भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1259

[ 10/51–61 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुका आलिङ्गन और श्रीरामानन्द- महिमाका कीर्तन :– तबे महाप्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन। स्तुति करि' कहे रामानन्द-विवरण॥ 51 ॥ “रामानन्द-हेन रत्न याँहार तनय। ताँहार महिमा लोके कहन ना जाय॥ 52 ॥ भवानन्द ही पाण्डु, उनके पाँच पुत्र ही पाँच-पाण्डव :– साक्षात् पाण्डु तुमि, तोमार पत्नी कुन्ती। पञ्चपाण्डव तोमार पञ्चपुत्र महामति॥” 53 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने श्रीभवानन्द रायका आलिङ्गन किया और श्रीरामानन्द रायकी प्रशंसा करते हुए उनके बारेमें महाप्रभुने कहा, — “रामानन्द जैसा रत्न जिनका पुत्र हो, उनकी महिमाका जगत्में वर्णन नहीं किया जा सकता। आप साक्षात् महाराज पाण्डु हैं और आपकी पत्नी साक्षात् कुन्तीदेवी हैं। आपके पाँच बुद्धिमान पुत्र पाँच पाण्डव ही हैं॥” 51-53 ॥ भवानन्दकी दीनता; ईश्वरकी कृपा- जातिकुलसे निरपेक्ष :– राय कहे, —“आमि शूद्र, विषयी, अधम। तबु तुमि स्पर्श,—एइ ईश्वर-लक्षण॥ 54 ॥ भवानन्दका महाप्रभुके चरणोंमें सर्वस्व-अर्पण :– निज-गृह-वित्त-भृत्य-पञ्चपुत्र-सने। आत्म समर्पिलुँ आमि तोमार चरणे॥ 55 ॥ महाप्रभुके चरणोंमें वाणीनाथको अर्पण :– एइ वाणीनाथ रहिबे तोमार चरणे। यबे येइ आज्ञा, ताहा करिबे सेवने॥ 56 ॥ निजदास मानकर अङ्गीकार करनेके लिये भवानन्दकी महाप्रभुको प्रार्थना :– आत्मीय-ज्ञाने मोरे सङ्कोच ना करिबे। येइ यबे इच्छा, तबे सेइ आज्ञा दिबे॥” 57 ॥ अनुवाद—महाप्रभुसे अपनी प्रशंसा सुनकर श्रीभवानन्द रायने कहा, — “मैं तो एक शूद्र हूँ, जो विषयोंमें लिप्त है। मैं अधम व्यक्ति हूँ, तो भी आपने मुझे स्पर्श किया। यह आपके ईश्वर होनेका ही प्रमाण है। मैं अपने घर, धन, दासों और पाँचों पुत्रोंके साथ स्वयंको आपके चरणोंमें समर्पित करता हूँ। यह मेरा पुत्र वाणीनाथ सदा आपके श्रीचरणकमलोंमें ही रहेगा। आप इसे जब जो आदेश देंगे, उसी प्रकार आपकी सेवा करेगा। आप मुझे अपना समझकर किसी भी प्रकारका सङ्कोच नहीं कीजियेगा, जब जो इच्छा हो, तब वह आदेश कीजियेगा॥” 54-57 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अर्थात्, मुझे 'आत्मीय' (अपना) जानियेगा, —'आत्मीय' होनेके नाते कृपा कीजियेगा; किसी भी विषयमें सङ्कोच करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ 57 ॥ महाप्रभुकी कृपा-वाणी और अङ्गीकार :– प्रभु कहे, —“कि सङ्कोच, तुमि नह पर। जन्मे जन्मे तुमि आमार सवंशे किङ्कर॥ 58 ॥ दिन-पाँच भितरे आसिबे रामानन्द। ताँर सङ्गे पूर्ण हबे आमार आनन्द॥” 59 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा, — “आप पराये तो नहीं हो, इसलिये आपसे कैसा सङ्कोच? आप तो वंशसहित जन्म-जन्मसे मेरे दास हो। पाँच-सात दिनोंमें रामानन्द भी यहाँ आ जायेंगे। उनके साथ रहकर मेरा आनन्द पूर्ण होगा॥” 58-59 ॥ एत बलि' प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन। ताँर पुत्र सब शिरे धरिल चरण॥ 60 ॥ वाणीनाथको अङ्गीकार :– तबे महाप्रभु ताँरे घरे पाठाइल। वाणीनाथ-पट्टनायके निकटे राखिल॥ 61 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया और अपने चरणकमल उनके सभी पुत्रोंके सिरपर रखे। तब महाप्रभुने श्रीभवानन्द रायको उनके 412 ।