भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1262

दसवाँ अध्याय 10/80-93 ] श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीशिवानन्द सेन, श्रीआचार्यरत्न, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीआचार्यनिधि, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीराम पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीमान् पण्डित, श्रीविजय, श्रीधर, श्रीराघवपण्डित और श्रीआचार्य नन्दन भी इस समाचारको सुनकर बड़े आनन्दित हुए। और कितने भक्तोंके नाम कहूँ, जिसने भी महाप्रभुके नीलाचल आनेका समाचार सुना, उसके मनमें परम उल्लास हुआ। सभी भक्त मिलकर श्रीअद्वैताचार्यके पास गये और उनके चरणकमलोंकी वन्दना की। श्रीअद्वैताचार्यने भी उन सबका आलिङ्गन किया॥ 80-86॥ अनुभाष्य—'आचार्यनिधि'—आदिलीला 10/14 संख्या देखें॥ 82॥ आनन्दसूचक महोत्सवका अनुष्ठान :— दिन दुइ-तिन आचार्य महोत्सव कैल। नीलाचल याइते आचार्य युक्ति दृढ़ कैल॥ 87॥ अनुवाद—इस शुभ समाचारको पाकर श्रीअद्वैताचार्यने दो-तीन दिन तक महोत्सव किया। तब श्रीअद्वैताचार्य आदि सबने नीलाचल जानेका दृढ़ निश्चय किया॥ 87॥ शचीमाताकी आज्ञा लेकर सभीकी पुरी-यात्रा :— सबे मेलि' नवद्वीपे एकत्र हञा। नीलाद्रि चलिल शचीमातार आज्ञा लञा॥ 88॥ अनुवाद—सभी भक्त नवद्वीपमें एकत्रित हुए और श्रीशचीमाताकी आज्ञा लेकर वे नीलाचलकी ओर चल दिये॥ 88॥ कुलीन ग्रामवासियोंका आगमन और मिलन :— प्रभुर समाचार शुनि' कुलीनग्रामवासी। सत्यराज-रामानन्द मिलिला सबे आसि' ॥ 89॥ अनुवाद—महाप्रभुका नीलाचल लौटनेका समाचार सभी कुलीनग्रामवासियोंने सुना। श्रीसत्यराज, श्रीरामार्नन्दादि सभी कुलीनग्रामवासी भी श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंके साथ नीलाचल जानेके लिये आकर मिले॥ 89॥ खण्डवासियोंका आगमन और मिलन :— मुकुन्द, नरहरि, रघुनन्दन खण्ड हैते। आचार्येर ठाञि आइला नीलाचल याइते॥ 90॥ अनुवाद—समाचार पाकर श्रीमुकुन्द, श्रीनरहरि और श्रीरघुनन्दनादि भी खण्डवासी नीलाचल जानेके लिये श्रीअद्वैताचार्यके घर आ गये॥ 90॥ अनुभाष्य—आदिलीला 10/78 संख्या देखें। श्रीखण्डवासी श्रीरघुनन्दनकी वंशप्रणालीके लिये मञ्जूषा- समाहृति संख्या पाँच देखें। इनमेंसे बहुतसे भक्तोंके नामके साथ 'आनन्द'-शब्द जोड़कर विभिन्न नाम हैं। साधारणतः 'आनन्द' शब्द जोड़कर ही इनका नाम पाठ करना चाहिये॥ 90॥ श्रीपरमानन्द पुरीका नवद्वीपमें आगमन :— सेकाले दक्षिण हैते परमानन्दपुरी। गङ्गातीरे-तीरे आइला नदीया-नगरी॥ 91॥ शचीमाताके घरमें श्रीपरमानन्दपुरीकी भिक्षा और वास :— आइर मन्दिरे सुखे करिला विश्राम। आइ ताँरे भिक्षा दिला करिया सम्मान॥ 92॥ अनुवाद—उसी समय श्रीपरमानन्दपुरी भी दक्षिण भारतसे गङ्गा-तटके साथ-साथ चलते हुए नदीया-नगरीमें पहुँचे। उन्होंने शचीमाताके घरपर आकर सुखपूर्वक विश्राम किया। शचीमाताने उन्हें सम्मानपूर्वक भोजन कराया॥ 91-92॥ अनुभाष्य—'आइर मन्दिरे'—श्रीमायापुरमें आर्या श्रीशचीमाताके घरमें॥ 92॥ श्रीपरमानन्द पुरीकी जगन्नाथपुरी जानेकी इच्छा :— प्रभुर आगमन तैंह ताँहाञि शुनिल। शीघ्र नीलाचल याइते ताँर इच्छा हैल॥ 93॥ अनुवाद—वहाँ उन्होंने महाप्रभुके दक्षिण भारतसे नीलाचल लौट आनेका समाचार सुना। उनकी भी शीघ्र ही नीलाचल जानेकी इच्छा हुई॥ 93॥ । 415