श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1260, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय 10/60-73 ] घर भेज दिया और वाणीनाथ पट्टनायकको अपने पास रख लिया॥ 60-61 ॥ अनुभाष्य - 'शिरो'- अपने-अपने मस्तकपर ॥ 60 ॥ भट्टाचार्य सब लोके विदाय कराइल। तबे प्रभु काला-कृष्णदासे बोलाइल ॥ 62 ॥ कृष्णदासके पूर्व आचरणका वर्णन :- प्रभु कहे, - “भट्टाचार्य, शुनह इँहार चरित। दक्षिण गियाछिल इँह आमार सहित ॥ 63 ॥ भट्टथारि-काछे गेला आमारे छाड़िया। भट्टथारि हैते इँहारे आनिलुँ उद्धारिया ॥ 64 ॥ महाप्रभुके द्वारा कृष्णदासका परित्याग :- एबे आमि इँहा आनि' करिलाङ विदाय। याँहा इच्छा, याह, आमा-सने नाहि आर दाय ॥” 65 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने तब सब लोगोंको विदा किया। बादमें महाप्रभुने काला कृष्णदासको अपने पास बुलवा लिया। महाप्रभुने कहा, - “हे सार्वभौम भट्टाचार्य ! इसका (काला कृष्णदासका) चरित्र सुनो। यह मेरे साथ दक्षिण भारत गया था। वहाँ मुझे छोड़कर यह भट्टथारि लोगोंके पास चला गया था। मैं इसे भट्टथारि लोगोंके चङ्गलसे छुड़ाकर यहाँ लाया हूँ। मैं इसे यहाँ ले आया हूँ, अब इसके बाद मुझपर इसका कोई दायित्व नहीं है, इसलिये मैं इसे यहाँसे जानेके लिये कह रहा हूँ। अब यह जहाँ जाना चाहे, वहीं चला जाय ॥” 62-65 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला, 10/145 संख्या और मध्यलीला 7/39 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 62 ॥ कृष्णदासका क्रन्दन :- एत शुनि' कृष्णदास कान्दिते लागिल। मध्याह्न करिते महाप्रभु चलि' गेल ॥ 66 ॥ अनुवाद- यह सुनकर कि महाप्रभुने उसका त्याग कर दिया है, कृष्णदास रोने लगा। किन्तु महाप्रभु उसको अनदेखा करके मध्याह्नके भोजनके लिये चले गये॥ 66 ॥ श्रीनित्यानन्दादिका कृष्णदासको नवद्वीप भेजनेका परामर्श :- नित्यानन्द, जगदानन्द, मुकुन्द, दामोदर। चारिजने युक्ति तबे करिला अन्तर ॥ 67 ॥ “गौड़देशे पाठाइते चाहि एकजने। 'आइ'के कहिबे याइ, प्रभुर आगमन ॥ 68 ॥ अद्वैत-श्रीवासादि यत भक्तगण। सबेइ आसिबे शुनि' प्रभुर आगमन ॥ 69 ॥ कृष्णदासको सान्त्वना :- एइ कृष्णदासे दिब गौड़े पाठञा।” एत कहि' तारे राखिलेन आश्वासिया ॥ 70 ॥ अनुवाद-तब श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द, श्रीमुकुन्द और श्रीदामोदर, ये चारों गुप्तरूपसे कुछ योजनापर विचार करने लगे, - “हम एक व्यक्तिको गौड़देशमें भेजना चाहते हैं, जो जाकर शचीमाताको महाप्रभुके दक्षिण भारतसे लौटकर आनेका समाचार दे। श्रीअद्वैत-श्रीवासादि सभी भक्तगण महाप्रभुके आनेका समाचार सुनकर यहाँ आयेंगे। इस कार्यके लिये हम इस कृष्णदासको गौड़देश भेजेंगे।” यह विचार करके उन्होंने कृष्णदासको आश्वस्त करके रख लिया ॥ 67-70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'अन्तर'- गुप्त अथवा दूर जाकर ॥ 67 ॥ महाप्रभुसे अनुमति ग्रहण :- आर दिने प्रभुस्थाने कैल निवेदन। “आज्ञा देह' गौड़-देशे पाठाइ एकजने ॥ 71 ॥ तोमार दक्षिण-गमन शुनि' शचि 'आइ'। अद्वैतादि भक्त सब आछे दुःख पाइ' ॥ 72 ॥ एकजन याइ' कहुक शुभ समाचार।” प्रभु कहे, - “सेइ कर, ये इच्छा तोमार ॥” 73 ॥ । 413