श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 10/93–104 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभु दक्षिण भारत भ्रमण करके नीलाचल लौट आये हैं,—यह संवाद अपने पूर्व परिचित कालाकृष्णदाससे श्रीमायापुरमें ही श्रीपरमानन्द पुरीको प्राप्त हुआ॥93॥ द्विज कमलाकान्तके साथ श्रीपरमानन्दपुरीका पुरी जाना :— प्रभुर एक भक्त—'द्विज कमलाकान्त' नाम। ताँरे लञा नीलाचले करिला प्रयाण॥94॥ महाप्रभुके साथ श्रीपरमानन्द पुरीका मिलन :— सत्वरे आसिया तँह मिलिला प्रभुरे। प्रभुर आनन्द हैल पाञा ताँहारे॥95॥ महाप्रभुका प्रणाम और श्रीपरमानन्दपुरीके द्वारा आलिङ्गन :— प्रेमावेशे कैल ताँर चरण वन्दन। तँह प्रेमावेशे कैल प्रभुरे आलिङ्गन॥96॥ अनुवाद—द्विज कमलाकान्त नामक महाप्रभुके एक भक्तको श्रीपरमानन्द पुरी साथ लेकर नीलाचलकी ओर चल दिये। शीघ्र ही नीलाचल पहुँचकर श्रीपरमानन्द पुरी महाप्रभुसे मिले। उनसे मिलकर महाप्रभुको भी बहुत आनन्द हुआ और प्रेमावेशमें आकर महाप्रभुने उनके चरणोंकी वन्दना की। श्रीपरमानन्दपुरीने भी प्रेमावेशमें महाप्रभुका आलिङ्गन किया॥94-96॥ महाप्रभु और पुरी, परस्परके प्रेमसे आकृष्ट होकर दोनोंकी ही नीलाचल-पुरीमें वास करनेकी इच्छाका प्रकाश :— प्रभु कहे,—“तोमा-सङ्गे रहिते वाञ्छा हय। मोरे कृपा करि' कर नीलाद्रि आश्रय॥”97॥ अनुवाद—महाप्रभु ने कहा,—“आपके साथ रहनेकी मेरी बहुत इच्छा है, मुझपर कृपा करनेके लिये आप नीलाचलमें ही रह जाइये॥”97॥ पुरी कहे,—“तोमा-सङ्गे रहिते वाञ्छा करि'। गौड़ हैते चलि' आइलाङ नीलाचल-पुरी॥98॥ श्रीपुरीके द्वारा शचीमाताका संवाद देना और भक्तोंके भावी-आगमनके संवादका ज्ञापन :— दक्षिण हैते शुनि' तोमार आगमन। शची आनन्दित, आर यत भक्तगण॥99॥ सबे आसितेछेन तोमारे देखिते। ताँ-सबार विलम्ब देखि' आइलाङ त्वरिते॥”100॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्दपुरीने कहा,—“मेरी भी आपके साथ रहनेकी बहुत इच्छा है, इसलिये गौड़देशसे चलकर नीलाचल-पुरीमें आया हूँ। दक्षिण भारतसे आपके आगमनका समाचार सुनकर शचीमाता और सभी भक्त बड़े आनन्दित हुए हैं। सभी भक्त आपसे मिलनेके लिये जगन्नाथपुरी आ रहे हैं, परन्तु उनके आनेमें कुछ विलम्ब देखकर मैं शीघ्र ही चला आया॥”98-100॥ श्रीपरमानन्दपुरीको काशीमिश्रके घरमें वास-स्थानप्राप्ति :— काशीमिश्रेर आवासे निभृते एक घर। प्रभु ताँरे दिल, आर सेवार किङ्कर॥101॥ अनुवाद—श्रीकाशीमिश्रके घरमें एक एकान्त कमरा था, जिसे महाप्रभुने श्रीपरमानन्दपुरीको प्रदान किया और उनकी सेवाके लिये एक सेवक भी नियुक्त कर दिया॥101॥ श्रीदामोदर स्वरूपका आगमन और उनका वैशिष्ट्य :— आर दिने आइला स्वरूप दामोदर। प्रभुर अत्यन्त मर्मी, रसेर सागर॥102॥ उनके पूर्वाश्रमका परिचय :— 'पुरुषोत्तम आचार्य' ताँर नाम पूर्वाश्रमे। नवद्वीपे छिला तँह प्रभुर चरणे॥103॥ प्रभुर संन्यास देखि' उन्मत्त हञा। संन्यास ग्रहण कैल वाराणसी गिया॥104॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीस्वरूप दामोदर भी श्रीजगन्नाथ पुरीमें आ गये। वे महाप्रभुके अन्तरङ्ग भक्त और रसके सागर हैं। उनके पूर्वाश्रमका नाम 'पुरुषोत्तम 416 ।