श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1244, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 9/316-323 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—'पम्पा'—"ऋष्यमूकस्तु पम्पायां पुरस्तात् पुष्पितद्रुमः” अर्थात् "पम्पा नगरीमें ऋष्यमूक पर्वत है जिसके आगे पुष्पित वृक्ष हैं।"; कोई-कोई कहते हैं, —तुङ्गाभद्रा-नदीका ही प्राचीन नाम 'पम्बा' है। मतान्तरमें—विजयनगरकी प्राचीन प्रसिद्ध राजधानी हाम्पि-ग्राम ही पहले पम्पा-तीर्थके नामसे प्रसिद्ध था। मतान्तरमें—हैदराबादकी ओर, अनागुण्डिरके निकट तुङ्गाभद्राके तटपर स्थित एक सरोवर ही 'पम्पा सरोवर'के नामसे जाना जाता है; मतान्तरमें—पम्पा-सरोवर ही त्रिवाङ्कुरकी पम्वै-नदी है; मतान्तरमें—जल स्थिर होनेके कारण नदीको ही सरोवर कहा जाता है। 'पञ्चवटी'—दण्डकारण्यके अन्तर्गत एक वन है; यह वर्तमान 'नासिक' शहरमें अवस्थित है। यहाँपर श्रीलक्ष्मणने शूर्पणखाके नाकको काटा था। नासिक शहरमें 'त्र्यम्बक' नामक महादेव हैं (बोम्बाई गेजेटियार) ॥ 316 ॥ नासिकमें शिवका दर्शन करनेके बाद ब्रह्मगिरि एवं उसके बाद कुशावर्त्तमें आगमन :— नासिके त्र्यम्बक देखि' गेला ब्रह्मगिरि। कुशावर्त्ते आइला याँहा जन्मिला गोदावरी ॥ 317 ॥ अनुवाद—महाप्रभु नासिकमें त्र्यम्बकके दर्शन करके ब्रह्मगिरि गये। और फिर वे कुशावर्त्त आये जो गोदावरी नदीका उद्गम-स्थल है॥ 317 ॥ अनुभाष्य—'कुशावर्त्त'—पश्चिम घाट अथवा सह्याद्रिके कुशट्ट-नामक प्रदेशसे गोदावरीकी मूल धाराएँ उत्पन्न होती हैं। कुशावर्त्त नासिकके निकट स्थित है; किसी- किसीके मतानुसार यह विन्ध्याकी तलहटीमें अवस्थित है॥ 317 ॥ गोदावरीके सप्तशाखाओंके तटोंपर बहुत तीर्थोंका उद्धारकर विद्यानगरमें आगमन :— सप्त गोदावरी आइला करि' तीर्थ बहुतर। पुनरपि आइला प्रभु विद्यानगर ॥ 318 ॥ अनुवाद—बहुतसे तीर्थोंका दर्शन करनेके बाद महाप्रभु सप्त गोदावरी आये। और अन्तमें फिर वे विद्यानगर लौट आये ॥ 318 ॥ अनुभाष्य—गोदावरीके उत्पत्ति-स्थानसे वर्तमान हैदराबादके उत्तर-अंशसे होते हुए 'वस्तार' होकर उत्तर-सर्कार्समें कलिङ्गदेशमें पहुँचे ॥ 318 ॥ महाप्रभुके साथ श्रीरामानन्द रायका मिलन :— रामानन्द राय शुनि' प्रभुर आगमन। आनन्दे आसिया कैल प्रभुसह मिलन ॥ 319 ॥ दण्डवत् हञा पड़े चरणे धरिया। आलिङ्गन कैल प्रभु ताँरे उठाञा ॥ 320 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायको महाप्रभुका विद्यानगरमें आगमनका समाचार मिला, तो वे बड़े आनन्दित होकर महाप्रभुसे मिलनेके लिये आये। आकर श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुके चरणकमलोंमें दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया ॥ 319-320 ॥ दोनोंका प्रेमानन्द और इष्टगोष्ठी :— दुइजने प्रेमावेशे करेन क्रन्दन। प्रेमानन्दे शिथिल हैल दुँहाकार मन ॥ 321 ॥ कतक्षणे दुइ जना सुस्थिर हञा। नाना इष्टगोष्ठी करे एकत्र बसिया ॥ 322 ॥ अनुवाद—दोनों एक-दूसरेको मिलकर प्रेमावेशमें रोने लगे और प्रेमानन्दमें दोनोंका मन शिथिल हो गया। कुछ समयके बाद सुस्थिर होकर दोनों एक साथ बैठे। तब उन्होंने अनेक विषयोंपर चर्चा की ॥ 321-322 ॥ महाप्रभुके द्वारा अपनी तीर्थयात्राके वृत्तान्तका वर्णन और संगृहीत दोनों ग्रन्थ प्रदान :— तीर्थयात्रा-कथा प्रभु सकल कहिला। कर्णामृत, ब्रह्मसंहिता, —दुइ पुँथि दिला ॥ 323 ॥ 396 ।