप्रभुका विद्यानगरमें आनेका कारण :— प्रभु कहे,—“एथा मोर ए-निमित्ते आगमन। तोमा लञा नीलाचले करिब गमन ॥" 332 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा, — “मेरे यहाँ आनेका यही कारण है। मैं तुम्हें अपने साथ लेकर नीलाचल जाऊँगा ॥" 332 ॥ रायके द्वारा महाप्रभुको पहले पुरी जानेका निवेदन और बादमें स्वयं आनेके लिये सहमति :— राय कहे,—“प्रभु, आगे चल नीलाचले। मोर सङ्गे हाती-घोड़ा, सैन्य-कोलाहले ॥ 333 ॥ । 397

[ ९/३३३-३४४ श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दिन-दशे इहा-सबार करि' समाधान। तोमार पाछे पाछे आमि करिब प्रयाण॥" ३३४॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—"प्रभो! आप अभी अकेले ही नीलाचल चले जाइये, क्योंकि मेरे साथ बहुतसे हाथी, घोड़े और सैनिक हैं और इनके कारण बहुत शोर हो रहा है। दस दिनोंमें मैं इन सबकी व्यवस्था कर दूँगा। तब मैं आपके पीछे-पीछे नीलाचल आ जाऊँगा॥" ३३३-३३४॥ महाप्रभुकी सम्मति और पुरीकी ओर गमन :- तबे महाप्रभु ताँरे आसिते आज्ञा दिया। नीलाचले चलिला प्रभु आनन्दित हञा॥ ३३५॥ अनुवाद—तब महाप्रभु श्रीरामानन्द रायको पुरी आनेकी आज्ञा देकर आनन्दपूर्वक नीलाचलकी ओर चल पड़े॥ ३३५॥ वैष्णवता प्राप्त भक्तोंपर कृपा प्रदर्शन करनेके लिये महाप्रभुका पहलेवाले मार्गसे ही गमन :- येइ पथे पूर्वे प्रभु कैला आगमन। सेइ पथे चलिला देखि, सर्व वैष्णवगण॥ ३३६॥ अनुवाद—जिस मार्गसे महाप्रभु पहले आये थे, उसी मार्गसे ही वे नीलाचलकी ओर गये और मार्गमें सभी वैष्णवोंने उनके दर्शन किये॥ ३३६॥ याँहा याय, लोक उठे हरिध्वनि करि'। देखि' आनन्दित-मन हैला गौरहरि॥ ३३७॥ अनुवाद—महाप्रभु जहाँ भी जाते, उनको देखकर लोग हरिध्वनि करने लगते। यह देखकर श्रीगौरहरिको बहुत आनन्द हुआ॥ ३३७॥ आलालनाथमें आकर श्रीनित्यानन्दादिको वहाँ लानेके लिये अपने सङ्गी कृष्णदासको भेजना :- आलालनाथे आसि' कृष्णदासे पाठाइल। नित्यानन्द-आदि निजगणे बोलाइल॥ ३३८॥ अनुवाद—आलालनाथ पहुँचकर महाप्रभुने कृष्णदासको भेजकर श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि अपने परिकरोंको वहीं बुलवाया॥ ३३८॥ महाप्रभुके दर्शनोंके लिये श्रीनित्यानन्दादिका अति शीघ्रागमन :- प्रभुर आगमन शुनि' नित्यानन्द-राय। उठिया चलिला, प्रेमे थेह नाहि पाय॥ ३३९॥ जगदानन्द, दामोदर-पण्डित, मुकुन्द। नाचिया चलिला, देहे ना धरे आनन्द॥ ३४०॥ अनुवाद—महाप्रभुके आनेका समाचार सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभु प्रेममें अधीर हो गये और तुरन्त उठकर महाप्रभुसे मिलने चल पड़े। श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित तथा श्रीमुकुन्द भी प्रेमानन्दमें उन्मत्त होकर उनके साथ नाचते हुए चलने लगे॥ ३३९-३४०॥ गोपीनाथाचार्य चलिला आनन्दित हञा। प्रभुरे मिलिला सबे पथे लाग् पाञा॥ ३४१॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्य भी बहुत आनन्दित होकर महाप्रभुसे मिलनेके लिये चले और मार्गमें ही उनका महाप्रभुसे मिलन हुआ॥ ३४१॥ महाप्रभुके द्वारा सबको प्रेम-आलिङ्गन :- प्रभु प्रेमावेशे सबाय कैल आलिङ्गन। प्रेमावेशे सबे करे आनन्द-क्रन्दन॥ ३४२॥ अनुवाद—प्रेमावेशमें महाप्रभुने उन सबका आलिङ्गन किया और सभी प्रेमाविष्ट होकर आनन्दसे रोने लगे॥ ३४२॥ समुद्रतटपर श्रीसार्वभौमके साथ मिलन :- सार्वभौम भट्टाचार्य आनन्दे चलिला। समुद्रेर तीरे आसि' प्रभुरे मिलिला॥ ३४३॥ सार्वभौम महाप्रभुर पड़िला चरणे। प्रभु ताँरे उठाञा कैल आलिङ्गने॥ ३४४॥ ३९८ ।

नौवाँ अध्याय 9/343-355 ] अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य भी आनन्दित होकर महाप्रभुके दर्शनोंके लिये चल पड़े और समुद्रके तटपर उनका महाप्रभुसे मिलन हुआ। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभुको देखते ही उनके चरणोंमें गिर पड़े और महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥ 343-344 ॥ सभीको साथ लेकर महाप्रभुका श्रीजगन्नाथ-दर्शन और भावावेशमें नृत्य-गीत :- प्रेमावेशे सार्वभौम करिला रोदने। सबा-सङ्गे आइला प्रभु ईश्वर-दरशने ॥ 345 ॥ जगन्नाथ-दरशन प्रेमावेशे कैल। कम्प-स्वेद-पुलकाश्रुते शरीर भासिल ॥ 346 ॥ अनुवाद—प्रेमावेशमें श्रीसार्वभौम रोने लगे। महाप्रभु सभीको साथ लेकर श्रीजगन्नाथके दर्शन करने गये। श्रीजगन्नाथके दर्शनसे प्रेममें आविष्ट होकर महाप्रभुका शरीर कम्प, स्वेद, पुलक और अश्रुओं आदि सात्त्विक भावोंसे व्याप्त हो गया॥ 345-346 ॥ बहु नृत्यगीत कैल प्रेमाविष्ट हञा। पाण्डापाल आइल सबे माला-प्रसाद लञा ॥ 347 ॥ अनुवाद—प्रेममें आविष्ट होकर महाप्रभुने बहुत देर तक नृत्य-गान किया। सब पण्डा लोगोंने आकर महाप्रभुको श्रीजगन्नाथकी माला और प्रसाद दिया॥ 347 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पाण्डापाल'—श्रीजगन्नाथकी जो पूजा करते हैं, वे—पाण्डा हैं। जो अन्य प्रकारसे टहल करते हैं, अर्थात् मन्दिरके बाहरके कार्योंको देखते हैं, वे—पशुपाल हैं। ये दोनों एक साथ मिलकर 'पाण्डापाल' हुए हैं॥ 347 ॥ महाप्रभुका धैर्य-धारण और श्रीजगन्नाथ-सेवकोंके साथ मिलन :- मालाप्रसाद पाञा प्रभु सुस्थिर हइला। जगन्नाथेर सेवक सब आनन्दे मिलिला ॥ 348 ॥ काशीमिश्र आसि' प्रभुर पड़िला चरणे। मान्य करि' प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गने ॥ 349 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथकी माला और प्रसाद पाकर महाप्रभुका आवेश दूर हुआ। तब श्रीजगन्नाथके सब सेवक आनन्दसे महाप्रभुसे मिले। श्रीकाशीमिश्र आकर महाप्रभुके चरणोंमें पड़ गये और महाप्रभुने उन्हें सम्मान देते हुए उनका आलिङ्गन किया॥ 348-349 ॥ मध्याह्नमें सगण महाप्रभुको भट्टाचार्यके द्वारा भिक्षादान :- प्रभु लञा सार्वभौम निज-घरे गेला। 'मोर घरे भिक्षा' बलि' निमन्त्रण कैला ॥ 350 ॥ दिव्य महाप्रसाद अनेक आनाइल। पीठा-पाना आदि जगन्नाथ ये खाइल ॥ 351 ॥ मध्याह्न करिला प्रभु निजगण लञा। सार्वभौम-घरे भिक्षा करिला असिया ॥ 352 ॥ भिक्षा कराञा ताँरे कराइल शयन। आपने सार्वभौम करे पादसम्वाहन ॥ 353 ॥ अनुवाद—'आज आप मेरे घरमें भिक्षा ग्रहण कीजिये'—यह कहकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया और उन्हें अपने घर ले गये। पीठा-पाना आदि जो-जो व्यञ्जन श्रीजगन्नाथदेवने खाये थे, श्रीसार्वभौमने बहुतसा वह दिव्य महाप्रसाद मँगवाया। महाप्रभु अपने परिकरोंके साथ श्रीसार्वभौमके घरपर आये और सभीने भोजन किया। भोजन कराके श्रीसार्वभौमने महाप्रभुको विश्रामके लिये लिटाया और स्वयं उनके चरण दबाने लगे॥ 350-353 ॥ भट्टाचार्यके घरमें रात्रिमें वास और सभीको तीर्थयात्राके वृत्तान्तका वर्णन :- प्रभु ताँरे पाठाइल भोजन करिते। सेइ रात्रि ताँर घरे रहिला ताँर प्रीते ॥ 354 ॥ सार्वभौम-सङ्गे आर लञा निजगण। तीर्थयात्रा-कथा कहि' कैल जागरण ॥ 355 ॥ । 399

[ 9/354-359 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको सार्वभौम—हे देव! इसलिये मैंने आपसे निवेदन भोजन करनेके लिये भेज दिया और उस रात उनकी किया था, वे अवश्य ही आपसे मिलनेके योग्य हैं। प्रसन्नताके लिये उन्हींके घरमें रह गये। महाप्रभुने श्रीकृष्णचैतन्य—कुछ वैष्णव भी दिखे थे, वे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और अपने परिकरोंके साथ अपनी नारायणके ही उपासक हैं, अन्य कुछ तत्त्ववादी भी थे तीर्थ-यात्राका वृत्तान्त बतलाते हुए सारी रात जागरण जो उनके समान हैं, परन्तु उनका मत निर्दोष नहीं है। किया॥ 354-355॥ अन्य अधिकांश तो शैव ही हैं और पाखण्डी तो बड़ी संख्यामें महाप्रबल हैं, किन्तु मुझे तो रामानन्दका मत महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौम और श्रीरामानन्दकी प्रशंसा :— ही रुचिकर लगा॥”355-357॥ प्रभु कहे,—“एत तीर्थ कैलुँ पर्यटन। तोमा-सम वैष्णव ना देखिलुँ एकजने॥ 356॥ महाप्रभुकी तीर्थयात्राका वृत्तान्त इस ग्रन्थमें संक्षेपमें ही वर्णित :— एक रामानन्द राय बहु सुख दिल।” तीर्थयात्रा-कथा एइ कैलुँ समापन। भट्ट कहे,—“एइ लागि’ मिलिते कहिल॥” 357॥ संक्षेपे कहिलुँ, विस्तार ना याय वर्णन॥ 358॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे कहा,— अनुवाद—(ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी “मैंने इतने तीर्थोंमें भ्रमण किया, किन्तु आपके जैसा कह रहे हैं—) मैं महाप्रभुकी तीर्थयात्राकी कथाको यहीं एक भी वैष्णव मुझे दिखायी नहीं दिया। हाँ, एक समाप्त करता हूँ। मैंने संक्षेपमें ही इसका वर्णन किया रामानन्दरायने मुझे बहुत आनन्द प्रदान किया।” श्रीसार्वभौम है, क्योंकि विस्तारपूर्वक इसका वर्णन नहीं किया जा भट्टाचार्यने कहा,—“इसलिये मैंने आपको उनसे मिलनेकी सकता॥ 358॥ प्रार्थना की थी॥” 356-357॥ अनुभाष्य—इस अध्यायकी 74 संख्यामें “शियालीते अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौम और श्रीकृष्णचैतन्यका भैरवी देवी करि’ दरशन” पाठके स्थानपर “शियालीते वार्त्तालाप श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकके आठवें अङ्कमें इस श्रीभू-वराह करि’ दरशन” होगा। शियाली एवं चिदम्बरमके प्रकार लिखा हुआ है, जैसे- निकट सुविख्यात ‘श्रीमुञ्चम्’–मन्दिर है। वहाँ श्रीकृष्णचैतन्यः। सार्वभौम ! एतावद्दूरं पर्यटितम्; भवत्सदृशः श्रीभू-वराहदेवका विग्रह है। चिदम्बरम् तालुकाके अन्तर्गत कोऽपि न दृष्टः, केवलमेव रामानन्दरायः, स तु अलौकिक दक्षिण–आर्कट् जिलेमें शियालीके निकटमें ‘श्रीभू-वराहदेव’ एव भवति। ही विराजमान हैं, ‘भैरवीदेवी’ नहीं॥ 358॥ सार्वभौमः। देव ! अतएव निवेदितं—सोऽवश्यमेव द्रष्टव्य इति। चैतन्यलीला-वर्णन करनेकी ग्रन्थकारकी लालसा :— श्रीकृष्णचैतन्यः। कियन्त एव वैष्णवा दृष्टास्तेऽपि नारायणोपासका अनन्त चैतन्यलीला कहिते ना जानि। एव; अपरे तत्त्ववादिनस्ते तथाविधा एव निरवद्यं न भवति लोभे लज्जा खाञा तार करि टानाटानि॥ 359॥ तेषां मतम्; अपरे तु शैवा एव बहवः, पाषण्डास्तु महाप्रबला भूयांस एव। किन्तु भट्टाचार्य! रामानन्द-मतमेव मे रुचितम्।” अनुवाद—महाप्रभुकी लीलाएँ अनन्त हैं, उन्हें अर्थात् श्रीकृष्णचैतन्य—हे सार्वभौम ! मैं इतनी दूर कहनेका सामर्थ्य मुझमें नहीं है। तथापि लोभवशतः तक घूमते हुए गया, किन्तु आपके समान कोई नहीं लज्जाको खाकर अर्थात् निर्लज्ज होकर मैं उन दिखा, केवलमात्र एक रामानन्दराय ही मिले, वे लीलाओंको वर्णन करनेकी चेष्टा कर रहा हूँ॥ 359॥ अलौकिक ही हैं। 400 ।

नौवाँ अध्याय [right-aligned: 9/359-362 ]

अनुभाष्य— 'लज्जा खाञा'—लज्जाका सिर खाकर (निर्लज्ज होकर); 'तार'—श्रीचैतन्यलीलाका ॥ 359 ॥

महाप्रभुकी तीर्थयात्राके छलसे लोगोंके उद्धारकी कथाके श्रवणका फल :— प्रभुर तीर्थयात्रा-कथा शुने येइ जन। चैतन्यचरणे पाय गाढ़ प्रेमधन ॥ 360 ॥

**अनुवाद—**महाप्रभुकी तीर्थ-यात्राकी कथाको जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है, उसे महाप्रभुके चरणोंमें गाढ़ प्रेमधनकी प्राप्ति होती है ॥ 360 ॥

**अनुभाष्य—**निर्विशेषवादी पञ्चोपासक लोग जगत्में अपने जड़ेन्द्रिय-ज्ञानके अनुरूप परम-तत्त्वके किसी रूपकी कल्पना करके उसे उपास्य मान लेते हैं, किन्तु श्रीमद्भागवत अथवा श्रीकृष्णचैतन्यदेव वैसी इन्द्रिय-भोगमयी उपासनाको 'परमार्थ' नहीं कहते। मायावादी अहंग्रहोपासक परम-तत्त्वको निराकार मानते हैं और उनके जितने भी रूप कहे जाते हैं, वे सब आकाश-कुसुमकी भाँति काल्पनिक हैं। मायावादी और परम-तत्त्वके काल्पनिक रूपकी उपासना करनेवाले, दोनों ही भ्रान्त हैं। उनके विचारके अनुसार भगवान्‌के श्रीविग्रह अथवा उनके किसी अन्य रूपकी उपासना बद्धजीवका भ्रम है। परन्तु श्रीगौरसुन्दरने श्रीमद्भागवतके प्रतिपाद्य अचिन्त्य-भेदाभेद-विचारके अनुसार वैसे कर्मी, ज्ञानी और योगियोंकी अनुभूतिकी अकर्मण्यताको (निकम्मेपनको) प्रदर्शित किया है। महाप्रभुने सर्वत्र तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए मन्दिरोंमें भगवान्‌के नाम रूप-गुण-लीलाका परिचय देनेवाली भगवद्-वस्तुका ही दर्शन किया था। वैष्णव लोग जब शिवादि विभिन्न देवताओंके मन्दिरमें उनके दर्शन करते हैं, तो उनका दर्शन अवैष्णवोंके दर्शनसे भिन्न होता है, इसे बतानेके लिये ही महाप्रभुने वहाँ अधोक्षज वस्तुका ही दर्शन किया। आत्मवृत्तिसे अधोक्षज वस्तुका दर्शन और जड़ेन्द्रियोंके द्वारा मूर्ति-दर्शन, दोनों सम्पूर्ण रूपसे विपरीत भावमें अवस्थित हैं,—यही गौर-दासोंका अनुसरणीय विषय हैं। श्रीकृष्णकी परिकर गोपियोंकी कात्यायनीकी पूजाका लक्ष्य गोपीजनवल्लभको उपपति रूपमें पाना था। प्राकृत सहजिया लोग “महामाया” आदि अनेकानेक देवताओंको भोग प्रदान करनेवाले यन्त्रके रूपमें देखते हैं, इसलिये वे अपने इन देवी-देवताओंकी पूजाके साथ गोपियोंकी पूजाको 'एक' अथवा 'समान' मानकर विवर्त्तवादके गड्ढेमें गिरते हैं। श्रौतपन्था अर्थात् गुरु-परम्पराको समझ नहीं पानेके कारण तर्कपन्थी पञ्चोपासना विधिका प्रचार करते हैं। (विष्णु, शिव, दुर्गा, गणेश और सूर्य) पाँच उपास्य देवताओंमेंसे अन्योंका त्यागकर एकको ही 'परमेश्वर' मानकर उनको भी विश्वमें निर्विशेष ब्रह्मका प्रतीक मानकर जो दर्शन है, वही 'पञ्चोपासना' है। वैसा दर्शन मूर्तिपूजाके ही अन्तर्गत है, वही बादमें मायावादियोंके निर्विशेषवादमें परिणत हुआ है। श्रीकृष्ण दर्शनके अभावके कारण ही जीव अवैष्णव होकर पञ्चोपासक बनता है, और कभी नास्तिक बनता है। किन्तु महाप्रभुने शुद्धभक्तोंके विषयमें कहा है,—“स्थावर जङ्गम देखे, ना देखे तार (स्थावरजङ्गमरे) मूर्ति। सर्वत्र स्फुरये ताँर इष्टदेव मूर्ति॥” अर्थात् न तो उन्हें स्थावर-जङ्गम दिखायी देता है, न ही उनकी मूर्ति (आकार) दिखायी देती है, बस सर्वत्र उन्हें अपने इष्टदेवकी ही स्फूर्ति होती है ॥ 360 ॥

श्रीकृष्णचैतन्यमें दृढ़-श्रद्धा और छलरहित मनसे हरि-सङ्कीर्त्तन ही जीवोंका एकमात्र परमधर्म :— चैतन्यचरित शुन श्रद्धा-भक्ति करि'। मात्सर्य छाड़िया मुखे बल 'हरि' 'हरि' ॥ 361 ॥

**अनुवाद—**हे श्रोताओं! महाप्रभुके चरित्रका श्रद्धा-प्रेम सहित श्रवण कीजिये और मात्सर्यकी भावनाको त्यागकर मुखसे 'हरि' 'हरि' सङ्कीर्तन कीजिये ॥ 361 ॥

इसे छोड़कर “नान्य पन्था विद्यतेऽयनाय” :— एइ कलिकाले आर नाहि कोन धर्म। वैष्णव, वैष्णवशास्त्र, एइ कहे मर्म ॥ 362 ॥

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[ 9/361-365 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इस कलिकालमें श्रीहरिनाम सङ्कीर्त्तनके नौवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त॥ अतिरिक्त और कोई भी धर्म नहीं है। सभी वैष्णव एवं श्रीश्रीचैतन्यचन्द्रकी लीलाका असमोर्द्ध गाम्भीर्य वैष्णव शास्त्रोंकी कथाका यही सार है॥ 362 ॥ और ग्रन्थकारका सहज दैन्य :— अमृतप्रवाह भाष्य—अन्य जीवोंके प्रति स्वाभाविक चैतन्यचन्द्रेर लीला—अगाध, गम्भीर। दयाके साथ अर्थात् उनके प्रति ईर्ष्यावृत्ति (भोगबुद्धिके प्रवेश करिते नारि,—स्पर्शि रहि' तीर ॥ 363 ॥ कारण उन्हें श्रीकृष्णके वि मुख करनेकी चेष्टा) सम्पूर्ण रूपसे परित्याग करके मुखसे 'हरि' 'हरि' बोलो। (इसके अनुवाद—श्रीचैतन्यचन्द्रकी लीला अगाध एवं गम्भीर अतिरिक्त) इस कलिकालमें अन्य कोई धर्म नहीं (गहरी) है। मैं उसमें प्रवेश नहीं कर सकता, परन्तु है,—शुद्धवैष्णव-सेवा, शुद्धवैष्णव-शास्त्र पाठ करना ही उसके तटपर रहकर केवल उसका स्पर्श कर रहा जीवोंका एकमात्र धर्म है॥ 361-362 ॥ हूँ॥ 363 ॥ नौवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त॥ श्रीचैतन्यमहाप्रभुके अनुशीलनसे श्रीकृष्णमें प्रीति-प्राप्ति :— अनुभाष्य—वैष्णवों और वैष्णव-शास्त्रोंकी सारकथा चैतन्यचरित श्रद्धाय सुने येइ जन। यह है कि विश्वाससहित भक्तिपूर्वक श्रीचैतन्यलीला यतेक विचारे, तत पाय प्रेमधन ॥ 364 ॥ श्रवण करनेसे जीवोंमें मात्सर्य नहीं रह सकता। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। कलिकालमें निर्मत्सर शुद्धजीवोंके लिये श्रीगौरपादाश्रित चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 365 ॥ होकर हरिनाम-कीर्त्तन ही एकमात्र सनातन धर्म है। 'वैष्णव'—शुद्धभक्त महाजन अथवा विद्वत्-अनुभवी; इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे दक्षिणदेशतीर्थ-भ्रमणं 'वैष्णव-शास्त्र'—श्रुति अथवा शब्द प्रमाण; दोनोंका नाम नवम-परिच्छेदः॥ अनुसरण ही श्रौतपन्थामें अवस्थान है। चरम कल्याणकी अनुवाद—श्रीचैतन्यचरितको जो श्रद्धापूर्वक सुनता अकाङ्क्षा रखनेवाले व्यक्तिमात्रके लिये इसके अतिरिक्त है और सुनकर उसपर जितना विचार करता है, उतना अन्य कोई उपाय नहीं है। (भाः 11/19/17)— ही उसे महाप्रभुके चरणोंमें प्रेमरूपी धन प्राप्त होता है। “श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम्। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते॥” करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन अर्थात् “श्रुति, प्रत्यक्ष, ऐतिह्य (इतिहास) और कर रहा है॥ 364-365 ॥ अनुमान—इन चार प्रमाणोंके द्वारा स्वर्गादि-भोगरूप सभी विकल्पोंका सर्वकालिक अवस्थानका अभाव अर्थात् श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें दक्षिणदेश-तीर्थ-भ्रमण इनकी नश्वरता दिखायी देनेपर जीव इनसे विरक्त हो नामक नौवें अध्यायका अनुवाद समाप्त॥ जाता है॥” 361-362 ॥ 402 ।

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दसवाँ अध्याय कथासार-महाप्रभुने जब दक्षिण भारतकी यात्राके लिये गये, तब उनके विषयमें श्रीसार्वभौमके साथ राजा प्रतापरुद्रकी बहुत बातचीत हुई। राजाने महाप्रभुके दर्शन करनेकी अभिलाषा प्रकट की। तब श्रीसार्वभौमने कहा था कि महाप्रभुके लौटकर आनेपर वे उनके साथ किसी प्रकारसे साक्षात्कार करा देंगे। महाप्रभु लौटकर आनेके बाद काशीमिश्रके घरमें रहने लगे। श्रीसार्वभौमने श्रीमहाप्रभुके साथ क्षेत्रवासी वैष्णवोंका परिचय करा दिया। श्रीरामानन्द रायके पिता श्रीभवानन्द रायने अपने पुत्र श्रीवाणीनाथ पट्टनायकको महाप्रभुको सौंप दिया। जब महाप्रभुने काला कृष्णदासके भट्टथारिसे मिलनके दोषको व्यक्त करके उसे विदायी देनेका प्रस्ताव रखा, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु और अन्यान्य भक्तोंने युक्ति करके, उसके द्वारा श्रीनवद्वीपमें एवं गौड़देशमें सर्वत्र महाप्रभुके लौट आनेका संवाद भिजवाया। नवद्वीपादि स्थानोंपर संवाद पहुँचनेपर भक्त लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये आनेके लिये तैयारी करने लगे। इसी समय श्रीपरमानन्दपुरीने नदीया-नगरमें आकर जब महाप्रभुके नीलाचलमें पहुँचनेका संवाद श्रवण किया, तब वे ब्राह्मण कमलाकान्तको साथ लेकर पुरुषोत्तम क्षेत्रमें महाप्रभुके पास पहुँचे। नवद्वीपवासी पुरुषोत्तम भट्टाचार्य वाराणसीमें 'चैतन्यानन्द' नामक गुरुसे संन्यास ग्रहण करके 'स्वरूप' नाम ग्रहण करके नीलाचलमें महाप्रभुके चरणोंमें उपस्थित हुए। श्रीईश्वरपुरीके अप्रकट होनेके बाद उनके सेवक 'गोविन्द' उनकी आज्ञासे महाप्रभुके पास आये। केशव-भारतीके सम्पर्कसे ब्रह्मानन्द-भारती महाप्रभुके पूजनीय थे; उनके उपस्थित होनेपर महाप्रभुने कृपा करके उनका चर्म्माम्बर (चमड़ेका वस्त्र) छुड़वाया। महाप्रभुके प्रभावसे ब्रह्मानन्दने महाप्रभुके माहात्म्यको जानकर उन्हें 'कृष्ण' मानकर स्वीकार किया। जब श्रीसार्वभौमने महाप्रभुको 'कृष्ण' कहकर निर्देश किया, तब महाप्रभुने उनकी बातको 'अतिस्तुति' कहकर उस बातका अनादर किया। (इसी बीच एकदिन) काशीश्वर गोस्वामी आकर उपस्थित हुए। इस अध्यायमें, समुद्रमें नद-नदी-मिलनकी भाँति महाप्रभुके साथ बहुतसे देशोंके भक्तोंके मिलनका वर्णन हुआ है। —(अमृतप्रवाहभाष्य) भक्तोंके जीवनधन श्रीगौरको प्रणाम :— तं वन्दे गौरजलदं स्वस्य यो दर्शनामृतैः। विच्छेदावग्रम्लान-भक्तशस्यान्यजीवयत् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने अपने दर्शनामृत-वर्षणके द्वारा विच्छेदरूप अकालके द्वारा मुरझाये हुए भक्तरूपी धान्योंको जीवित किया था, उन गौररूप मेघकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— यः (श्रीकृष्णचैतन्यदेवः) स्वस्य (निजश्रीमूर्त्तेः) दर्शना- मृतैः (निजदर्शनान्येव अमृ़तानि पीयूषाणि तैः) विच्छेदावग्रम्लानभक्तशस्यानि (विच्छेदः अनुपस्थितिजन्य-विरहः एव अवग्रहः वर्षणाभावः तेन म्लानानि भक्तरूप-शस्यानि) अजीवयत् (प्राणदानेन रक्षयामास) तं गौरजलदं (श्रीचैतन्यमेघम्) अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, समस्त श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो ॥ 2 ॥ । 405

[ 10/3-12 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुके दक्षिण भ्रमणके समय राजाप्रतापरुद्र और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका वार्त्तालाप :- पूर्वे यबे महाप्रभु चलिला दक्षिणे। प्रतापरुद्र राजा तब बोलाइल सार्वभौमे॥ ३॥ राजाके द्वारा महाप्रभुके परिचयकी जिज्ञासा और उनके दर्शनकी आकाङ्क्षा :- बसिते आसन दिल करि' नमस्कारे। महाप्रभुर वार्त्ता तब पुछिल ताँहारे॥ ४॥ “शुनिलाङ तोमार घरे एक महाशय। गौड़ हइते आइला, तेंहो-महा-कृपामय॥ ५॥ तोमारे बहु कृपा कैला, कहे सर्वजन। कृपा करि' कराह मोरे ताँहार दर्शन॥" ६॥ अनुवाद-महाप्रभु जब दक्षिण भारतकी यात्राके लिये चले गये, तब राजा प्रतापरुद्रने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको अपने महलमें बुलवाया था। उनके आनेपर महाराज प्रतापरुद्रने उन्हें प्रणाम किया और बैठनेके लिये आसन दिया। तब वे श्रीसार्वभौमसे महाप्रभुके सम्बन्धमें पूछने लगे,-“मैंने सुना है कि गौड़देशसे एक महापुरुष आये हैं और वे आपके घरमें रह रहे हैं। मैंने यह भी सुना है कि वे महा-कृपालु हैं और लोग कह रहे हैं कि उन्होंने आपपर बहुत कृपा की है। इसलिये आप कृपा करके मुझे भी उनके दर्शन करा दीजिये॥" ३-६॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुके आचरणका वर्णन :- भट्ट कहे,-“ये शुनिला सब सत्य हय। ताँर दर्शन तोमार घटन ना हय॥ ७॥ विरक्त संन्यासी तेंहो रहेन निर्जने। स्वप्नेह ना करेन तेंहो राजदरशने॥ ८॥ तथापि प्रकारे तोमा कराइताम दरशन। सम्प्रति करिला तेंहो दक्षिण गमन॥" ९॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,-“आपने जो सुना है, वह सब सत्य है, परन्तु आपको उनके दर्शन नहीं मिलेंगे। यद्यपि वे एकान्तमें वास करनेवाले विरक्त संन्यासी हैं और वे स्वप्नमें भी राजाका दर्शन नहीं करते, तथापि मैं आपको किसी प्रकार उनका दर्शन कराता, परन्तु अभी तो वे दक्षिण भारतकी यात्रापर गये हुए हैं॥" ७-९॥ राजाके द्वारा महाप्रभुके पुरुषोत्तम परित्याग करनेके कारणकी जिज्ञासा :- राजा कहे, - "जगन्नाथ छाड़ि' केने गेला।" भट्ट कहे, - "महान्तेर एइ एक लीला ॥ १०॥ भट्टाचार्यका सद्-उत्तर :- तीर्थ पवित्र करिते करे तीर्थभ्रमण। सेइ छले निस्तारये सांसारिक जन॥ ११॥ अनुवाद-यह सुनकर राजाने कहा,-“वे श्रीजगन्नाथ पुरीको छोड़कर क्यों गये?" श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,-"महापुरुषोंकी यह एक लीला है, वे तीर्थोंको पवित्र करनेके उद्देश्यसे तीर्थोंमें भ्रमण करते हैं। इस बहानेसे वे तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए सांसारिक लोगोंका उद्धार कर रहे हैं॥ १०-११॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/39 संख्या देखें और (भाः 4/30/37)- “तेषां विचरतां पद्भ्यां तीर्थानां पावनेच्छया। भीतस्य किं न रोचेत तावकानां समागमः ॥" अर्थात् “प्रचेतागण श्रीजनार्दनसे बोले,-हे भगवन्! आपके भक्त सभी तीर्थोंको पवित्र करनेके लिये पैदल ही भ्रमण करते हैं। इसलिये संसारसे भयभीत किस व्यक्तिके लिये उनका समागम रुचिकर नहीं होगा?" ॥ १०-११॥ श्रीमद्भागवत (1/13/10)- भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो। तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता॥ १२॥ अनुवाद-आपके जैसे भागवतजन स्वयं तीर्थस्वरूप हैं। आप लोग अपने अन्तःस्थित भगवान्की पवित्रताके 406 ।

दसवाँ अध्याय 10/12-20 ] बलसे पापियोंके पापोंसे मलिन सभी तीर्थोंको पवित्र करते हैं॥12॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/63 संख्या देखें॥12॥ दीनजनोंका उद्धार करना ही महान्त लोगोंका स्वभाव है, उसपर भी वे स्वेच्छामय परमेश्वर हैं :- वैष्णवेर हय एइ एक स्वभाव निश्चल। तेंहो जीव नहेन, हन स्वतन्त्र ईश्वर ॥”13 ॥ अनुवाद-वैष्णवोंका ऐसा ही निश्चल स्वभाव होता है और वे तो जीव नहीं, स्वतन्त्र ईश्वर हैं॥13॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैष्णवोंका यह एक अचल स्वभाव है—‘तीर्थोंको पवित्र करनेके लिये तीर्थभ्रमण और उसके छलसे सांसारिक लोगोंका उद्धार करना।' वास्तवमें श्रीकृष्णचैतन्य-‘जीव' नहीं हैं, वे-स्वतन्त्र ईश्वर हैं, तथापि उन्होंने गुप्तरूपसे भक्तावतार होकर वैष्णवों जैसा स्वभाव ग्रहण किया है॥"13॥ अनुभाष्य-श्रीभागवतगण तीर्थोंमें जाकर उन्हें पवित्र करते हैं और तीर्थमें जानेके बहानेसे तीर्थवासी सांसारिक लोगोंका उद्धार करते हैं—यही परदुःख-दुःखी (दूसरोंके दुःखमें दुःखी) शुद्धभक्तोंका नित्य स्वभाव है। किन्तु श्रीमहाप्रभु परतन्त्र भक्तरूपमें लीला करनेपर भी स्वयं स्वतन्त्र परमेश्वर हैं। 'निश्चल'–अचल, सनातन, नित्य ॥ 13 ॥ राजाके द्वारा भट्टाचार्यसे शिकायत :- राजा कहे,-"ताँरे तुमि याइते केने दिले? पाय पड़ि' यत्न करि' केने ना राखिले ? ॥" 14 ॥ अनुवाद-तब राजा प्रतापरुद्रने कहा, - "आपने उनको जाने क्यों दिया ? उनके चरणोंमें पड़कर आग्रह करके उन्हें रोक क्यों नहीं लिया ? ॥"14॥ राजाको वैधभक्तके भाँति श्रीभट्टाचार्यका उत्तर देना :- भट्टाचार्य कहे,- “तेंहो स्वयं ईश्वर स्वतन्त्र। साक्षात् श्रीकृष्ण, तेंहो नहे परतन्त्र ॥ 15 ॥ तथापि राखिते ताँरे महायत्न कैलुँ। ईश्वरेर स्वतन्त्र भाव, राखिते नारिलुँ ॥”16 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उत्तर दिया, - "वे स्वयं ईश्वर और परम स्वतन्त्र हैं। वे साक्षात् श्रीकृष्ण हैं, वे परतन्त्र नहीं हैं। तथापि मैंने उन्हें रोकनेका बहुत प्रयास किया, परन्तु भगवान्‌की अपनी स्वतन्त्र इच्छा है, मैं उन्हें रोक नहीं पाया ॥"15-16 ॥ महापण्डित भट्टाचार्यके वचनोंपर राजाका विश्वास :- राजा कहे,- "भट्ट, तुमि विज्ञशिरोमणि । तुमि ताँरे 'कृष्ण' कह, ताते सत्य मानि ॥ 17 ॥ राजाकी एक बार महाप्रभुके दर्शनकी आकाङ्क्षा :- पुनरपि इँहा ताँर हैले आगमन। एकबार देखि' करि सफल नयन ॥”18॥ अनुवाद-राजाने कहा, - "हे भट्टाचार्य ! आप विद्वानोंमें शिरोमणि हैं। आप उन्हें साक्षात् 'श्रीकृष्ण' कह रहे हैं, तो मैं इसे सत्य मानता हूँ। जब वे यहाँ लौटकर आयेंगे, तब उनका एकबार दर्शन करके मैं भी अपने नेत्रोंको सफल करना चाहता हूँ ॥"17-18 ॥ अनुभाष्य-महाजनके वाक्यमें विश्वास करनेसे राजाका मङ्गल और उनमें भक्तिका उदय हुआ॥ 17 ॥ महाप्रभुके शीघ्र आनेके समाचारका ज्ञापन और राजाको महाप्रभुके योग्य वास-स्थानके निर्देशका अनुरोध :- भट्टाचार्य कहे,- “तेंहो आसिबे अल्पकाले। रहिते ताँर एक स्थान चाहिये विरले ॥ 19 ॥ ठाकुरेर निकट, आर हइबे निर्जने। एमत निर्णय करि' देह' एक स्थाने ॥"20 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, - "वे शीघ्र ही लौट आयेंगे, किन्तु उनके रहनेके लिये एक एकान्त और शान्त स्थानकी आवश्यकता है। वह स्थान ठाकुरके (श्रीजगन्नाथके) मन्दिरके निकट हो और एकान्त भी हो, इस विषयपर विचार करके आप एक स्थानकी व्यवस्था कर दीजिये ॥"19-20 ॥ ॥ 407

[ 10/21–26 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला राजाके द्वारा काशीमिश्रके भवनका निर्देश :- राजा कहे,—“ऐछे काशीमिश्रेर भवन। ठाकुरेर निकट, हय परम निर्जन॥” २१॥ अनुवाद—राजाने कहा,—“ऐसा स्थान तो काशीमिश्रका घर है। वह श्रीजगन्नाथ-मन्दिरके निकट तथा अत्यन्त निर्जन-शान्त स्थान है॥” २१॥ अनुभाष्य—‘काशीमिश्रेर भवन’—श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें मन्दिरसे कुछ दक्षिणकी ओर बालिसाहिके अन्तर्गत वर्तमान श्रीराधाकान्त मठ है; श्रीमन्महाप्रभु वहाँ वास करते थे। श्रीवक्रेश्वर पण्डितके शिष्य श्रीगोपालगुरु थे और उनके शिष्य श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामीने वहाँ श्रीविग्रह स्थापित किये थे। वह स्थान श्रीजगन्नाथदेव-मन्दिरके निकटमें है और उस समय वह निर्जन स्थान था॥ २१॥ राजाकी महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा :- एत कहि’ राजा रहे उत्कण्ठित हञा। भट्टाचार्य काशीमिश्रे कहिल आसिया॥ २२॥ अनुवाद—ऐसा कहकर राजा उत्कण्ठित होकर महाप्रभुके लौटनेकी प्रतीक्षा करने लगे। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीकाशीमिश्रके पास आकर उन्हें राजाकी इच्छा बतलायी॥ २२॥ काशीमिश्रको राजाका आदेश बताना और सुनकर मिश्रका आनन्द :- काशीमिश्र कहे,—“आमि बड़ भाग्यवान्। मोर गृहे ‘प्रभुपादेर’ हवे अवस्थान॥” २३॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीकाशीमिश्रने कहा,—“मैं बहुत भाग्यवान् हूँ। मेरे घरमें ‘प्रभुपाद’ (महाप्रभु) वास करेंगे॥” २३॥ अनुभाष्य—स्वयं भगवान् श्रीमन्महाप्रभुको उनके दासका अभिमान रखनेवाले जीवमात्र ही ‘प्रभुपाद’ कहकर पुकारते हैं। श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु और श्रीमद् अद्वैत प्रभु—ये दोनों भी उसी प्रकार ‘प्रभुपाद’के नामसे कहे जाते हैं, क्योंकि सभी विषय-विग्रह विष्णुतत्त्व हैं एवं विष्णु ही जीवोंके नित्य प्रभु हैं। और भी, श्रीकृष्णतत्त्ववेत्ता आश्रय-विग्रह श्रीगुरुदेव भी लघु-शिष्यके लिये साक्षात् ‘कृष्णचैतन्य’ अथवा ‘हरि’ स्वरूप होनेके कारण ‘ॐ विष्णुपाद’ कहलाते हैं। श्रीगुरुदेवके अतिरिक्त अन्यान्य शुद्धभक्तों अथवा शुद्ध-वैष्णवोंको उनके सभी शिष्य-स्थानीय जीव ‘श्रीपाद’के नामसे बुलाते हैं। किन्तु श्रीगुरुदेव और वैष्णव एवं उनके द्वारा अङ्गीकार किये गये शिष्य, सभी एक-दूसरेको पूज्य-द्योतक ‘प्रभु’ शब्दके द्वारा सम्बोधन करते हैं। इसी सत् सिद्धान्तका प्रचुर व्यवहार भागवत, चैतन्यचरितामृत, चैतन्यभागवतादि प्रमाणिक ग्रन्थों और शुद्धभक्त-सम्प्रदायमें देखा जाता है। प्राकृत-सहजिया वैष्णव कहलाने योग्य नहीं हैं। उनके सम्प्रदायमें तथाकथित गोस्वामियों और उनके मूर्ख शिष्योंके द्वारा मुखसे अपनेको ‘वैष्णव-दासानुदास’, ‘वैष्णव-दासाभास’ कहना दीनताकी आड़में छल या कपटता है। उनका कहना है कि जात-गोस्वामी ही ‘प्रभुपाद’ कहलानेके अधिकारी हैं। जाति-बुद्धिकी प्रबलताके कारण वे यथार्थ श्रीकृष्णतत्त्वविद् गुरु अथवा वैष्णवोंमें मर्त्य-बुद्धि रखकर उनको ‘प्रभुपाद’ सम्बोधनके योग्य नहीं मानते,—यह उनके दुर्भाग्यका परिचायक और नरककी यात्राका सहायक मात्र है॥ २३॥ पुरीवासियोंकी महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा :- एइमत पुरुषोत्तमवासी सर्वजन। प्रभुके मिलिते सबार उत्कण्ठित मन॥ २४॥ सेवाकी उत्कण्ठा ही भक्त और भगवान्‌के मिलनका सूत्र; महाप्रभुका दक्षिणसे आगमन :- सर्वलोकेर उत्कण्ठा यबे अत्यन्त बाड़िल। महाप्रभु दक्षिण हैते त्वराय आइल॥ २५॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये सभीकी भट्टाचार्यसे प्रार्थना :- शुनि’ आनन्दित हैल सबाकार मन। सबे आसि’ सार्वभौमे कैल निवेदन॥ २६॥ 408 ।

दसवाँ अध्याय 10/24-36 ] “प्रभुर सहित आमा-सबार कराह दरशन। तोमार प्रसादे पाइ प्रभुर चरण॥” 27॥ अनुवाद—इस प्रकार पुरुषोत्तमवासी सभी लोगोंका मन महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठित हो रहा था। जब सब लोगोंकी उत्कण्ठा बहुत बढ़ गयी, तब महाप्रभु दक्षिण भारतसे तुरन्त आ गये। महाप्रभुके आनेका समाचार सुनकर सभीका मन प्रसन्न हो गया। सब आकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे प्रार्थना करने लगे,—“हम सबको महाप्रभुके दर्शन कराइये। आपकी कृपासे ही हमें महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति हो सकती है॥” 24-27॥ काशीमिश्रके घरमें महाप्रभुके साथ मिलनेका सभीको आश्वासन :— भट्टाचार्य कहे,—“कालि काशीमिश्रेर घरे। प्रभु याइबेन ताँहा, मिला’ब सबारे॥” 28॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“कल महाप्रभु काशीमिश्रके घर जायेंगे। वहीं मैं आप सबको उनके दर्शन कराऊँगा॥” 28॥ दूसरे दिन महाप्रभुके द्वारा जगन्नाथ-दर्शन और पण्डागणोंके साथ मिलन :— आर दिन महाप्रभु भट्टाचार्येर सङ्गे। जगन्नाथ-दरशन कैल महारङ्गे॥ 29॥ महाप्रसाद दिया ताँहा मिलिला सेवकगण। महाप्रभु सबाकारे कैल आलिङ्गन॥ 30॥ अनुवाद—अगले दिन महाप्रभु श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करने गये। श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंने महाप्रभुसे मिलकर उन्हें महाप्रसाद दिया और महाप्रभुने उन सबका आलिङ्गन किया॥ 29-30॥ भट्टाचार्यका महाप्रभुको काशी मिश्रके घरपर लाना :— दर्शन करि’ प्रभु चलिला बाहिरे। भट्टाचार्य आनिल ताँरे काशीमिश्र-घरे॥ 31॥ महाप्रभुके चरणोंमें काशीमिश्रका आत्मसमर्पण :— काशीमिश्र आसि’ पड़िल प्रभुर चरणे। गृह-सहित आत्मा ताँरे कैल निवेदने॥ 32॥ काशीमिश्रको चतुर्भुज-मूर्तिका दर्शन :— प्रभु चतुर्भुज-मूर्त्ति ताँरे देखाइल। आत्मसात् करि’ ताँरे आलिङ्गन कैल॥ 33॥ अनुवाद—भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करके महाप्रभु मन्दिरसे बाहर चले और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य उन्हें काशीमिश्रके घर ले आये। महाप्रभुको देखकर श्रीकाशीमिश्र उनके चरणोंमें गिर पड़े और उन्होंने घरके साथ-साथ अपने आपको भी महाप्रभुके श्रीचरणोंमें समर्पित कर दिया। महाप्रभुने श्रीकाशीमिश्रको अपने चतुर्भुज रूपका दर्शन कराया और उन्हें अपने दासके रूपमें स्वीकार करके उनका आलिङ्गन किया॥ 31-33॥ अमृतप्रवाह भाष्य—काशीमिश्रने अपना घर और सेवा करने योग्य अपना शरीर भी महाप्रभुको समर्पित कर दिया॥ 32॥ सभीके द्वारा आसन ग्रहण :— तबे महाप्रभु ताँहा बसिला आसने। चौदिके बसिला नित्यानन्दादि भक्तगणे॥ 34॥ अनुवाद—तब महाप्रभु वहाँ आसनपर बैठ गये और श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि भक्तगण उनके चारों ओर बैठ गये॥ 34॥ योग्य वासस्थान-निर्वाचन देखकर महाप्रभुको आनन्द :— सुखी हैला देखि’ प्रभु वासार संस्थान। येइ वासाय हय प्रभुर सर्व-समाधान॥ 35॥ अनुवाद—महाप्रभु अपने रहनेके स्थानको देखकर बहुत प्रसन्न हुए, क्योंकि ऐसे स्थानपर उनकी आवश्यकता अनुसार सब व्यवस्था थी॥ 35॥ महाप्रभुको घर स्वीकार करनेकी प्रार्थना :— सार्वभौम कहे,—“प्रभु, योग्य तोमार वासा। तुमि अङ्गीकार कर,—काशीमिश्रेर आशा॥” 36॥ । 409

[ 10/36-43 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“प्रभो! यह निवासस्थान आपके योग्य है। कृपा करके इसे स्वीकार करके काशीमिश्रकी आशाको पूर्ण कीजिये॥” 36॥ अमृतप्रवाह भाष्य—काशीमिश्रकी यही आशा है कि आप उनके घरमें वास करे,—इसे आप कृपा करके स्वीकार कीजिये॥ 36॥ महाप्रभुके द्वारा अपने भक्तकी वश्यता-ज्ञापन :— प्रभु कहे,—“एइ देह तोमा-सबाकार। येइ तुमि कह, सेइ कर्त्तव्य आमार॥” 37॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“यह देह तो आप सबकी ही है। आप लोग जैसा कहेंगे, वैसा करना ही मेरा कर्त्तव्य है॥” 37॥ श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुको पुरीवासी भक्तोंका परिचय प्रदान :— तबे सार्वभौम प्रभुर दक्षिण-पार्श्वे बसि'। मिलाइते लागिला सब पुरुषोत्तमवासी॥ 38॥ अनुवाद—तब श्रीसार्वभौम महाप्रभुके दाहिनी ओर बैठ गये और वे सब पुरुषोत्तमवासियोंको महाप्रभुसे मिलवाने लगे॥ 38॥ पुरीवासियोंके द्वारा महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा-ज्ञापन और महाप्रभुकी कृपाके लिये प्रार्थना :— “एइ सब लोक, प्रभु, वैसे नीलाचले। उत्कण्ठित हञाछे सबे तोमा मिलिबारे॥ 39॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये तृष्णासे युक्त पुरीवासी भक्त :— तृषित चातक यैछे करे हाहाकार। तैछे एइ सब, —सबे कर अङ्गीकार॥ 40॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“ये सब लोग नीलाचलमें रहते हैं और आपसे मिलनेके लिये बड़े ही उत्कण्ठित हैं। जैसे प्यासा चातक पानीके लिये हा-हाकार करता है, आपके दर्शनके बिना इनकी स्थिति भी वैसी है, आप इन्हें अङ्गीकार कीजिये॥ 39-40॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पाठान्तरमें—'तैछे एइ सब, सबा कर अङ्गीकार' अर्थात् जिस प्रकार प्यासा चातक जलके लिये हाहाकार करता है, उसी प्रकार ये सब उत्कलवासी आपके दर्शनोंके लिये प्यासे हैं; प्रभो! आप सभीको ही स्वीकार कीजिये॥ 40॥ (1) जनार्दन :— जगन्नाथ-सेवक एइ, नाम-जनार्द्दन। अनवसरे करे प्रभुर श्रीअङ्ग-सेवन॥ 41॥ अनुवाद—(भक्तोंसे परिचय कराते हुए श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य कह रहे हैं)—ये भगवान् श्रीजगन्नाथके सेवक हैं, इनका नाम जनार्दन है। अनवसरके समय ये श्रीजगन्नाथके श्रीविग्रहकी सेवा करते हैं॥ 41॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अनवसरे'—स्नानयात्राके बादसे 'नवयौवन'-दर्शन तक अनवसर-काल है॥ 41॥ (2) कृष्णदास, (3) शिखि माहति :— कृष्णदास-नाम एइ सुवर्ण-वेत्रधारी। शिखि माहाति-नाम एइ लिखनाधिकारी॥ 42॥ अनुवाद—ये कृष्णदास हैं, ये स्वर्णकी छड़ी धारण करते हैं। और इनका नाम शिखि माहति है, ये लेखन अधिकारी हैं अर्थात् ये पञ्जिका आदि लिखनेका कार्य करते हैं॥ 42॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'लिखन अधिकारी'—मन्दिरके पद-प्राप्त कर्मचारी, जो मात्ला-पञ्जिका लिखते हैं॥ 42॥ अनुभाष्य—'शिखि माहाति'—अन्त्यलीला 2/105-106 संख्या और आदिलाला 10/137 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 42॥ (4) प्रद्युम्न मिश्र :— प्रद्युम्नमिश्र इँह वैष्णव प्रधान। जगन्नाथेर महा-सोयार इँह 'दास' नाम॥ 43॥ अनुवाद—ये वैष्णवोंमें प्रधान प्रद्युम्नमिश्र हैं। ये 410 ।

दसवाँ अध्याय 10/43-50 ] श्रीजगन्नाथके प्रधान रसोइया हैं और ये 'दास' नामसे भी जाने जाते हैं॥४३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'महा-सोयार'—महासूपकार (प्रधान रसोइया), प्रधान पाककर्त्ता (प्रधान भोजन बनानेवाला), महानसाधिकारी अर्थात् रसोईका मालिक॥४३॥ अनुभाष्य—'प्रद्युम्नमिश्र'—अन्त्यलीला पाँचवाँ अध्याय देखें। ब्राह्मणोंके विष्णुदासयसूचक नामके बाद 'दास'-शब्दका व्यवहार चुल्लिभट्ट सम्मत है॥४३॥ (5) मुरारि माहाति :— मुरारि माहाति इँह—शिखि माहातिर भाइ। तोमार चरण बिना आर गति नाइ॥४४॥ अनुवाद—ये शिखि माहातिके भाई मुरारि माहाति हैं, आपके चरणकमल ही इनकी एकमात्र गति हैं॥४४॥ (6) चन्दनेश्वर, (7) सिंहेश्वर, (8) मुरारि, (9) विष्णुदास :— चन्दनेश्वर, सिंहेश्वर, मुरारि ब्राह्मण। विष्णुदास,—इँह ध्याये तोमार चरण॥४५॥ अनुवाद—ये चन्दनेश्वर, सिंहेश्वर, मुरारि ब्राह्मण और विष्णुदास हैं,—ये सदा आपके चरणकमलोंका ही ध्यान करते रहते हैं॥४५॥ (10) परमानन्द :— 'प्रहरराज' 'महापात्र' इँह महामति। परमानन्द महापात्र इँहार संहति॥४६॥ अनुवाद—ये परमानन्द प्रहरराज हैं, इन्हें महापात्र भी कहते हैं। ये बहुत बुद्धिमान हैं॥४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'प्रहरराज'—पहराव (एक प्रहरके लिये राजा)॥४६॥ अनुभाष्य—'प्रहरराज'—उत्कलमें राजाओंमें यह नियम प्रचलित है कि मृत राजाकी मृत्यु और अन्त्येष्टिकालसे अगले उत्तराधिकारीके सिंहासन ग्रहण करने अथवा अभिषेकसे पहले तक एक प्रहर कालके लिये राजकुल-पुरोहितवंशका कोई व्यक्ति सिंहासनपर बैठकर राजदण्ड धारण करेगा, जिससे राज सिंहासन खाली न रहे। ये पुरोहितगण ही वंशावलीसे 'प्रहरराज'के नामसे प्रसिद्ध हैं॥४६॥ शुद्ध वैष्णव ही तीर्थोंके अलङ्कार :— ए-सब वैष्णव—एइ क्षेत्रेर भूषण। एकान्तभावे चिन्ते सबे तोमार चरण॥”४७॥ अनुवाद—ये सब वैष्णव इस श्रीजगन्नाथ पुरीके भूषणस्वरूप हैं। ये सब एकान्त भावसे आपके चरणकमलोंका ही चिन्तन करते हैं॥”४७॥ सभीका महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुका आलिङ्गन :— तबे सबे भूमे पड़ि' दण्डवत् हञा। सबा आलिङ्गिला प्रभु प्रसाद करिया॥४८॥ अनुवाद—परिचय होनेके बाद सबने भूमिपर गिरकर महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुने कृपा करके उन सबको आलिङ्गन दान दिया॥४८॥ (11) चार पुत्रों-सहित भवानन्द-रायका परिचय-दान :— हेनकाले आइला तथा भवानन्द राय। चारिपुत्र-सङ्गे पड़े महाप्रभुर पाय॥४९॥ सार्वभौम कहे,—“एइ राय भवानन्द। इँहार प्रथम पुत्र—राय रामानन्द॥”५०॥ अनुवाद—उसी समय वहाँ श्रीभवानन्द राय अपने चार पुत्रोंके साथ आये और सभीने महाप्रभुके चरणोंमें गिरकर उन्हें प्रणाम किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“ये भवानन्द राय हैं। इनके प्रथम पुत्रका नाम राय रामानन्द है॥”४९-५०॥ अनुभाष्य—'चारिपुत्र'—श्रीरामानन्द रायके अतिरिक्त वाणीनाथ, गोपीनाथ, कलानिधि और सुधानिधि—नामक चार भाई॥४९॥ । 411

[ 10/51–61 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुका आलिङ्गन और श्रीरामानन्द- महिमाका कीर्तन :– तबे महाप्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन। स्तुति करि' कहे रामानन्द-विवरण॥ 51 ॥ “रामानन्द-हेन रत्न याँहार तनय। ताँहार महिमा लोके कहन ना जाय॥ 52 ॥ भवानन्द ही पाण्डु, उनके पाँच पुत्र ही पाँच-पाण्डव :– साक्षात् पाण्डु तुमि, तोमार पत्नी कुन्ती। पञ्चपाण्डव तोमार पञ्चपुत्र महामति॥” 53 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने श्रीभवानन्द रायका आलिङ्गन किया और श्रीरामानन्द रायकी प्रशंसा करते हुए उनके बारेमें महाप्रभुने कहा, — “रामानन्द जैसा रत्न जिनका पुत्र हो, उनकी महिमाका जगत्में वर्णन नहीं किया जा सकता। आप साक्षात् महाराज पाण्डु हैं और आपकी पत्नी साक्षात् कुन्तीदेवी हैं। आपके पाँच बुद्धिमान पुत्र पाँच पाण्डव ही हैं॥” 51-53 ॥ भवानन्दकी दीनता; ईश्वरकी कृपा- जातिकुलसे निरपेक्ष :– राय कहे, —“आमि शूद्र, विषयी, अधम। तबु तुमि स्पर्श,—एइ ईश्वर-लक्षण॥ 54 ॥ भवानन्दका महाप्रभुके चरणोंमें सर्वस्व-अर्पण :– निज-गृह-वित्त-भृत्य-पञ्चपुत्र-सने। आत्म समर्पिलुँ आमि तोमार चरणे॥ 55 ॥ महाप्रभुके चरणोंमें वाणीनाथको अर्पण :– एइ वाणीनाथ रहिबे तोमार चरणे। यबे येइ आज्ञा, ताहा करिबे सेवने॥ 56 ॥ निजदास मानकर अङ्गीकार करनेके लिये भवानन्दकी महाप्रभुको प्रार्थना :– आत्मीय-ज्ञाने मोरे सङ्कोच ना करिबे। येइ यबे इच्छा, तबे सेइ आज्ञा दिबे॥” 57 ॥ अनुवाद—महाप्रभुसे अपनी प्रशंसा सुनकर श्रीभवानन्द रायने कहा, — “मैं तो एक शूद्र हूँ, जो विषयोंमें लिप्त है। मैं अधम व्यक्ति हूँ, तो भी आपने मुझे स्पर्श किया। यह आपके ईश्वर होनेका ही प्रमाण है। मैं अपने घर, धन, दासों और पाँचों पुत्रोंके साथ स्वयंको आपके चरणोंमें समर्पित करता हूँ। यह मेरा पुत्र वाणीनाथ सदा आपके श्रीचरणकमलोंमें ही रहेगा। आप इसे जब जो आदेश देंगे, उसी प्रकार आपकी सेवा करेगा। आप मुझे अपना समझकर किसी भी प्रकारका सङ्कोच नहीं कीजियेगा, जब जो इच्छा हो, तब वह आदेश कीजियेगा॥” 54-57 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अर्थात्, मुझे 'आत्मीय' (अपना) जानियेगा, —'आत्मीय' होनेके नाते कृपा कीजियेगा; किसी भी विषयमें सङ्कोच करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ 57 ॥ महाप्रभुकी कृपा-वाणी और अङ्गीकार :– प्रभु कहे, —“कि सङ्कोच, तुमि नह पर। जन्मे जन्मे तुमि आमार सवंशे किङ्कर॥ 58 ॥ दिन-पाँच भितरे आसिबे रामानन्द। ताँर सङ्गे पूर्ण हबे आमार आनन्द॥” 59 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा, — “आप पराये तो नहीं हो, इसलिये आपसे कैसा सङ्कोच? आप तो वंशसहित जन्म-जन्मसे मेरे दास हो। पाँच-सात दिनोंमें रामानन्द भी यहाँ आ जायेंगे। उनके साथ रहकर मेरा आनन्द पूर्ण होगा॥” 58-59 ॥ एत बलि' प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन। ताँर पुत्र सब शिरे धरिल चरण॥ 60 ॥ वाणीनाथको अङ्गीकार :– तबे महाप्रभु ताँरे घरे पाठाइल। वाणीनाथ-पट्टनायके निकटे राखिल॥ 61 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया और अपने चरणकमल उनके सभी पुत्रोंके सिरपर रखे। तब महाप्रभुने श्रीभवानन्द रायको उनके 412 ।

दसवाँ अध्याय 10/60-73 ] घर भेज दिया और वाणीनाथ पट्टनायकको अपने पास रख लिया॥ 60-61 ॥ अनुभाष्य - 'शिरो'- अपने-अपने मस्तकपर ॥ 60 ॥ भट्टाचार्य सब लोके विदाय कराइल। तबे प्रभु काला-कृष्णदासे बोलाइल ॥ 62 ॥ कृष्णदासके पूर्व आचरणका वर्णन :- प्रभु कहे, - “भट्टाचार्य, शुनह इँहार चरित। दक्षिण गियाछिल इँह आमार सहित ॥ 63 ॥ भट्टथारि-काछे गेला आमारे छाड़िया। भट्टथारि हैते इँहारे आनिलुँ उद्धारिया ॥ 64 ॥ महाप्रभुके द्वारा कृष्णदासका परित्याग :- एबे आमि इँहा आनि' करिलाङ विदाय। याँहा इच्छा, याह, आमा-सने नाहि आर दाय ॥” 65 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने तब सब लोगोंको विदा किया। बादमें महाप्रभुने काला कृष्णदासको अपने पास बुलवा लिया। महाप्रभुने कहा, - “हे सार्वभौम भट्टाचार्य ! इसका (काला कृष्णदासका) चरित्र सुनो। यह मेरे साथ दक्षिण भारत गया था। वहाँ मुझे छोड़कर यह भट्टथारि लोगोंके पास चला गया था। मैं इसे भट्टथारि लोगोंके चङ्गलसे छुड़ाकर यहाँ लाया हूँ। मैं इसे यहाँ ले आया हूँ, अब इसके बाद मुझपर इसका कोई दायित्व नहीं है, इसलिये मैं इसे यहाँसे जानेके लिये कह रहा हूँ। अब यह जहाँ जाना चाहे, वहीं चला जाय ॥” 62-65 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला, 10/145 संख्या और मध्यलीला 7/39 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 62 ॥ कृष्णदासका क्रन्दन :- एत शुनि' कृष्णदास कान्दिते लागिल। मध्याह्न करिते महाप्रभु चलि' गेल ॥ 66 ॥ अनुवाद- यह सुनकर कि महाप्रभुने उसका त्याग कर दिया है, कृष्णदास रोने लगा। किन्तु महाप्रभु उसको अनदेखा करके मध्याह्नके भोजनके लिये चले गये॥ 66 ॥ श्रीनित्यानन्दादिका कृष्णदासको नवद्वीप भेजनेका परामर्श :- नित्यानन्द, जगदानन्द, मुकुन्द, दामोदर। चारिजने युक्ति तबे करिला अन्तर ॥ 67 ॥ “गौड़देशे पाठाइते चाहि एकजने। 'आइ'के कहिबे याइ, प्रभुर आगमन ॥ 68 ॥ अद्वैत-श्रीवासादि यत भक्तगण। सबेइ आसिबे शुनि' प्रभुर आगमन ॥ 69 ॥ कृष्णदासको सान्त्वना :- एइ कृष्णदासे दिब गौड़े पाठञा।” एत कहि' तारे राखिलेन आश्वासिया ॥ 70 ॥ अनुवाद-तब श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द, श्रीमुकुन्द और श्रीदामोदर, ये चारों गुप्तरूपसे कुछ योजनापर विचार करने लगे, - “हम एक व्यक्तिको गौड़देशमें भेजना चाहते हैं, जो जाकर शचीमाताको महाप्रभुके दक्षिण भारतसे लौटकर आनेका समाचार दे। श्रीअद्वैत-श्रीवासादि सभी भक्तगण महाप्रभुके आनेका समाचार सुनकर यहाँ आयेंगे। इस कार्यके लिये हम इस कृष्णदासको गौड़देश भेजेंगे।” यह विचार करके उन्होंने कृष्णदासको आश्वस्त करके रख लिया ॥ 67-70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'अन्तर'- गुप्त अथवा दूर जाकर ॥ 67 ॥ महाप्रभुसे अनुमति ग्रहण :- आर दिने प्रभुस्थाने कैल निवेदन। “आज्ञा देह' गौड़-देशे पाठाइ एकजने ॥ 71 ॥ तोमार दक्षिण-गमन शुनि' शचि 'आइ'। अद्वैतादि भक्त सब आछे दुःख पाइ' ॥ 72 ॥ एकजन याइ' कहुक शुभ समाचार।” प्रभु कहे, - “सेइ कर, ये इच्छा तोमार ॥” 73 ॥ । 413

[ 10/71-86 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-अगले दिन सबने महाप्रभुसे निवेदन किया, - "यदि आपकी आज्ञा हो, तो हम एक व्यक्तिको गौड़देश भेज दें। आपके दक्षिण भारत जानेका समाचार सुनकर शचीमाता और श्रीअद्वैतादि सब भक्त बड़े दुःखी हो रहे हैं। इसलिये एक व्यक्ति जाकर उनको आपके लौट आनेका शुभ समाचार दे।" यह सुनकर महाप्रभुने कहा, - "जैसी आप सबकी इच्छा हो, वैसा ही कीजिये ॥" 71-73 ॥ महाप्रसादके साथ कृष्णदासको गौड़देशमें भेजना :- तबे सेइ कृष्णदासे गौड़े पाठाइल। वैष्णव-सबाके दिते महाप्रसाद दिल ॥ 74 ॥ अनुवाद-इस प्रकार काला कृष्णदासको गौड़देश भेज दिया। उसके साथ सभी वैष्णवोंको देनेके लिये प्रचुर मात्रामें श्रीजगन्नाथजीका महाप्रसाद भी भेजा ॥ 74 ॥ कृष्णदासकी गौड़यात्रा और नवद्वीपमें शचीमाताके साथ साक्षात्कार :- तबे गौड़देशे आइला काला-कृष्णदास। नवद्वीपे गेल तँह शची-आइ-पाश ॥ 75 ॥ प्रणाम करनेके बाद सभीको महाप्रभुका संवाद-वर्णन :- महाप्रसाद दिया ताँरे कैल नमस्कार। दक्षिण हैते आइला प्रभु, -कहे समाचार ॥ 76 ॥ अनुवाद-तब काला-कृष्णदास गौड़देशमें आकर सबसे पहले नवद्वीपमें शचीमाताके पास गया। शचीमाताको प्रणाम करके काला कृष्णदासने उन्हें प्रसाद दिया और साथ ही महाप्रभुके दक्षिण भारतसे आ जानेका समाचार सुनाया ॥ 75-76 ॥ महाप्रभुका संवाद सुनकर सभीको आनन्द :- शुनिया आनन्दित हैल शचीमातार मन। श्रीवासादि आर यत यत भक्तगण ॥ 77 ॥ शुनिया सबार हैल परम उल्लास। अद्वैत-आचार्य-गृहे गेला कृष्णदास ॥ 78 ॥ अनुवाद-यह शुभ समाचार सुनकर शचीमाताको बहुत आनन्द हुआ। श्रीवासादि तथा अन्यान्य जितने भी भक्त थे, सभीके हृदयमें इस समाचारको सुनकर उल्लास हो गया। तब कृष्णदास श्रीअद्वैताचार्यके घर गया ॥ 77-78 ॥ श्रीअद्वैतके घर जाकर महाप्रभुका संवाद-वर्णन :- आचार्येरे प्रसाद दिया करि' नमस्कार। सम्यक् कहिल महाप्रभुर समाचार ॥ 79 ॥ अनुवाद-काला कृष्णदासने श्रीअद्वैताचार्यको प्रणाम करके उन्हें प्रसाद दिया और फिर उन्होंने महाप्रभुका समस्त समाचार कह सुनाया ॥ 79 ॥ श्रीअद्वैताचार्यका आनन्द और अन्यान्य गौड़ीय भक्तोंका हर्षित होकर अद्वैतके पास जाना :- शुनि' आचार्य-गोसाञिर आनन्द हइल। प्रेमावेशे बहु नृत्य-गीत-हुँकार कैल ॥ 80 ॥ हरिदास ठाकुरेर हैल परम आनन्द। वासुदेव दत्त, गुप्त मुरारि, सेन शिवानन्द ॥ 81 ॥ आचार्यरत्न, आर पण्डित वक्रेश्वर। आचार्यनिधि, आर पण्डित गदाधर ॥ 82 ॥ श्रीराम पण्डित, आर पण्डित दामोदर। श्रीमान् पण्डित, आर विजय, श्रीधर ॥ 83 ॥ राघवपण्डित, आर आचार्य नन्दन। कतेक कहिब आर यत भक्तगण ॥ 84 ॥ शुनिया सबार हैल परम उल्लास। सबे मेलि' गेला श्रीअद्वैतेर पाश ॥ 85 ॥ आचार्येरे सबे कैल चरण वन्दन। आचार्य-गोँ साइ सबारे कैल आलिङ्गन ॥ 86 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके लौटनेका समाचार सुनकर बड़े आनन्दित हुए। वे प्रेमावेशमें बहुत देर तक नृत्य-गीत और हुँकार करते रहे। श्रीहरिदास ठाकुर भी समाचार सुनकर परम आनन्दित हुए। 414 ।

दसवाँ अध्याय 10/80-93 ] श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीशिवानन्द सेन, श्रीआचार्यरत्न, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीआचार्यनिधि, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीराम पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीमान् पण्डित, श्रीविजय, श्रीधर, श्रीराघवपण्डित और श्रीआचार्य नन्दन भी इस समाचारको सुनकर बड़े आनन्दित हुए। और कितने भक्तोंके नाम कहूँ, जिसने भी महाप्रभुके नीलाचल आनेका समाचार सुना, उसके मनमें परम उल्लास हुआ। सभी भक्त मिलकर श्रीअद्वैताचार्यके पास गये और उनके चरणकमलोंकी वन्दना की। श्रीअद्वैताचार्यने भी उन सबका आलिङ्गन किया॥ 80-86॥ अनुभाष्य—'आचार्यनिधि'—आदिलीला 10/14 संख्या देखें॥ 82॥ आनन्दसूचक महोत्सवका अनुष्ठान :— दिन दुइ-तिन आचार्य महोत्सव कैल। नीलाचल याइते आचार्य युक्ति दृढ़ कैल॥ 87॥ अनुवाद—इस शुभ समाचारको पाकर श्रीअद्वैताचार्यने दो-तीन दिन तक महोत्सव किया। तब श्रीअद्वैताचार्य आदि सबने नीलाचल जानेका दृढ़ निश्चय किया॥ 87॥ शचीमाताकी आज्ञा लेकर सभीकी पुरी-यात्रा :— सबे मेलि' नवद्वीपे एकत्र हञा। नीलाद्रि चलिल शचीमातार आज्ञा लञा॥ 88॥ अनुवाद—सभी भक्त नवद्वीपमें एकत्रित हुए और श्रीशचीमाताकी आज्ञा लेकर वे नीलाचलकी ओर चल दिये॥ 88॥ कुलीन ग्रामवासियोंका आगमन और मिलन :— प्रभुर समाचार शुनि' कुलीनग्रामवासी। सत्यराज-रामानन्द मिलिला सबे आसि' ॥ 89॥ अनुवाद—महाप्रभुका नीलाचल लौटनेका समाचार सभी कुलीनग्रामवासियोंने सुना। श्रीसत्यराज, श्रीरामार्नन्दादि सभी कुलीनग्रामवासी भी श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंके साथ नीलाचल जानेके लिये आकर मिले॥ 89॥ खण्डवासियोंका आगमन और मिलन :— मुकुन्द, नरहरि, रघुनन्दन खण्ड हैते। आचार्येर ठाञि आइला नीलाचल याइते॥ 90॥ अनुवाद—समाचार पाकर श्रीमुकुन्द, श्रीनरहरि और श्रीरघुनन्दनादि भी खण्डवासी नीलाचल जानेके लिये श्रीअद्वैताचार्यके घर आ गये॥ 90॥ अनुभाष्य—आदिलीला 10/78 संख्या देखें। श्रीखण्डवासी श्रीरघुनन्दनकी वंशप्रणालीके लिये मञ्जूषा- समाहृति संख्या पाँच देखें। इनमेंसे बहुतसे भक्तोंके नामके साथ 'आनन्द'-शब्द जोड़कर विभिन्न नाम हैं। साधारणतः 'आनन्द' शब्द जोड़कर ही इनका नाम पाठ करना चाहिये॥ 90॥ श्रीपरमानन्द पुरीका नवद्वीपमें आगमन :— सेकाले दक्षिण हैते परमानन्दपुरी। गङ्गातीरे-तीरे आइला नदीया-नगरी॥ 91॥ शचीमाताके घरमें श्रीपरमानन्दपुरीकी भिक्षा और वास :— आइर मन्दिरे सुखे करिला विश्राम। आइ ताँरे भिक्षा दिला करिया सम्मान॥ 92॥ अनुवाद—उसी समय श्रीपरमानन्दपुरी भी दक्षिण भारतसे गङ्गा-तटके साथ-साथ चलते हुए नदीया-नगरीमें पहुँचे। उन्होंने शचीमाताके घरपर आकर सुखपूर्वक विश्राम किया। शचीमाताने उन्हें सम्मानपूर्वक भोजन कराया॥ 91-92॥ अनुभाष्य—'आइर मन्दिरे'—श्रीमायापुरमें आर्या श्रीशचीमाताके घरमें॥ 92॥ श्रीपरमानन्द पुरीकी जगन्नाथपुरी जानेकी इच्छा :— प्रभुर आगमन तैंह ताँहाञि शुनिल। शीघ्र नीलाचल याइते ताँर इच्छा हैल॥ 93॥ अनुवाद—वहाँ उन्होंने महाप्रभुके दक्षिण भारतसे नीलाचल लौट आनेका समाचार सुना। उनकी भी शीघ्र ही नीलाचल जानेकी इच्छा हुई॥ 93॥ । 415