भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1256

दसवाँ अध्याय 10/24-36 ] “प्रभुर सहित आमा-सबार कराह दरशन। तोमार प्रसादे पाइ प्रभुर चरण॥” 27॥ अनुवाद—इस प्रकार पुरुषोत्तमवासी सभी लोगोंका मन महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठित हो रहा था। जब सब लोगोंकी उत्कण्ठा बहुत बढ़ गयी, तब महाप्रभु दक्षिण भारतसे तुरन्त आ गये। महाप्रभुके आनेका समाचार सुनकर सभीका मन प्रसन्न हो गया। सब आकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे प्रार्थना करने लगे,—“हम सबको महाप्रभुके दर्शन कराइये। आपकी कृपासे ही हमें महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति हो सकती है॥” 24-27॥ काशीमिश्रके घरमें महाप्रभुके साथ मिलनेका सभीको आश्वासन :— भट्टाचार्य कहे,—“कालि काशीमिश्रेर घरे। प्रभु याइबेन ताँहा, मिला’ब सबारे॥” 28॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“कल महाप्रभु काशीमिश्रके घर जायेंगे। वहीं मैं आप सबको उनके दर्शन कराऊँगा॥” 28॥ दूसरे दिन महाप्रभुके द्वारा जगन्नाथ-दर्शन और पण्डागणोंके साथ मिलन :— आर दिन महाप्रभु भट्टाचार्येर सङ्गे। जगन्नाथ-दरशन कैल महारङ्गे॥ 29॥ महाप्रसाद दिया ताँहा मिलिला सेवकगण। महाप्रभु सबाकारे कैल आलिङ्गन॥ 30॥ अनुवाद—अगले दिन महाप्रभु श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करने गये। श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंने महाप्रभुसे मिलकर उन्हें महाप्रसाद दिया और महाप्रभुने उन सबका आलिङ्गन किया॥ 29-30॥ भट्टाचार्यका महाप्रभुको काशी मिश्रके घरपर लाना :— दर्शन करि’ प्रभु चलिला बाहिरे। भट्टाचार्य आनिल ताँरे काशीमिश्र-घरे॥ 31॥ महाप्रभुके चरणोंमें काशीमिश्रका आत्मसमर्पण :— काशीमिश्र आसि’ पड़िल प्रभुर चरणे। गृह-सहित आत्मा ताँरे कैल निवेदने॥ 32॥ काशीमिश्रको चतुर्भुज-मूर्तिका दर्शन :— प्रभु चतुर्भुज-मूर्त्ति ताँरे देखाइल। आत्मसात् करि’ ताँरे आलिङ्गन कैल॥ 33॥ अनुवाद—भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करके महाप्रभु मन्दिरसे बाहर चले और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य उन्हें काशीमिश्रके घर ले आये। महाप्रभुको देखकर श्रीकाशीमिश्र उनके चरणोंमें गिर पड़े और उन्होंने घरके साथ-साथ अपने आपको भी महाप्रभुके श्रीचरणोंमें समर्पित कर दिया। महाप्रभुने श्रीकाशीमिश्रको अपने चतुर्भुज रूपका दर्शन कराया और उन्हें अपने दासके रूपमें स्वीकार करके उनका आलिङ्गन किया॥ 31-33॥ अमृतप्रवाह भाष्य—काशीमिश्रने अपना घर और सेवा करने योग्य अपना शरीर भी महाप्रभुको समर्पित कर दिया॥ 32॥ सभीके द्वारा आसन ग्रहण :— तबे महाप्रभु ताँहा बसिला आसने। चौदिके बसिला नित्यानन्दादि भक्तगणे॥ 34॥ अनुवाद—तब महाप्रभु वहाँ आसनपर बैठ गये और श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि भक्तगण उनके चारों ओर बैठ गये॥ 34॥ योग्य वासस्थान-निर्वाचन देखकर महाप्रभुको आनन्द :— सुखी हैला देखि’ प्रभु वासार संस्थान। येइ वासाय हय प्रभुर सर्व-समाधान॥ 35॥ अनुवाद—महाप्रभु अपने रहनेके स्थानको देखकर बहुत प्रसन्न हुए, क्योंकि ऐसे स्थानपर उनकी आवश्यकता अनुसार सब व्यवस्था थी॥ 35॥ महाप्रभुको घर स्वीकार करनेकी प्रार्थना :— सार्वभौम कहे,—“प्रभु, योग्य तोमार वासा। तुमि अङ्गीकार कर,—काशीमिश्रेर आशा॥” 36॥ । 409