भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1257

[ 10/36-43 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“प्रभो! यह निवासस्थान आपके योग्य है। कृपा करके इसे स्वीकार करके काशीमिश्रकी आशाको पूर्ण कीजिये॥” 36॥ अमृतप्रवाह भाष्य—काशीमिश्रकी यही आशा है कि आप उनके घरमें वास करे,—इसे आप कृपा करके स्वीकार कीजिये॥ 36॥ महाप्रभुके द्वारा अपने भक्तकी वश्यता-ज्ञापन :— प्रभु कहे,—“एइ देह तोमा-सबाकार। येइ तुमि कह, सेइ कर्त्तव्य आमार॥” 37॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“यह देह तो आप सबकी ही है। आप लोग जैसा कहेंगे, वैसा करना ही मेरा कर्त्तव्य है॥” 37॥ श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुको पुरीवासी भक्तोंका परिचय प्रदान :— तबे सार्वभौम प्रभुर दक्षिण-पार्श्वे बसि'। मिलाइते लागिला सब पुरुषोत्तमवासी॥ 38॥ अनुवाद—तब श्रीसार्वभौम महाप्रभुके दाहिनी ओर बैठ गये और वे सब पुरुषोत्तमवासियोंको महाप्रभुसे मिलवाने लगे॥ 38॥ पुरीवासियोंके द्वारा महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा-ज्ञापन और महाप्रभुकी कृपाके लिये प्रार्थना :— “एइ सब लोक, प्रभु, वैसे नीलाचले। उत्कण्ठित हञाछे सबे तोमा मिलिबारे॥ 39॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये तृष्णासे युक्त पुरीवासी भक्त :— तृषित चातक यैछे करे हाहाकार। तैछे एइ सब, —सबे कर अङ्गीकार॥ 40॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“ये सब लोग नीलाचलमें रहते हैं और आपसे मिलनेके लिये बड़े ही उत्कण्ठित हैं। जैसे प्यासा चातक पानीके लिये हा-हाकार करता है, आपके दर्शनके बिना इनकी स्थिति भी वैसी है, आप इन्हें अङ्गीकार कीजिये॥ 39-40॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पाठान्तरमें—'तैछे एइ सब, सबा कर अङ्गीकार' अर्थात् जिस प्रकार प्यासा चातक जलके लिये हाहाकार करता है, उसी प्रकार ये सब उत्कलवासी आपके दर्शनोंके लिये प्यासे हैं; प्रभो! आप सभीको ही स्वीकार कीजिये॥ 40॥ (1) जनार्दन :— जगन्नाथ-सेवक एइ, नाम-जनार्द्दन। अनवसरे करे प्रभुर श्रीअङ्ग-सेवन॥ 41॥ अनुवाद—(भक्तोंसे परिचय कराते हुए श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य कह रहे हैं)—ये भगवान् श्रीजगन्नाथके सेवक हैं, इनका नाम जनार्दन है। अनवसरके समय ये श्रीजगन्नाथके श्रीविग्रहकी सेवा करते हैं॥ 41॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अनवसरे'—स्नानयात्राके बादसे 'नवयौवन'-दर्शन तक अनवसर-काल है॥ 41॥ (2) कृष्णदास, (3) शिखि माहति :— कृष्णदास-नाम एइ सुवर्ण-वेत्रधारी। शिखि माहाति-नाम एइ लिखनाधिकारी॥ 42॥ अनुवाद—ये कृष्णदास हैं, ये स्वर्णकी छड़ी धारण करते हैं। और इनका नाम शिखि माहति है, ये लेखन अधिकारी हैं अर्थात् ये पञ्जिका आदि लिखनेका कार्य करते हैं॥ 42॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'लिखन अधिकारी'—मन्दिरके पद-प्राप्त कर्मचारी, जो मात्ला-पञ्जिका लिखते हैं॥ 42॥ अनुभाष्य—'शिखि माहाति'—अन्त्यलीला 2/105-106 संख्या और आदिलाला 10/137 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 42॥ (4) प्रद्युम्न मिश्र :— प्रद्युम्नमिश्र इँह वैष्णव प्रधान। जगन्नाथेर महा-सोयार इँह 'दास' नाम॥ 43॥ अनुवाद—ये वैष्णवोंमें प्रधान प्रद्युम्नमिश्र हैं। ये 410 ।