श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1258, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय 10/43-50 ] श्रीजगन्नाथके प्रधान रसोइया हैं और ये 'दास' नामसे भी जाने जाते हैं॥४३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'महा-सोयार'—महासूपकार (प्रधान रसोइया), प्रधान पाककर्त्ता (प्रधान भोजन बनानेवाला), महानसाधिकारी अर्थात् रसोईका मालिक॥४३॥ अनुभाष्य—'प्रद्युम्नमिश्र'—अन्त्यलीला पाँचवाँ अध्याय देखें। ब्राह्मणोंके विष्णुदासयसूचक नामके बाद 'दास'-शब्दका व्यवहार चुल्लिभट्ट सम्मत है॥४३॥ (5) मुरारि माहाति :— मुरारि माहाति इँह—शिखि माहातिर भाइ। तोमार चरण बिना आर गति नाइ॥४४॥ अनुवाद—ये शिखि माहातिके भाई मुरारि माहाति हैं, आपके चरणकमल ही इनकी एकमात्र गति हैं॥४४॥ (6) चन्दनेश्वर, (7) सिंहेश्वर, (8) मुरारि, (9) विष्णुदास :— चन्दनेश्वर, सिंहेश्वर, मुरारि ब्राह्मण। विष्णुदास,—इँह ध्याये तोमार चरण॥४५॥ अनुवाद—ये चन्दनेश्वर, सिंहेश्वर, मुरारि ब्राह्मण और विष्णुदास हैं,—ये सदा आपके चरणकमलोंका ही ध्यान करते रहते हैं॥४५॥ (10) परमानन्द :— 'प्रहरराज' 'महापात्र' इँह महामति। परमानन्द महापात्र इँहार संहति॥४६॥ अनुवाद—ये परमानन्द प्रहरराज हैं, इन्हें महापात्र भी कहते हैं। ये बहुत बुद्धिमान हैं॥४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'प्रहरराज'—पहराव (एक प्रहरके लिये राजा)॥४६॥ अनुभाष्य—'प्रहरराज'—उत्कलमें राजाओंमें यह नियम प्रचलित है कि मृत राजाकी मृत्यु और अन्त्येष्टिकालसे अगले उत्तराधिकारीके सिंहासन ग्रहण करने अथवा अभिषेकसे पहले तक एक प्रहर कालके लिये राजकुल-पुरोहितवंशका कोई व्यक्ति सिंहासनपर बैठकर राजदण्ड धारण करेगा, जिससे राज सिंहासन खाली न रहे। ये पुरोहितगण ही वंशावलीसे 'प्रहरराज'के नामसे प्रसिद्ध हैं॥४६॥ शुद्ध वैष्णव ही तीर्थोंके अलङ्कार :— ए-सब वैष्णव—एइ क्षेत्रेर भूषण। एकान्तभावे चिन्ते सबे तोमार चरण॥”४७॥ अनुवाद—ये सब वैष्णव इस श्रीजगन्नाथ पुरीके भूषणस्वरूप हैं। ये सब एकान्त भावसे आपके चरणकमलोंका ही चिन्तन करते हैं॥”४७॥ सभीका महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुका आलिङ्गन :— तबे सबे भूमे पड़ि' दण्डवत् हञा। सबा आलिङ्गिला प्रभु प्रसाद करिया॥४८॥ अनुवाद—परिचय होनेके बाद सबने भूमिपर गिरकर महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुने कृपा करके उन सबको आलिङ्गन दान दिया॥४८॥ (11) चार पुत्रों-सहित भवानन्द-रायका परिचय-दान :— हेनकाले आइला तथा भवानन्द राय। चारिपुत्र-सङ्गे पड़े महाप्रभुर पाय॥४९॥ सार्वभौम कहे,—“एइ राय भवानन्द। इँहार प्रथम पुत्र—राय रामानन्द॥”५०॥ अनुवाद—उसी समय वहाँ श्रीभवानन्द राय अपने चार पुत्रोंके साथ आये और सभीने महाप्रभुके चरणोंमें गिरकर उन्हें प्रणाम किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“ये भवानन्द राय हैं। इनके प्रथम पुत्रका नाम राय रामानन्द है॥”४९-५०॥ अनुभाष्य—'चारिपुत्र'—श्रीरामानन्द रायके अतिरिक्त वाणीनाथ, गोपीनाथ, कलानिधि और सुधानिधि—नामक चार भाई॥४९॥ । 411