श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 10/71-86 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-अगले दिन सबने महाप्रभुसे निवेदन किया, - "यदि आपकी आज्ञा हो, तो हम एक व्यक्तिको गौड़देश भेज दें। आपके दक्षिण भारत जानेका समाचार सुनकर शचीमाता और श्रीअद्वैतादि सब भक्त बड़े दुःखी हो रहे हैं। इसलिये एक व्यक्ति जाकर उनको आपके लौट आनेका शुभ समाचार दे।" यह सुनकर महाप्रभुने कहा, - "जैसी आप सबकी इच्छा हो, वैसा ही कीजिये ॥" 71-73 ॥ महाप्रसादके साथ कृष्णदासको गौड़देशमें भेजना :- तबे सेइ कृष्णदासे गौड़े पाठाइल। वैष्णव-सबाके दिते महाप्रसाद दिल ॥ 74 ॥ अनुवाद-इस प्रकार काला कृष्णदासको गौड़देश भेज दिया। उसके साथ सभी वैष्णवोंको देनेके लिये प्रचुर मात्रामें श्रीजगन्नाथजीका महाप्रसाद भी भेजा ॥ 74 ॥ कृष्णदासकी गौड़यात्रा और नवद्वीपमें शचीमाताके साथ साक्षात्कार :- तबे गौड़देशे आइला काला-कृष्णदास। नवद्वीपे गेल तँह शची-आइ-पाश ॥ 75 ॥ प्रणाम करनेके बाद सभीको महाप्रभुका संवाद-वर्णन :- महाप्रसाद दिया ताँरे कैल नमस्कार। दक्षिण हैते आइला प्रभु, -कहे समाचार ॥ 76 ॥ अनुवाद-तब काला-कृष्णदास गौड़देशमें आकर सबसे पहले नवद्वीपमें शचीमाताके पास गया। शचीमाताको प्रणाम करके काला कृष्णदासने उन्हें प्रसाद दिया और साथ ही महाप्रभुके दक्षिण भारतसे आ जानेका समाचार सुनाया ॥ 75-76 ॥ महाप्रभुका संवाद सुनकर सभीको आनन्द :- शुनिया आनन्दित हैल शचीमातार मन। श्रीवासादि आर यत यत भक्तगण ॥ 77 ॥ शुनिया सबार हैल परम उल्लास। अद्वैत-आचार्य-गृहे गेला कृष्णदास ॥ 78 ॥ अनुवाद-यह शुभ समाचार सुनकर शचीमाताको बहुत आनन्द हुआ। श्रीवासादि तथा अन्यान्य जितने भी भक्त थे, सभीके हृदयमें इस समाचारको सुनकर उल्लास हो गया। तब कृष्णदास श्रीअद्वैताचार्यके घर गया ॥ 77-78 ॥ श्रीअद्वैतके घर जाकर महाप्रभुका संवाद-वर्णन :- आचार्येरे प्रसाद दिया करि' नमस्कार। सम्यक् कहिल महाप्रभुर समाचार ॥ 79 ॥ अनुवाद-काला कृष्णदासने श्रीअद्वैताचार्यको प्रणाम करके उन्हें प्रसाद दिया और फिर उन्होंने महाप्रभुका समस्त समाचार कह सुनाया ॥ 79 ॥ श्रीअद्वैताचार्यका आनन्द और अन्यान्य गौड़ीय भक्तोंका हर्षित होकर अद्वैतके पास जाना :- शुनि' आचार्य-गोसाञिर आनन्द हइल। प्रेमावेशे बहु नृत्य-गीत-हुँकार कैल ॥ 80 ॥ हरिदास ठाकुरेर हैल परम आनन्द। वासुदेव दत्त, गुप्त मुरारि, सेन शिवानन्द ॥ 81 ॥ आचार्यरत्न, आर पण्डित वक्रेश्वर। आचार्यनिधि, आर पण्डित गदाधर ॥ 82 ॥ श्रीराम पण्डित, आर पण्डित दामोदर। श्रीमान् पण्डित, आर विजय, श्रीधर ॥ 83 ॥ राघवपण्डित, आर आचार्य नन्दन। कतेक कहिब आर यत भक्तगण ॥ 84 ॥ शुनिया सबार हैल परम उल्लास। सबे मेलि' गेला श्रीअद्वैतेर पाश ॥ 85 ॥ आचार्येरे सबे कैल चरण वन्दन। आचार्य-गोँ साइ सबारे कैल आलिङ्गन ॥ 86 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके लौटनेका समाचार सुनकर बड़े आनन्दित हुए। वे प्रेमावेशमें बहुत देर तक नृत्य-गीत और हुँकार करते रहे। श्रीहरिदास ठाकुर भी समाचार सुनकर परम आनन्दित हुए। 414 ।